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'कानपुर की चमड़ा फैक्ट्रियों से निकलने वाले पानी ने हज़ारों लोगों को बीमार किया है'

सोपान जोशी की बेस्टसेलर ‘जल थल मल’ को लेकर लल्लनटॉप की दोस्त मनु स्मृति का टेक.

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कानपुर में गंगा में समाता कचरा (तस्वीर: www.reporteratlarge.org)
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे मनु स्मृति

मनु स्मृति सिंह भारतीय हैं, वैज्ञानिक हैं और इस्राइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च कर रही हैं. सोपान जोशी की किताब 'जल थल मल' लिखने के बाद इनके जहन में जो आया है, हमें लिख भेजा है. लोकसभा चुनाव 2019 के छौंक के साथ.

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मुझे भारत से दूर रहते करीब 9 साल होने को हैं. दुनिया और ख़ासकर भारत मे निरंतर बदलते घटनाक्रमों को जानने का माध्यम मेरा लैपटॉप मात्र है.
ज़ाहिर सी बात है कि मैं शाम के प्राइम टाइम मे होती तू-तू-मैं-मैं से बच जाती हूं. मैं डिसाइड कर सकती हूं कि निरपेक्ष तरीके से सिर्फ़ न्यूज़ जानूं- जैसा कि 90 के दशक मे 15 मिनट की दूरदर्शन वाली न्यूज़ करती थी. हालांकि साल में घर-वापसी के दौरान एक से दो बार चिल्लम-चिल्ली कान मे पड़ती है और सच कहूं तो दिमाग़ खराब हो जाता है. घर वालों से यही कह कर आती हूं कि शाम के समय कुछ भी करिए पर ये सर में दर्द और हार्ट अटैक पैदा करने वाले चैनलों से कोसों दूर रहें. पर इंडिया को लगता है सास-बहू सीरियल देखते-देखते ड्रामा देखने-सुनने की आदत डीएनए मे समा गई है. जुमले-बाज़ी, एक-दूसरे को नीचा दिखा, नफ़रत फैला और सरासर सरेआम झूठ बोल कर ही अगर कोई वोट ले सके- तो आपका लीडर तो चतुर है, पर आप क्या हैं? -डिसाइड कर लें.
बुद्धू बक्से को देखते देखते बुद्धू बनने से बेहतर है कि यदा-कदा किताबें पढ़ लें, टीवी डिबेट से बचेंगे तो वक़्त भी बचेगा और आधा पाव खून भी. लल्लनटॉप के सौरभ द्विवेदी, जो मेरे मित्र भी हैं, ने मुझे करीब दो वर्ष पहले 'जल थल मल' पढ़ने को कही थी. इसे लिखा है सोपान जोशी जी ने जिनकी महात्मा गांधी पर लिखी दो किताबें- 'एक था मोहन' और 'बापू की पाती' बिहार सरकार ने बच्चों के लिए पढ़ना निर्धारित की हैं.
खुशकिस्मत रही कि पिछले साल किताब की चित्रों वाली प्रति मिली. राजकमल प्रकाशन की इस किताब में खूबसूरत चित्रांकन किया है सोमेश कुमार जी ने. सोपान जी की हिन्दी सौम्य है और शुचिता के वो पटल खोलती है जिन्हें हम वर्षों से देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं.
किताब जल थल मल
किताब जल थल मल

कहानियों के ताने-बाने हमें हड़प्पा जैसी पुरानी सभ्यताओं से ले कर लेह-लदाख में पारंपरिक खाद के तरीके और वाशिंगटन डीसी की सीवर लाइन्स बिछने तक के ऐतिहासिक दौरे पर ले चलती है. कैसे लंदन की थेम्स नदी से उठती बदबू (द ग्रेट स्टिंक) ने महारानी विक्टोरीया और बगल मे स्थित संसद भवन की नाक मे दम कर दिया जिसके चलते 1858 मे सीवर लाइन्स को थेम्स नदी से इतर करने की 'शल्या चिकित्सा' हुई! भारतीय रेलवे का मल निष्कासन और जाति-विशेष समुदाय का सदियों से सफाई का काम करना मुझे अपने समाज की सच्चाई का आईना दिखा शर्मिंदा कर गया. रसायनशास्त्रियों द्वारा बनाये केमिकल्स की कहानी जो हम आज भी कई रूप में खुद भी उपयोग करते हैं और पर्यावरण सहित तमाम जीवों को भी उनसे सराबोर कर देते हैं.
हमने, हमारे नेताओं और तमाम रईस व्यवसाइयों ने पर्यावरण में ज़हर घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. नदियां नालों में तब्दील हैं. मल जैसी कीमती खाद को पानी में बहा के हम केमिकल खाद निर्यात कर रहे हैं. ऐसे कई आंखें खोलने वाले सच सामने आएंगे. जुमलेबाज़ी के ज़माने में हमने सही सवाल ही पूछने बंद कर दिए हैं! ऐसी किताबें पढ़ के आप अपने नेता से तर्क कर सकते हैं. अपना न सही, आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए, उनके बेहतर स्वस्थ्य के लिए ऐसी किताबें पढ़ें, कुछ पेड़-पौधे लगाएं, सवाल पूछें.
मैं जर्मनी और इजराइल मोटा-माटी 4-4 साल रही हूं. दोनों ही देशों में ग्रीन पार्टी हैं. ये राजनैतिक पार्टियां हैं, जो पर्यावरण के मद्देनज़र, अपने मैनिफेस्टो में लॉन्ग टर्म पॉलिसी शामिल करती हैं. क्या हम भारत में अपने नेताओं से एक भी ऐसा सवाल पूछते हैं? पूछिए कि कानपुर के चमड़े फैक्ट्रियों से निकलने वाले केमिकल पानी ने हज़ारों लोगों को बीमार किया है, अपने भावी सांसद से पूछें की उनके क्या प्लान हैं इस बारे में?
क्लाइमेट चेंज को चाहे मोदी जी या ट्रम्प जी मानें या न मानें, एक वैज्ञानिक होने के नाते मैं जानती हूं कि जलवायु तेज़ी से बदल रही है और पृथ्वी पर यह बदलाव शुरू हो चुका है. यह बदलाव हम 7 अरब लोगों के सपने पूरे करने के चक्कर में ही हुआ है. इसमें किसी आतंकवादी का हाथ नहीं है. इसे हम इंसानो ने बिगाड़ा है, हमें ही सुधारना होगा.
जोशी जी की इस बेहतरीन किताब हाथ मे आते आते वक़्त तो लगा लेकिन इसको पढ़के बहुत ज्ञान वर्धन हुआ. आप सब भी पढ़ें और इस कड़ी को आगे बढ़ाएं. अंत में सौरभ को मुझे ये किताब रेकमेंड करने के लिए और सोपान जी को हमें यह किताब देने के लिए बहुत शुक्रिया.

किताब का नाम: जल-थल-मल

लेखक: सोपान जोशी

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प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन

उपलब्धता: राजकमल

मूल्यः 269 रुपए (पेपरबैक)

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