आपको ‘गुलाल’ फ़िल्म याद है! 2009 में आई थी. अनुराग कश्यप ने डायरेक्ट किया था. इस फ़िल्म में पीयूष मिश्रा के किरदार का एक चर्चित डायलॉग है,
इस मुल्क ने हर शख़्स को जो काम था सौंपा, उस शख़्स ने उस काम की माचिस जलाकर छोड़ दी.
भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बेहाल अर्थव्यवस्था, साउथ अफ्रीका चुनाव में खेल होने वाला है?
भारत-साउथ अफ़्रीका संबंधों का इतिहास क्या है?

आज के दिन ये बात साउथ अफ़्रीका पर बख़ूबी लागू होती है. 30 बरस पहले जो पार्टी रंगभेद को हराकर सत्ता में आई थी, वो आज भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और नाकामी का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है. ये कहानी नेल्सन मंडेला की अफ़्रीका नेशनल कांग्रेस (ANC) की है. जो पिछले 30 बरसों से साउथ अफ़्रीका की सत्ता में है. बहुत संभव है कि हफ़्ते भर बाद ना रहे. क्योंकि 29 मई को साउथ अफ़्रीका में सातवां लोकतांत्रिक आम चुनाव होने जा रहा है पहली बार ANC जीत की प्रबल दावेदार नहीं है. जिस पार्टी को मंडेला ने ख़ून-पसीने से सींचकर खड़ा किया था, वो अपने ही जाल में फंस गई है.
तो, आइए जानते हैं,
- साउथ अफ़्रीका में आम चुनाव कैसे होता है?
- मंडेला की ANC सत्ता से बाहर क्यों जा सकती है?
- और, भारत-साउथ अफ़्रीका संबंधों का इतिहास क्या है?
पहले बेसिक क्लीयर कर लेते हैं. जैसा कि नाम से स्पष्ट है, साउथ अफ़्रीका, अफ़्रीका महाद्वीप के दक्षिणी छोर पर बसा है. पूरब, पश्चिम और दक्षिण दिशा में समंदर हैं. उत्तरी सीमा पांच देशों से मिलती है - नामीबिया, बोत्सवाना, ज़िम्बॉब्वे, मोज़ाम्बिक़ और स्वाज़ीलैंड. एक देश साउथ अफ़्रीका के अंदर बसा है. उसका नाम है, लेसोथो.

साउथ अफ़्रीका की आबादी लगभग 06 करोड़ 25 लाख है. 80 फीसदी लोग ईसाई हैं. 15 फीसदी किसी धर्म को नहीं मानते. बाकी के 05 फीसदी में हिंदू, मुस्लिम और दूसरे धर्मों के लोग आते हैं.
साउथ अफ़्रीका के संविधान ने 11 भाषाओं को आधिकारिक मान्यता दी है. सबसे ज़्यादा ज़ुलू बोली जाती है.
करेंसी का नाम है - रैंड. 10 रैंड में तक़रीबन 45 भारतीय रुपये आते हैं. इंटरनैशनल मॉनेटरी फ़ंड (IMF) के डेटा के मुताबिक़, साउथ अफ़्रीका की जीडीपी लगभग 32 लाख करोड़ रुपये है. प्रति व्यक्ति आय 05 लाख रुपये के क़रीब है. ये भारत से लगभग दोगुना है.
साउथ अफ़्रीका की राजधानी तीन-तीन शहरों में है.
प्रशासनिक राजधानी - प्रिटोरिया.
विधायी राजधानी - केपटाउन.
और, न्यायिक राजधानी - ब्लोमफ़ॉन्टेन.
वैसे, साउथ अफ़्रीका का सबसे बड़ा शहर जोहानसबर्ग है. इसी शहर में वांडरर्स स्टेडियम है. जहां 2003 में वनडे वर्ल्ड कप और 2007 में टी20 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल मैच खेले गए थे.
साउथ अफ़्रीका का टाइमज़ोन भारत से साढे़ तीन घंटा पीछे है. जब भारत में रात के साढ़े नौ बजते हैं, तब वहां शाम के छह बज रहे होते हैं.
भारत के साथ कैसे संबंध हैं?भारत-साउथ अफ़्रीका संबंधों ने 19वीं शताब्दी में तेज़ी पकड़ी. जब महात्मा गांधी ने वंचितों के अधिकारों के लिए सत्याग्रह किया. भारत ने रंगभेद की नीति का हमेशा विरोध किया. 1946 में भारत ने साउथ अफ़्रीका से व्यापारिक संबंध तोड़ लिए. बाद में हर तरह से प्रतिबंध लगा दिया. इसके बरक्स ANC को नई दिल्ली में दफ़्तर खोलने की इजाज़त दी गई. जब रंगभेद की नीति खत्म हुई, तब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते बहाल हुए. 1990 में नेल्सन मंडेला को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत-रत्न दिया गया.
भारत और साउथ अफ़्रीका BRICS और G20 जैसे अहम बहुराष्ट्रीय संगठनों के सदस्य हैं. लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना के बाद से दोनों के द्विपक्षीय रिश्ते लगातार मज़बूत हुए हैं.
साउथ अफ़्रीका का इतिहास क्या है?साउथ अफ़्रीका में लगभग बीस लाख बरस पुराने इंसानी बसाहट के निशान मिले हैं. जोहानसबर्ग के पास गुफाओं की एक श्रृंखला है. बीसवीं सदी में पुरातत्वविदों को वहां शुरुआती इंसानों के जीवाश्म मिले. उनमें से कुछ लगभग बीस साल पहले के थे. इसलिए, उस इलाक़े को Cradle of Humanking यानी इंसानी सभ्यता का उद्गम भी कहते हैं.
अफ़्रीका महाद्वीप से बाहर की दुनिया से साबका पड़ा, 15वीं सदी में. जब यूरोप में एज ऑफ़ डिस्कवरी शुरू हुई. यूरोप के ताक़तवर देशों को मसाले और दूसरे क़ीमती संसाधनों की तलाश थी. उन्होंने भारत के वैभव के बारे में ख़ूब सुन रखा था. अब वे वहां तक पहुंचने का समुद्री रास्ता ढूंढ रहे थे. लेकिन तब तक स्वेज़ नहर नहीं बनी थी. इसलिए, खोजियों को पूरे अफ़्रीका का चक्कर लगाकर आगे बढ़ना था. इसी क्रम में 1488 में पुर्तगाली खोजी बार्तेलमोए डियाज अफ़्रीका के दक्षिणी तट पर उतरा. 1497 में एक और पुर्तगाली वास्कोडिगामा साउथ अफ़्रीका के तट पर उतरा. जहां वो उतरा, उस जगह को नटाल का नाम दिया. नटाल का शाब्दिक अर्थ होता है, क्रिसमस.
लगभग डेढ़ सौ बरस बाद 1652 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहली कॉलोनी बसाई. इसको केप टाउन कहते हैं. डचों का ज़ोर स्पाइस रूट के लिए बेस कैंप बनाने पर था. वे अंदर घुसकर शासन नहीं करना चाहते थे. 1795 में ब्रिटेन ने केप कॉलोनी पर क़ब्ज़ा कर लिया. 1803 में उनको वापस भी कर दिया. मगर तीन बरस बाद ये फिर से ब्रिटेन के नियंत्रण में आ गया. ब्रिटेन की नीतियों से बोअर्स नाराज़ हो गए. बोअर्स डच बोलने वाले किसानों को कहा जाता था. 1830 के दशक में उन्होंने केप कॉलोनी छोड़कर उत्तर की तरफ़ पलायन किया. जहां उन्होंने ट्रांसवाल और ऑरेंज फ़्री स्टेट की स्थापना की. नाटाल पर स्थानीय ज़ुलू किंगडम का शासन था. मगर 1890 का दशक आते-आते अधिकतर इलाक़ों पर ब्रिटेन का क़ब्ज़ा हो चुका था.
1910 में केप कॉलोनी, नाटाल, ट्रांसवाल और ऑरेंज फ़्री स्टेट को मिलाकर यूनियन ऑफ़ साउथ अफ़्रीका की स्थापना हुई. अश्वेत लोगों को पहले से ही कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता था. साउथ अफ़्रीका यूनियन की स्थापना के बाद इसमें बढ़ोत्तरी हुई. अश्वेतों को ज़मीन खरीदने या दूसरे बुनियादी अधिकार हासिल करने से रोका जाने लगा. इसके ख़िलाफ़ 1912 में एक संगठन बना. उसका नाम था, नेटिव नेशनल कांग्रेस. इसको बाद में अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) के नाम से जाना गया. ANC ने अश्वेतों के अधिकारों की वकालत की. जिसके चलते गोरे शासक उससे नाराज़ रहने लगे.
फिर आया 1948 का साल. साउथ अफ़्रीका में नेशनल पार्टी की सरकार बनी. ये सरकार वाइट सुप्रीमेसी को बचाकर रखना चाहती थी. वाइट सुप्रीमेसी के समर्थक मानते हैं कि, गोरी चमड़ी वाले लोग बाकियों से श्रेष्ठ हैं. संसाधनों पर पहला हक़ उनका है. बाकी लोग दोयम दर्जे के होते हैं. ईश्वर ने उन्हें हमारी सेवा के लिए भेजा है.
साउथ अफ़्रीका में गोरे लोग अल्पसंख्यक थे. मगर शासन व्यवस्था उनके कंट्रोल में थी. 1950 तक उन्होंने गोरे और अश्वेतों के बीच शादी पर बैन लगा दिया. 80 प्रतिशत से अधिक ज़मीनों को गोरे लोगों के लिए आरक्षित कर दिया गया. अश्वेतों को सुदूर बस्ती में रहने पर मज़बूर किया गया. 1961 से 1994 के बीच लगभग 35 लाख अश्वेत लोगों को उनके घरों से निकाल दिया गया. फिर उनकी ज़मीन को औने-पौने दामों में बेच दिया गया. सरकार का आतंक यहीं तक सीमित नहीं था. गोरे लोगों के मोहल्लों में जाने के लिए अश्वेतों को स्पेशल परमिट लेना पड़ता था. उनके अस्पताल, स्कूल, एंबुलेंस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सब अलग थे. उन्हें सरकार में भी जगह नहीं दी जाती थी. पूरी दुनिया को इस घटिया नीति का पता था. मगर कोई खुलकर इसका विरोध नहीं कर रहा था. उस दौर में अमेरिका सुपरपॉवर था. उसके दबाव से बहुत कुछ बदल सकता था. मगर उसने भी अपने हित को सबसे आगे रखा. जब तक उसकी नींद खुली, तब तक साउथ अफ़्रीका के स्थानीय लोगों का आंदोलन सफ़ल हो चुका था. कई जानकार ये भी मानते हैं कि अमेरिका ने बदलती हवा को पहचान कर अपनी नीति बदली और तब उसने रंगभेदी सरकार पर आर्थिक प्रतिबंध शुरू किए.
साउथ अफ़्रीका के अंदर जो आंदोलन चल रहा था, उसको अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) लीड कर रही थी. 1950 के दशक में एक नौजवान ने ANC का रुतबा अचानक से बढ़ा दिया. उसका नाम था, नेल्सन मंडेला. उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. सरकार को ख़तरा महसूस हुआ. मंडेला को जेल में डाल दिया गया. उन्हें 27 बरस बाद 1990 के साल में रिहा किया गया. जेल के बाहर उनका नायकों जैसा स्वागत हुआ.
फिर आया 1994 का साल. साउथ अफ़्रीका में पहली बार सबको चुनाव में हिस्सा लेने का मौका मिला. ANC ने इसमें जीत दर्ज़ की. नेल्सन मंडेला मुल्क के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने. तब से साउथ अफ़्रीका में यही पार्टी सरकार चला रही है. मौजूदा समय में ANC के सिरिल रामाफ़ोसा राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे हैं.
ये हुआ इतिहास. अब पॉलिटिकल सिस्टम समझ लेते हैं.
साउथ अफ़्रीका में संवैधानिक लोकतंत्र है. फिलहाल, मुल्क 1996 में बने संविधान के हिसाब से चल रहा है.शासन-व्यवस्था तीन अंगों में बंटी हुई है.
- कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति और उनकी कैबिनेट के पास है.
- न्यायपालिका अपने आप में स्वतंत्र है.
- विधायिका की शक्ति संसद के पास है. साउथ अफ़्रीका की संसद में दो सदन हैं. भारत की ही तरह.
ऊपरी सदन को नेशनल काउंसिल ऑफ़ प्रॉविंसेस कहते हैं. इसमें 90 सदस्य हैं. ये सदस्य साउथ अफ़्रीका के 09 प्रांतों की विधानसभा द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. निचले सदन का नाम है, नेशनल असेंबली. इसके सदस्यों की संख्या 400 है. निचले सदन में बहुमत दल का नेता राष्ट्रपति बनता है. इसी नेशनल असेंबली के 400 सदस्यों को चुनने के लिए 29 मई को वोटिंग हो रही है.
कैसे होता है चुनाव?चुनाव कराने का ज़िम्मा इलेक्टोरल कमिशन के पास है. साउथ अफ़्रीका में बैलेट पेपर से वोटिंग होती है. पहली बार आम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों को खड़े होने की इजाज़त मिली है.
इसलिए, इस दफ़ा वोटर्स तीन बैलेट पेपर्स पर वोट डालेंगे. दो बैलेट पेपर नेशनल असेंबली के लिए. जबकि तीसरा प्रांतों की विधानसभाओं के लिए.
आज हमारा फ़ोकस नेशनल असेंबली पर है.
- पहला बैलेट पेपर ब्लू कलर का होगा. ये पूरे देश में एक जैसा होगा. इसके ज़रिए 200 सदस्यों का चुनाव होगा. इसपर 52 पॉलिटिकल पार्टियों के नाम होंगे. वोटर्स को उनमें से एक को चुनना है.
- दूसरा बैलेट पेपर ऑरेंज कलर का होगा. इससे बाकी के 200 सदस्य चुने जाएंगे. इन सीटों का बटवारा प्रांतों की आबादी के आधार पर हुआ. जिस प्रांत में जितनी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार रजिस्टर्ड होंगे, उनके नाम इस बैलेट पेपर पर दर्ज होंगे. जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में सीटें अलॉट होती हैं.
अभी किसके पास कितनी सीटें हैं?
> अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) - 230 सीटें.
> डेमोक्रेटिक अलायंस (DA) - 84 सीटें.
> इकोनॉमिक फ़्रीडम फ़ाइटर्स (EFF) - 44 सीटें.
> इन्काथा फ़्रीडम पार्टी (IFP) - 14 सीटें.
साउथ अफ़्रीका में प्रेसिडेंट हेड ऑफ़ द गवर्नमेंट और हेड ऑफ़ द स्टेट, दोनों होते हैं. मगर उनका चुनाव डायरेक्ट वोट से नहीं होता. वोटर्स पार्टियों के नाम पर वोट डालते हैं. जिस पार्टी या गठबंधन के पास नेशनल असेंबली में बहुमत होता है, उसी का नेता राष्ट्रपति बनता है. बहुमत का आंकड़ा 201 है. जो भी पार्टी इस चुनाव में 201 या उससे ज़्यादा सीटें जीतेगी, वो मुल्क का राष्ट्रपति चुनेगी. अगर ANC जीती तो सिरिल रामाफ़ोसा पद पर बने रहेंगे. वो 2018 से साउथ अफ़्रीका के राष्ट्रपति हैं.
ANC के अलावा कौन सी पार्टियां दावेदार हैं?> सबसे बड़ी दावेदार डेमोक्रेटिक अलायंस (DA) है. इसकी स्थापना 2000 में हुई थी. DA के नेता हैं, जॉन स्टीनसन. 2019 के चुनाव में DA को लगभग 21 फीसदी वोट मिले थे. प्री-पोल्स सर्वे की मानें तो सत्ताधारी ANC बहुमत से दूर रहने वाली है. उन्हें 40 फीसदी से भी कम वोट मिलने की संभावना है. DA साउथ अफ़्रीका को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का वादा कर रही है. उसने कई छोटी-मोटी पार्टियों के साथ गठबंधन भी किया है.
> तीसरी बड़ी पार्टी है, इकोनॉमिक फ़्रीडम फ़ाइटर्स (EFF). इसकी स्थापना 2013 में हुई. फ़ाउंडर थे, ANC के पूर्व नेता जूलियस मलेमा. EFF के पास फिलहाल 44 सीटें हैं. हंग असेंबली की स्थिति में उनकी भूमिका अहम होने वाली है.
> चौथी अहम पार्टी है, खोन्तो वी सिज़्वे (MK). ये दिसंबर 2023 में बनी है. इसके संस्थापक हैं, जैकब ज़ुमा. वो भी ANC के ही नेता थे. ज़ुमा 2009 से 2018 तक साउथ अफ़्रीका के राष्ट्रपति भी रहे. 2018 में उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. तब उनको कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. फिर सिरिल रामाफ़ोसा को पार्टी ने राष्ट्रपति बनाया था. पार्टी के अंदर ज़ुमा के वफ़ादार आज भी हैं. साउथ अफ़्रीका में उनका सपोर्ट बेस भी बना हुआ है. भले ही MK पार्टी बहुमत से कोसों दूर रहे, मगर ये ANC के वोट बैंक में सेंध ज़रूर लगा सकती है.
इस बार का चुनाव ख़ास क्यों है?1994 के बाद हुए हर चुनाव में ANC जीती है. उसी का नेता राष्ट्रपति बना है.
1994 से 1999 तक - नेल्सन मंडेला.
1999 से 2004 तक - थाबो म्बेकी.
2004 से 2009 तक - क्गालेमा मोतलांथे.
2009 से 2018 तक - जैकब ज़ुमा.
2018 से अभी तक - सिरिल रामाफ़ोसा.
हर बार ANC 50 फीसदी से ज़्यादा वोट हासिल करने में सफल रही. आशंका है कि पहली बार उनका वोट शेयर 40 फीसदी से कम हो सकता है. दरअसल, पिछले कुछ बरसों में साउथ अफ़्रीका में भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी दर में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है. ANC पर सरकारी ठेके में पक्षपात के आरोप लगे हैं. और तो और, साउथ अफ़्रीका लंबे समय से लोड-शेडिंग से जूझ रहा है. सरकार इससे निपटने में भी विफल रही है. एक और चीज़, साउथ अफ़्रीका की आबादी का बड़ा हिस्सा फ़र्स्ट-टाइम वोटर है. उसने रंगभेद वाला समय नहीं देखा है. जबकि ANC अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए आज भी पुराने संघर्षों का झुनझुना बजाती है. इस चुनाव में उनको इसका नुकसान हो सकता है.
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