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बशरत पीर, बुरहान वानी एक मासूम कश्मीरी नहीं ISIS का होने वाला दामाद था!

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे बशरत पीर के आर्टिकल के जवाब में.

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फोटो - thelallantop
न्यूयॉर्क टाइम्स में बशरत पीर का एक आर्टिकल छपा है. बुरहान वानी, भारतीय सेना और कश्मीर के घायल लोगों के बारे में. बशरत पीर कश्मीर से ही हैं. जाने-माने पत्रकार हैं. 'हैदर' फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने में ये विशाल भारद्वाज के साथ थे. इस आर्टिकल से उम्मीदें बहुत थीं. क्योंकि ये इंटरनेशनल स्तर के अख़बार में लिखा गया है. भारत की इमेज से जुड़ा हुआ है.
पर ये आर्टिकल पूरी तरह ईमानदार नहीं है. सबसे पहले तो बशरत ने भारत के लिए कश्मीर की महत्ता को ही नजरअंदाज कर दिया है. इस आर्टिकल में कहीं ये नज़र नहीं आता कि भारत के पास भी कोई वजह है वहां आर्मी लगाने की. बशरत ने जिक्र किया है कि 5 लाख के करीब सैनिक रहते हैं कश्मीर में. भारत सरकार इतना खर्चा क्यों करेगी, अगर उसके पास कोई वजह नहीं होगी?

क्या भारत ने कश्मीर में जबरदस्ती कब्ज़ा जमाया हुआ है?

आर्टिकल पढ़ने से ऐसा लगता है कि भारत ने कश्मीर में जबरदस्ती कब्ज़ा जमाया हुआ है और वहां के लोगों को प्रताड़ित कर रहा है. पर इस बात को समझते वक़्त क्या हम पाकिस्तान और आतंकवाद को नजरअंदाज कर सकते हैं? क्या ये भूला जा सकता है कि सिर्फ पाकिस्तान के चलते भारत को कितना पैसा हथियारों में बर्बाद करना पड़ा है? 1965, 1971, 1999 की लड़ाइयां और चीन से बेमतलब का उलझाव. संसद से लेकर मुंबई तक हमला. एक अनजाना डर कि देश में कभी भी, कहीं भी ब्लास्ट हो सकता है. ये चीजें सिर्फ आर्मी से नहीं जुड़ी हैं. भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करती हैं ये चीजें.
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हां, ये जरूर है कि कश्मीर में सेना की उपस्थिति में कई ऐसे कांड हुए हैं, जो नहीं होने चाहिए थे. रेप, फेक एनकाउंटर और लोगों का रोजाना सैनिकों के हाथों प्रताड़ित होना. पर ये घटनाएं हर किसी के साथ नहीं होती जैसा कि कश्मीर का जिक्र करने में दर्शाया जाता है. ये घटनाएं भी दुखी करती हैं. साथ ही वो झूठ भी जो फैलाया जाता है कि कश्मीर के हर इंसान के साथ आर्मी व्यक्तिगत रूप से दुर्व्यवहार करती है. हाँ, ऐसे मामलों से कभी इनकार नहीं किया जा सकता. आर्मी ने भी स्वीकार किया है. आर्मी ने कई मामले छुपाये तो कई मामलों में एक्शन भी लिया है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2010 वाले मामले में सैनिकों को आजीवन कारावास की सजा भी हुई है.

2010 में जब बुरहान वानी आतंकवादी बना, तभी शाह फैज़ल ने UPSC टॉप किया था

शाह फैजल
शाह फैजल

बशरत पीर लिखते हैं कि 2010 के प्रोटेस्ट के बाद ही बुरहान वानी आतंकवाद में आया. पर बुरहान वानी तो उस दौर में पैदा हुआ है, जब कश्मीर में आतंकवाद दम तोड़ चुका था. 2000 के आस-पास तो कश्मीर में आतंकवादियों की संख्या एकदम कम हो गई थी. फिर 2010 का प्रोटेस्ट अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के मामले पर हुआ था. सवाल ये है कि हर प्रोटेस्ट आर्मी पर पत्थर के साथ ही शुरू क्यों होता है? क्या कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों के लिए जगह नहीं है? क्या वो यात्रा कश्मीर की आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है? क्या कश्मीर के मुसलमान वहां बिजनेस नहीं करते? और फिर अगर पत्थर चलना न रुके, तो आर्मी को क्या करना चाहिए? और अगर पत्थर के साथ ग्रेनेड आ जाएँ, तो आर्मी क्या करे? ये पढ़ के हमेशा दुखद लगता है कि प्रोटेस्ट में गोली से लोग मारे गए. पर इसका उपाय क्या है? बातें करना. तो पत्थर चलाने वालों को ये रास्ता क्यों नहीं पसंद आता? आगे बशरत पीर ही लिखते हैं कि बुरहान वानी की मौत के बाद के प्रोटेस्ट में 50 लोग मरे हैं, 3100 घायल हुए हैं, जिसमें आधे सैनिक हैं. अगर ये कहें कि भारत कश्मीर और कश्मीरियत से अनजान है, तो अपने सैनिकों का मरना कैसे गवारा कर रहा है?
जिस साल बुरहान वानी ने बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग शुरू कर दी, उसी साल 2010 में ही कश्मीर के शाह फैजल ने सिविल सर्विसेज में टॉप किया था. फैजल के डैडी एक आतंकवादी हमले में मारे गए थे. फैजल के टॉप करने के बाद बहुत सारे कश्मीरी UPSC में सेलेक्ट हुए. 2015 के एग्जाम में मोहम्मद अतहर को दूसरी रैंक मिली और उन्हें राजस्थान कैडर मिला है. अंतर यहीं पर है.

बुरहान वानी भारत के लिए ISIS का खतरा पैदा कर रहा था

आगे बशरत पीर लिखते हैं - बुरहान वानी मात्र एक इन्टरनेट सेंसेशन था. जो AK-47 के साथ फोटो खिंचाकर फेसबुक पर डालता था. इनका 'मिलिटैंट्स का एक छोटा ग्रुप' था, जो जंगल और सोशल मीडिया में भारत सरकार को चैलेंज कर रहा था. ये एक दर्जन लड़के थे, कुछ बंदूकों के साथ, जो कि इंडियन आर्मी के लिए खतरा नहीं थे. उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है. उनकी लड़ाई सिंबॉलिक लड़ाई थी.
बुरहान वनी
बुरहान वनी

यहीं पर ताज्जुब होता है कि बशरत पीर जैसा राइटर, जो दुनिया की खबरें कवर करता है, जिसकी आने वाली किताब 'इंडिया और टर्की' पर लिखी गई है, वो इस चीज को 'छोटा ग्रुप' और 'मात्र' जैसे शब्दों के साथ देखता है. आज पूरी दुनिया में लड़ाई बन्दूक से ज्यादा सोशल मीडिया पर हो रही है. ढाका से लेकर पेरिस तक के हमलों में ISIS का कोई भी आदमी डायरेक्ट शामिल नहीं था. उन शहरों के मतांध लोग, जो ISIS को ही अपना सब कुछ मानते थे, सिर्फ वीडियो देखकर और सोशल मीडिया से मेसेज लेकर ही ISIS के आदमी बन गए.

हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर केवल फोटो खिंचाने के लिए नहीं होता

बशरत पीर ये भूल जाते हैं कि सिर्फ बुरहान वानी के फेसबुक वीडियो और स्टेटस देखकर ही कश्मीर में इतने लड़कों ने हिजबुल मुजाहिदीन जॉइन कर लिया, जितनों ने पिछले 10 सालों में नहीं किया था. उसके ऊपर जुलाई 2015 में 10 लाख का इनाम रखा गया था. आर्मी ने कई बार उसे पकड़ने की कोशिश की, पर उसका नेटवर्क इतना तगड़ा था कि हर बार बच जाता था. बुरहान वानी कोई 'पॉलिटिकल कमेंटेटर' या 'कश्मीर के इतिहास का ज्ञाता' नहीं था. जो उसकी हर बात को सरकार गंभीरता से ले. Times of India में छपी एक पुरानी रिपोर्ट की मानें तो कश्मीर के लोग दो महीने पहले ये मानते थे कि बुरहान इंडिया का ही एजेंट है, जो हिजबुल में सेंध लगा रहा है. ऐसा ही कुछ मकबूल भट के साथ हुआ था.
मकबूल भट
मकबूल भट

इंडिया की जेल से भागा था, पाकिस्तान ने कैद कर लिया. कश्मीरी उसे इंडिया और पाकिस्तान दोनों का एजेंट मानते थे. जब मर गया, तो शहीद हो गया. इसी तरह अफज़ल गुरू जब तक जिन्दा था, तब तक कोई उसे पूछने नहीं आया. जब फांसी हो गई, तो कश्मीर की आज़ादी का प्रतीक बन गया. बुरहान वानी के साथ भी यही हो रहा है. इनमें से कोई कश्मीर की प्रगति से नहीं जुड़ा है. ये क्रूर किस्म के लोग हैं. जो बन्दूक को हर बात का उपाय मानते हैं. पर जब बन्दूक पलट के उनके सामने आती है, तो खुद को चे ग्वेरा दिखाने की कोशिश करते हैं. सिर्फ बन्दूक उठाने से आप चे ग्वेरा नहीं बन जाते.

बुरहान की अम्मी की आवाज सुनी थी किसी ने?

इस पूरे प्रकरण में सबसे खौफनाक बात थी बुरहान की अम्मी का ये कहना कि मेरा बेटा इस्लाम की राह में शहीद हुआ है. ISIS ऐसे ही राह पर चलने वालों पर नज़र गड़ाए हुए है. ऐसे सारे लोगों को वो दामाद बना लेंगे. अगर मौका रहते इनको रोका नहीं गया, तो क्या हो सकता है, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है.
बुरहान के जनाजे में शामिल लोग
बुरहान के जनाजे में शामिल लोग

इस बीच पेलेट की फायरिंग में जख्मी लोगों की खबरें आयीं. बशरत पीर अपने आर्टिकल के अंत में कई घायलों का जिक्र करते हैं. ये बहुत दुखद घटनाएं थीं. पर मैं बार-बार सोचता हूं कि जब शुरुआत हुई तो प्रोटेस्ट करने वाले लोग पीछे क्यों नहीं हटे? आप क्यों जा के आर्मी से लड़ रहे हैं? क्या दिखाना चाहते हैं? कि आप आतंकवादियों के साथ हैं? और अगर कश्मीर के लोग आर्मी में रहते, तो क्या करते? पत्थर चलते तो खड़े रहते?
श्रीनगर में पत्थरबाजी के दौरान पैरामिलिट्री फोर्स के सैनिक
श्रीनगर में पत्थरबाजी के दौरान पैरामिलिट्री फोर्स के सैनिक

मुझे ये सवाल भी बार-बार मथता है कि जब बुरहान और उसके दो साथियों को आर्मी ने घर में घेर लिया था तो बुरहान क्या सोच रहा था? क्या उसे मरने का डर नहीं लगा? अपनी अम्मी-अब्बू के बारे में नहीं सोच रहा था? कश्मीर के बारे में? कि वहां एक शानदार राज्य भी बनाया जा सकता है. बिल्कुल स्विट्ज़रलैंड जैसा. आर्मी के लोग क्या सोच रहे थे? उनको डर नहीं था जब अन्दर से ग्रेनेड फेंके जा रहे थे?


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