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डाक यूरोप: वो मर गया, जिसके शब्द मानवता का सर झुका देते थे

उसने अपनी किताब में यूरोप के नरसंहार का जो लेखाजोखा बताया था, वो इतना भयानक था कि लोगों ने उसे सच ही नहीं माना था.

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फोटो - thelallantop
vivek 2यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा. लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरे यूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक कुमार. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको. ये उसकी शुरुआत है. इस सीरीज का नाम है डाक यूरोप. आज पढ़िए उसकी तीसरी किस्त. 
 

धंधे का जर्मन स्टाइल

ब्रेक्जिट हुआ रिफ्यूजियों के कारण. ब्रिटेन कह रहा था कि सब के सब रिफ्यूजी चले आ रहे हैं, हम नहीं लेंगे. और जर्मनी था कि रिफ्यूजियों को बाहें पसारे बटोर रहा था. 10 लाख से ज्यादा रिफ्यूजी आ गए हैं जर्मनी में. कितना बड़ा दिल है ना इस मुल्क का. अच्छा रिफ्यूजी आए कहां से हैं? उन देशों से, जहां लड़ाई चल रही है. लड़ाई लड़ी कैसे जा रही है? उन हथियारों से जो पश्चिम से गए हैं. पश्चिम यानी... अमेरिका. फ्रांस. जर्मनी. आदि. जर्मनी की मौज हो गई है. उसके हथियारों का व्यापार खूब फलफूल रहा है. जिस साल यानी 2015 में उसने सबसे ज्यादा रिफ्यूजियों को शरण दी, उसी साल सबसे ज्यादा हथियार बेचे. 2015 में जर्मनी ने 7.86 अरब यूरो के हथियार निर्यात किए थे यानी आज की कीमत में 5 खरब 87 अरब रुपये के. और यह 2014 के निर्यात से दोगुना था. अब 2016 में नया रिकॉर्ड बनाने की तैयारी है. 4 अरब यूरो के हथियार पहली ही छमाही में बेचे जा चुके हैं. और यह तब है जब सरकार ने वादा किया था कि हथियारों का निर्यात घटाया जाएगा. इस साल जो चार अरब यूरो हथियार बेचकर कमाए हैं उनमें से 1.7 अरब मिडल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका से आए हैं. यानी उन्हीं देशों से, जहां से रिफ्यूजी आते हैं. अच्छा रिफ्यूजियों को लेकर भी कई तरह की थिअरीज हैं. कुछ लोग कहते हैं कि जर्मनी को सस्ते मजदूरों की सख्त दरकार है क्योंकि यहां तथाकथित छोटे काम करने से लोग साफ इनकार कर देते हैं. अब यूं तो विदेशों से सस्ते मजदूर मंगा नहीं सकते. सौ टंटे हैं. यूरोपीय संघ के भी सैकड़ों नियम कानून हैं. फिर वे लोग मेहमान बनकर आएंगे तो उन्हें सुविधाएं भी सारी देनी होंगी. तो रिफ्यूजी बनाकर लाए गए हैं. शरणागत को तो रूखी-सूखी मिल जाए, वही बहुत. मैं सोच रहा हूं कि किसी ऐसे रिफ्यूजी के पास जाऊं जिसका बच्चा सीरिया की लड़ाई में मारा गया हो. उसे बताऊं कि उसका बच्चा जिस बारूद में जलकर राख हुआ, वह इसी बड़े दिलवाले जर्मनी से ही गया था.

वीजल का चले जाना

मोशे जब लौटकर आया तो सबने कहा, पगला गया है. इलित्जर तब लड़का सा था. लेकिन सोच में पड़ गया कि क्या ऐसा हो सकता है जैसा उसका टीचर मोशे बता रहा था. क्या ऐसा हो सकता है कि एक ट्रेन को पुलिस रोक ले. उसमें से सारे यूहदियों को उतार कर जंगल में ले जाए. और फिर काट डाले. ऐसी कहानी तो कोई पागल ही सुना सकता है. लोगों ने किस्सा सुना और भूल-भाल गए. कुछ महीनों बाद उन सबने यह सब अपनी आंखों से देखा. और धीरे धीरे वे आंखें बुझती चली गईं. इलित्जर की आंखें बची रहीं. उसने अपने सामने ही पोलैंड के ऑशवित्स में हजारों लोगों को कत्ल होते देखा. बच्चों, औरतों, बूढ़ों और बीमारों को. वह बचा रह गया, यह सब बयान करने के लिए ताकि दुनिया भूले नहीं. इलित्जर की आंखों से दूसरे विश्व युद्ध में यहूदी नरसंहार का कत्ल ए आम बयान करने वाले 1986 के नोबेल पुरस्कार विजेता एलि वीजल नहीं रहे. वीजल ने दर्जनों किताबें लिखीं. वह खुद ऑशवित्स में रहे थे. दर्द को जीने वाला जब कुछ बताता है तो बस रुला देता है. वीजल की पहली ही किताब नाइट ने पूरे यूरोप को रुला दिया था. उसमें उन्होंने नरसंहार का जो लेखाजोखा बताया था, वह इतना भयानक था कि लोगों को सच ही नहीं लगा था. एक जगह वीजल लिखते हैं कि विश्व युद्ध के बाद एक जज फेलिक्स फ्रांकफुर्टर पीड़ितों के बयान दर्ज कर रहे थे. एक पीड़ित की आपबीती सुनकर वह उसे ऐसे देखने लगे जैसे वह झूठ बोल रहा हो. पीड़ित सहम गया और चुप हो गया. फ्रांकफुर्टर ने कहा, नहीं सर मैं नहीं कह रहा हूं कि आप झूठ बोल रहे हैं, जिस भयावहता को आप बयान कर रहे हैं ना, मैं यकीन ही नहीं कर पा रहा हूं कि ऐसा भी हो सकता है. वीजल ने भी जो कुछ लिखा, उस पर भी बहुतों ने यकीन नहीं किया. एक विवाद भी रहा उनके साथ कि वह फ्रॉड थे. उनकी किताब नाइट को लोगों ने कहा कि झूठ है, गप है, कल्पना है. आरोप लगाने वाले कहते हैं कि उन्होंने यह सब अनुभव नहीं किया बल्कि गढ़ लिया. वीजल फैक्ट या फ्रॉड विषय पर कई लेख लिखे गए. सवाल उठाए गए कि जो वीजल लिख रहे हैं वह सच है या नहीं. इन सब सवालों को छोड़कर वीजल अब चले गए हैं. इसी हफ्ते उनका देहांत हो गया. 87 साल की उम्र में. लेकिन उन्होंने जो दर्द बयान किया, वह यूरोप के जहन में आज भी टीसता है. वीजल के शब्द आज भी यूरोप का सिर शर्म से झुका देते हैं. नफरतें मिटाने की बात करते करते वीजल चले गए. नफरतें आज भी हैं. उनके शब्द पूरी मानवता का सिर झुका दें तो कुछ अंधेरा छंटे.

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