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'प्रेगनेंसी के दौरान मन करता है, सारे साड़ी ब्लाउज को आग लगा दूं'

एक प्रेगनेंट लड़की की डायरी: मेरी एक सहेली को अपनी प्रेगनेंसी के आखिरी महीनों में डायपर पहनना पड़ता था.

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राजस्थान में हुए इस मामले के बाद मानवाधिकार आयोग भी हैरान है. (सांकेतिक फोटो)
अंकिता जैन. जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं. पढ़ाई की इंजीनियरिंग की. विप्रो इंफोटेक में छह महीने काम किया. सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं. साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं. मगर दिलचस्पी रही क्रिएटिव राइटिंग में. जबर लिखती हैं. इंजीनियरिंग वाली नौकरी छोड़ी. 2015 में एक नॉवेल लिखा. ‘द लास्ट कर्मा.’ रेडियो, एफएम के लिए भी लिखती हैं. शादी हुई और अब वो प्रेग्नेंट हैं. ‘द लल्लनटॉप’ के साथ वो शेयर कर रही हैं प्रेग्नेंसी का दौर. वो बता रही हैं, क्या होता है जब एक लड़की मां बनती है. पढ़िए दसवीं किश्त. MOTHER IN MAKING
“करीना कपूर के फोटो शूट्स देखकर लगता था कि काश मैं भी अपनी प्रेगनेंसी में ऐसे सुन्दर-सुन्दर ड्रेसेस पहन पाती लेकिन मेरी किस्मत में वही साड़ी-ब्लाउज, वही माथा ढंकना बंधा था. हम छोटे इंडियन शहरों की लड़कियों की ज़िन्दगी न जाने कब इन साड़ी-ब्लाउज से बाहर निकलेगी?” अभी कुछ दिन पहले मेरी एक सहेली ने मुझसे ये बातें कहीं. वो भी मां बनने वाली है. मां बनने के सारे खट्टे-मीठे-कढ़वे अनुभव उसे भी हो रहे हैं. आए दिन शरीर में होने वाले बदलाव, बढ़ता वजन, बढती भूख, रात भर बाथरूम के चक्कर, खड़े-खड़े चक्कर, चिड़चिड़ापन सारे प्रेगनेंसी बदलावों के साथ ही वो अपनी प्रेगनेंसी को एक अनोखे अंदाज में सेलिब्रेट भी करना चाहती है. वो सिर्फ एक बच्चा पैदा नहीं करना चाहती. बल्कि बच्चा पैदा करने के इस खूबसूरत अंदाज को सजाना, संवारना भी चाहती है. लेकिन छोटे शहर की बहुओं के साथ यह संभव नहीं. क्यों? क्योंकि समाज क्या कहेगा? लोग क्या कहेंगे? उससे भी ऊपर की बात तो ये है जनाब कि अगर कोई बहू कुछ कहना भी चाहे तो उसे यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि, “हम भी तो साड़ी पहनते थे”, “हमने क्या बच्चे पैदा नहीं किये.'' भारत में दिल्ली-बम्बई जैसे शहर कितने हैं? गिने-चुने और जिला स्तरीय शहर कितने है? जिन्हें गिनने में वक़्त लग जाएगा. एक तरफ जहां लोग नौकरी के लिए बड़े शहरों में अकेले रहने के लिए जाने लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ छोटे शहरों में टूटते परिवारों का एक कारण पुराने और आज के विचारों का मेल न खा पाना है. आज से 30-40 साल पहले जहां लड़कियां शादी से पहले भी साड़ी पहना करती थीं, वहां उन्हें शादी के बाद भी साड़ी पहनने में तकलीफ नहीं होती थी. लेकिन आज जहां लड़कियां शादी से पहले जींस और शॉर्ट्स में घूम रही हैं, उन्हें हर वक़्त साड़ी में बांधकर रख पाना संभव नहीं. रहन-सहन की आज़ादी भी टूटते परिवारों का एक कारण है. मेरी एक सहेली है, जो अपने फुल टाइम में चल रही है. उसे साड़ी पहनने में बहुत तकलीफ होने लगी है. पेट पर कसकर पेटीकोट बांधने से उसके पेट पर निशान पड़ने लगे हैं. कसकर ब्लाउज पहनने से अब उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी है. ब्लाउज तो दूर की बात है वो ब्रा भी नहीं पहन पाती. ऐसे में यदि वो दिनभर अपने कपड़ों से तंग आकर नाखुश सी घूमे तो उसे ताने पड़ते हैं कि, “घर में किसी चीज़ की कमी नहीं फिर भी मुंह फुलाए घूमती हो, बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा”. उससे भी तकलीफदेह बात ये है कि उसे अपने प्रेगनेंसी के आखिरी 4 महीनों में डायपर पहनना पड़ा. जब मुझे ये बात पता चली तो मैं न सिर्फ सुनकर हैरान थी बल्कि एक तरह से सदमे में भी थी. उसे पूरी प्रेगनेंसी में बहुत उल्टियां हुईं, जिसके कारण हर बार उल्टी होने में उसके कपड़े नीचे से भी गंदे हो जाते थे क्योंकि ब्लैडर बढ़ गया था, इसलिए उल्टी होने में लगने वाले प्रेशर से बाथरूम भी निकल जाता था. अब जितनी बार बाथरूम निकले उतनी बार साड़ी-ब्लाउज, पेटीकोट बदलना तो संभव नहीं. इसलिए उसे डायपर पहनना पड़ता था. ये बताते हुए उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे. वो बोली, “मन करता है कि इन सारे साड़ी ब्लाउज को आग लगा दूं और गाउन पहनकर घूमूं. तकलीफ तो तब होती है जब मेरी ननदें मेरे सामने नाईट-सूट में घूमती हैं. सोचती हूं मेरे शरीर के अंग क्या उनके शरीर से अलग हैं? जिन्हें इतना ज्यादा ढककर रखने की ज़रुरत पड़ती है” मेरे पास उसके इन सवालों का कोई जवाब नहीं था. हालांकि मेरी स्थिति उससे कुछ बेहतर थी. मुझे साड़ी नहीं पहननी पड़ती है. मैं सूट पहनती हूं. लेकिन सच कहूं तो अब अपनी बढ़ती प्रेगनेंसी के समय में सूट भी चुभने लगता है. अब लगता है सिर्फ गाउन पहनकर घूमो. कोई भी कपड़ा चिपका हुआ न रहे शरीर पर. लेकिन छोटे शहरों की बहुओं के लिए यह संभव नहीं. क्योंकि सारे समाज, उसकी इज्ज़त, और एक आदर्श नारी बनने का ठेका शादी होते ही हमारे माथों पर थोप दिया जाता है. जिसे हमें सारी ज़िन्दगी ढोना पड़ता है. ना चाहते हुए भी.
ऐसे में बस यही सवाल मेरे मन में भी आता है कि क्या एक ही घर में रहने वाली दो लड़कियों में इतना अंतर सिर्फ इसलिए है कि एक आपकी अपनी औलाद है और दूसरे को आप किसी और के घर से लाए हैं ताकि वो आपका घर संभाले. क्या आपकी अपनी बेटी जब प्रेग्नेंट होगी, और मायके आएगी, तब भी आप उससे कहेंगे कि बेटा साड़ी पहनकर घूमो? तुम्हारा दिखता पेट अच्छा नहीं लगता? तुम्हारा मोटा होता सीना अच्छा नहीं लगता? नहीं.
बेटी के साथ ये सब नहीं होगा क्योंकि उसके दिखते शरीर से क्या फर्क पड़ता है. वो बेटी है. और बहू? क्या उसके शरीर में कुछ अलग से लगा होता है? जिसे देखते ही आपकी नज़रों का अंदाज बदल जाता है? अगर वाक़ई ऐसा ही है तो दोष आपमें है. आपकी नज़रों में है, जो दो एक जैसे शरीरों में अंतर करता है. दोष उस बहू में नहीं है, जो अपनी प्रेगनेंसी को सेलिब्रेट करना चाहती है. घटना ज्यादा पुरानी नहीं है. अपने प्रेगनेंसी के कुछ दिन हाल ही मैंने मायके में बिताए. शाम के समय में मैं छत पर टहलने जाती थी. मेरे घर से कुछ ही दूरी पर एक और घर की प्रेग्नेंट बहु भी छत पर टहलने आती थी. क्योंकि वो बहू थी, तो इतना बड़ा पेट लेकर उसे सड़क पर जाकर घूमने की आज़ादी नहीं थी. उसका फुल टाइम चल रहा था. डिलीवरी किसी भी समय हो सकती थी. वो एक राजस्थानी परिवार से थे, इसलिए बहू ट्रेडिशनल राजस्थानी घाघरा, चोली और दुपट्टा पहनती थी. आंखों तक ढका हुआ उसका माथा लिए वो छत के चक्कर लगाती रहती थी. उसे देखकर मेरे मन में बस यही ख़याल आता था कि इतने लहराते कपड़े पहनकर यह घूमती है, किसी दिन गलती से कहीं गिर ना जाए और जिस अनहोनी का मुझे डर था वही हुआ. उसका घाघरा सीढ़ी उतरते में उसके पैरों के नीचे आया और वो गिर गई. तुरन्त अस्पताल ले जाया गया. भगवान की दया से मां और बच्ची दोनों को बचा लिया गया और अब दोनों स्वस्थ हैं. लेकिन इस हादसे के बाद मेरे मन में यही सवाल आया कि यदि बहू ने उस घाघरे की जगह कोई पैंट या लोअर पहना होता, सीढ़ियां चढ़ने की जगह उसे सड़क पर वॉक करने दी जाती तो शायद उसकी जान को जोखिम में नहीं आना पड़ता. क्या वाक़ई समाज के सालों से चले आ रहे ढांचे के सामने हम अपने लोगों की तकलीफों की परवाह करते हैं? या फिर एक आदर्श पेश करने की होड़ में हम अपनों की तकलीफों को जानकर अनदेखा कर देते हैं?
मैंने अपने आसपास कई ऐसी बहुओं को देखा है जो बहुत कुछ चाहती हैं लेकिन करती कुछ नहीं. क्योंकि उन्हें अपनी आदर्श बहु की छवि को ख़राब नहीं करना है. क्योंकि उनसे शादी के पहले ही ये शर्त रखवा ली गई थी कि तुम्हे शादी के बाद साड़ी ही पहननी पड़ेगी चाहे कुछ हो जाए. क्यों आज भी छोटे शहरों में साड़ी एक हौआ बना हुआ है?
अगर आपकी बेटी आपके सामने कुछ भी पहनकर घूम सकती है तो बहू क्यों नहीं? जिस लड़की को साड़ी ज़िन्दगी आपके घर में रहना है. अपने बूढ़े मां-बाप को छोड़कर आपकी बुढ़ापे में सेवा करनी है. जिसे आपके घर के लिए बच्चे पैदा करने हैं, क्या उसे अपनी स्वेच्छा से कपड़े पहनने का भी अधिकार नहीं? आजकल एक नया चलन चला है. “हमारी बहू तो हमारी बेटी है”. ये एक वाक्य फैशन बन गया है, लेकिन असल में जब बात बहू और बेटी के रहन-सहन, खान-पान, चाल-चलन पर आती है तो बहू-बहू बन जाती है. प्रेगनेंसी एक लड़की के जीवन में आना वाला वो दौर है जिसे हर लड़की पूरी तरह जीना चाहती है. उसका सुख लेना चाहती है. प्रेगनेंसी के दौरान वो जिन तकलीफों से गुज़री है, बेशक उसकी सास या दादीसास या ननद होने के नाते आप भी उन तकलीफों से गुज़री होंगी. आपने भी वही अनुभव किये होंगे. लेकिन आप आज से 30 साल पहले जिस तरीके से रहीं वैसे ही आपकी बहू भी रहे ये किस तरह से जायज़ है ख़ुद सोचकर देखिये. चलिए फिर आप सोचिये. मैं अगले हफ्ते आती हूं. सिर्फ इंडिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में प्रेगनेंसी से जुड़े अंधविश्वासों को लेकर.

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