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ग्राउंड रिपोर्ट : बुलंदशहर में दो दिन में ऐसा क्या हुआ कि दो लोगों की हत्या हो गई?

इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और सुमित की मौत पर क्या बोले चिंगरावठी गांव के लोग.

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सुमित (बाएं) और इंस्पेक्टर सुबोध सिंह 3 दिसंबर को हुई हिंसा में मारे गए थे.
अपने वक्त के सबसे बड़े अफसानानिगार सआदत हसन मंटो ने कहा था- जब मज़हब दिलों से निकलकर सर पर चढ़ जाए तो समझ लो नफरत की खेती फलने-फूलने लगी है. जब मैं अपने दफ्तर से बुलंदशहर के स्याना के लिए निकल रहा था, उस वक्त दिमाग में ये लाइनें कौंध रही थीं. गूगल मैप हमें स्याना का रास्ता बता रहा था और हमारी गाड़ी मैप को फॉलो करती हुई जा रही थी. रास्ते में एक जगह गाड़ी से उतरकर स्याना का रास्ता पूछा, तो वहां मौजूद लोगों ने उल्टा सवाल दाग दिया. मीडिया से हैं. जवाब सुनने के बाद लोगों ने कहा कि स्याना मत जाइए, आपको चिंगरावठी जाना है. चिंगरावठी, यानी कि वो पुलिस चौकी, जहां पर भीड़ ने हमला किया था और इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

बुलंदशहर के स्याना कोतवाली की चिंगरावठी चौकी, जहां भीड़ ने पुलिस पर हमला किया था.

चिंगरावठी से 500 मीटर दूर पहुंचने पर ही अहसास हो गया कि हम वारदात वाली जगह के पास हैं. एक बार फिर से दिमाग में मंटो की लाइनें गूंजने लगीं. और जब हम चिंगरावठी चौकी पर पहुंचे, तो हमें भीड़ की नफरत और उस नफरत से पैदा हुई खेती के निशान देखने को मिल गए. पूरी चौकी जली हुई थी और उसके पास खड़ी गाड़ियां तोड़ दी गई थीं. चौकी पर सन्नाटा पसरा हुआ था और उसके आस-पास भारी पुलिस बल तैनात था. बाहर से आए वो पुलिस के जवान स्टैंडबाई मोड में खड़े थे और अपने आला अफसरों के आदेश का इंतजार कर रहे थे. चौकी के बगल से एक रास्ता नयागांव की ओर जाता है. उस रास्ते पर तीन-चार 20-22 साल के लड़के मिल गए थे. माइक और कैमरा देखकर पास आए, लेकिन कुछ भी बोलने से इन्कार कर दिया. कहा कि वो हादसे के वक्त स्कूल में थे. तीन दिसंबर की शाम साढ़े तीन बजे जब वो स्कूल से लौटे तो चौकी जली हुई थी, इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या हो चुकी थी और इस हिंसा में उनके पड़ोसी गांव चिंगरावठी का एक लड़का मारा गया था. उन लड़कों ने बताया कि जो लड़का मारा गया है, उसकी बॉडी अभी-अभी गांव पहुंची है और पूरा प्रशासनिक अमला गांव में मौजूद है.

रिश्तेदार सुमित के पिता को घेरकर खड़े थे. प्रशासनिक अधिकारी कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह से सुमित का अंतिम संस्कार हो सके.

सुमित के घरवालों से मिलने के लिए हमलोग चिंगरावठी गांव की ओर बढ़े. स्याना से बुलंदशहर की ओर जाने वाली मेन रोड पर चिंगरावठी पुलिस चौकी से करीब 500 मीटर की दूरी पर एक रास्ता बाईं तरफ मुड़ रहा था. उस मोड़ पर पुलिस की कम से कम 10 गाड़ियां खड़ी थीं. दो बड़ी गाड़ियों में आरएएफ के जवान और महिला पुलिस मौजूद थी. हमें चिंगरावठी गांव का रास्ता पूछना भी नहीं पड़ा. अंदाजा लग गया कि यही गांव है. हम मुख्य सड़क छोड़कर गांव की सड़क पर मुड़े और आगे बढ़े. जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते थे, आम आदमी कम और पुलिस की तादाद बढ़ती जा रही थी. घर के पास पहुंचे तो कुछ लोग सड़क किनारे खड़े होकर बात कर रहे थे. पूछने पर बताया कि वो लोग रिश्तेदार हैं और सुमित की मौत की बात सुनकर वहां पहुंचे हैं. और वो कुछ ही लोग क्यों पूरे गांव में जो भी शख्स मिला, वो इस बात को मानने को राजी ही नहीं हुआ कि वो चिंगरावठी का रहने वाला है. गांव में मौजूद हर एक शख्स का कहना था कि वो रिश्तेदार है और दूसरे गांव से आया है.

सुमित का घर, जहां लोगों का मजमा लगा हुआ था. हर कोई ये जानने की कोशिश कर रहा था कि सुमित की मौत आखिर कैसे हुई.

सुमित की मौत की हकीकत जानने के लिए जब हम सुमित के दरवाजे पर पहुंचे तो गोशाला में चार-पांच भैंसे बंधी थी. खाना न मिलने की वजह से रंभा रही थीं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था. क्योंकि दरवाजे पर सैकड़ों पुलिसवाले खड़े थे और आंगन में करीब 50-60 महिलाएं दहाड़ें मारकर रो रही थीं. इन महिलाओं में सुमित की बहनें और दादी थीं. कोई भी बात करने की हालत में नहीं था. पड़ोसी के दरवाजे से हम पड़ोसी के घर और उसकी छत पर पहुंचे. वहां से दीवार फांदकर हम सुमित की छत पर पहुंचे तो वहां सुमित के रिश्तेदार मिल गए. सुमित की बहन की शादी उनके घर में हुई थी. उन्होंने बताया कि सुमित तो अपने रिश्तेदार के साथ बाइक पर बैठकर जा रहा था. रास्ते में चिंगरावठी चौकी पर भीड़ जमा थी. सुमित को भी गोली लगी और उसकी मौत हो गई. हम छत से नीचे उतरे और उस जगह पर पहुंचे, जहां पूरा प्रशासनिक अमला इस बात की रणनीति बना रहा था कि सुमित के परिवारवालों को अंतिम संस्कार के लिए कैसे राजी किया जाए. वहां पर सुमित के पिता भी मौजूद थे. उन्होंने कहा कि उनके बेटे की हत्या की गई है. पुलिस ने उनके बेटे को भी दंगाइयों में शामिल कर रखा है और वो बेटे की मौत को सही ठहरा रहे हैं. उनकी मांग थी कि सुमित का नाम दंगाइयों की लिस्ट से बाहर किया जाए, परिवार को 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, परिवार को पेंशन और एक नौकरी दी जाए.
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प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय नेताओं से घिरे सुमित के पिता (भूरे रंग के स्वेटर में)

प्रशासन की ओर से एसपी, डीएम, एडीएम और स्थानीय सांसद-विधायक मौजूद थे. आश्वासन मिला कि सुमित का नाम दंगाइयों की लिस्ट से हटा दिया जाएगा. परिवार नहीं माना, तो नई एफआईआर दर्ज की गई जो सुमित की हत्या की थी. एडीएम ने प्रशासन की ओर से पांच लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान किया और फिर सुमित का अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन सुमित की बहनें अपने भाई की मौत के लिए सीधे तौर पर इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को ही जिम्मेदार ठहरा रही थीं. वो कह रही थीं कि सुमित की मौत इंस्पेक्टर सुबोध की गोली से हुई है. वो बदहवास थीं और इसी बदहवासी में वो पुलिस के खिलाफ अपना गुस्सा उतार रही थीं. सुमित की दादी सिर्फ एक ही जिद कर रही थीं कि सुमित को लौटा दो. लेकिन जाने वाले को कौन वापस लेकर आ पाया है. जिसे जाना था, वो जा चुका था. सुमित भी और सुबोध कुमार सिंह भी. जा तो भीड़ भी चुकी थी. लेकिन लोगों के जेहन में खौफ तारी था. और यही खौफ उन्हें ये कहने से रोक रहा था कि वो लोग उसी चिंगरावठी गांव के रहने वाले हैं, जिस गांव के बच्चे की हत्या हुई है.

सुमित का आंगन, जहां महिलाएं दहाड़े मारकर रो रही थीं.

लेकिन इसी खौफ के बीच एक शख्स बोलने के लिए तैयार हुआ. वो उस गांव के कोटेदार थे. उन्होंने कहा कि गांव को तो बेवजह बदनाम किया जा रहा है. हिंसा करने वाले तो महाब और नयागांव के लोग थे. लेकिन मौत उनके गांव के बेटे की हुई है, तो अब सबका ध्यान चिंगरावठी पर टिका हुआ है. लेकिन इस पूरे वारदात के पीछे कौन लोग हैं, के सवाल पर वो चुप मार गए. बहुत कुरेदने पर बोले कि गाय काटी गई थी और उसके अवशेष खेत में फेंके गए थे. नयागांव और महाब के लोग जानवरों के अवशेष लेकर पुलिस चौकी पहुंचे. वहां हंगामा हुआ और भीड़ ने पुलिसवालों पर हमला बोल दिया. उनके गांव का लड़का सुमित को अपने रिश्तेदार को छोड़ने के लिए गया था, लेकिन उसे गोली लग गई और उसकी मौत हो गई.

Bulandshahar में हुई Inspector Subodh Singh और Sumit की हत्या के बाद The Lallantop की Ground Report

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गांव में मौजूद कुछ और भी लोगों ने कोटेदार की इस बात की तस्दीक की. लेकिन इस बात की तस्दीक करने वाला कोई नहीं था कि गोकशी किसने की है. इस बात की तस्दीक करने वाला कोई नहीं था कि ये एक सुनियोजित घटना भी हो सकती है, जिसमें गोकशी करने उनके अवशेष इस तरह टांग दिए जाएं कि वो दूर से ही दिखने लगें. इस बात की भी तस्दीक करने वाला कोई नहीं था कि ये मांस उस इज्तेमा में मौजूद लोगों को सप्लाई किया गया है, जो वहां से 50 किलोमीटर दूर है. तस्दीक सिर्फ इस बात की हो रही थी कि सुमित की मौत गोली लगने से हुई है. तस्दीक इस बात की हो रही थी इंस्पेक्टर भी भीड़ के हाथों मारे गए थे. और तस्दीक इस बात की हो रही थी कि वहां मौजूद लोग अपनी सियासी रोटियां सेकने की कोशिश कर रहे थे.

गांव के लोग, जो कुछ भी खुलकर बोलने को राजी नहीं थे.

सुमित और इंस्पेक्टर सुबोध की मौत की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है. एसआईटी तो उस अखलाक की हत्या की जांच के लिए भी बनाई गई थी, जिसकी हत्या की जांच खुद सुबोध कुमार सिंह ने की थी और कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में इंस्पेक्टर सुबोध गवाह नंबर सात थे. जांच है, चलती रहती है. नतीजे आते रहते हैं और उन नतीजों को कोर्ट में चैलेंज किया जाता रहता है. अब इन तीनों गांवों चिंगरावठी, नयागांव और महाब के लोग कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाएंगे. ये साबित करने की कोशिश करेंगे कि जिस भीड़ ने ये दंगा किया था, वो उनमें से नहीं थे. लेकिन हकीकत ये है कि अब इंस्पेक्टर सुबोध और सुमित इस दुनिया में नहीं हैं. पूरा स्याना इलाका अब भी पुलिस छावनी में तब्दील है, लेकिन इंस्पेक्टर सुबोध सिंह और सुमित के घरवालों ने जो खोया है, ये उन्मादी भीड़ कभी उसकी भरपाई नहीं कर पाएगी. और अगर इस भीड़ पर चढ़ा हुआ मज़हब का मुलल्लमा जल्दी नहीं उतरा तो ये भीड़ और भी जाने लेगी और भी घरों में मातम फैलाएगी और हम यूं ही मूक दर्शक बने रहेंगे.

घर वालों का आरोप बुलंदशहर में पुलिस की गोली से हुई सुमित की मौत

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