माधुरी बोस का जन्म कोलकाता में हुआ और वहीं पलीं-बढ़ीं. माधुरी, शरत चन्द्र बोस और उनके छोटे भाई सुभाष चन्द्र बोस की पौत्री हैं. जादवपुर यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद जिनेवा के ग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से की. तीन दशकों से वह मानवाधिकार की अधिवक्ता के तौर पर कार्य कर रही हैं और इस बीच उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन, जिनेवा, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, पूर्वी अफ्रीका तथा लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय को अपनी सेवाएं दी हैं. प्रोफेशनल तौर पर वह मानवाधिकार संबंधी विषयों पर बराबर लिखती रही हैं.
बोस बंधु और भारतीय स्वतंत्रता किताब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शरत और सुभाष चंद्र बोस की भूमिका का इतिहास बताती है. इसका सोर्स अमीय नाथ बोस के निजी वृत्तांत हैं. अमीय, बोस बंधुओं से पारिवारिक रूप से तो क़रीबी थे ही, साथ ही वे उनके राजनीतिक सहयोगी और भरोसेमंद दूत भी थे. आइए पढ़ते हैं बोस बंधु और भारतीय स्वतंत्रता के कुछ अंश-
बोस बंधु और भारतीय स्वतंत्रता- पुस्तक अंश
शरत की निजी जिन्दगी में भी सक्रियता और चुनौतियों की कमी नहीं थी. सुभाष के साथ 1934 के मध्य से उनके सचिव के तौर पर काम करने वाली आस्ट्रियन मूल की महिला एमिली शेंकल ने उन्हें 12 मार्च 1946 को पत्र लिखकर बताना चाहा कि सुभाष से उनका विवाह जनवरी 1942 में बर्लिन में हुआ था और उसी साल नवंबर में उन्हें एक पुत्री हुई, जिसका नाम अनीता है. प्रिय महोदय, आपको किसी अनजान व्यक्ति का पत्र पाकर आश्चर्य होगा. लम्बे समय तक संकोच करने के बाद मैंने आपको पत्र लिखने का फैसला किया है, जिसका संबंध हम दोनों के परिवार से है. इस पत्र में आगे मैं आपको यह पूरा मामला समझाना चाहती हूं. मैंने आपके स्वर्गीय भाई सुभाष चन्द्र बोस के साथ 1934 में काम करना शुरू किया था. तब वह अपनी पुस्तक दि इंडियन स्ट्रगल पर काम कर रहे थे और मैं तब उनकी सचिव थी. शायद आप यह जानते हों कि इसके बाद वह जब कभी यूरोप में रहे, मैं उनके साथ काम करती रही. आपके भाई 1941 में फिर से यूरोप आए और उन्होंने मुझसे जानना चाहा कि क्या मैं उनके साथ काम करने के लिए बर्लिन आ सकती हूं? मैं इस पर सहमत हो गई और अप्रैल 1942 में उनके पास चली आई. हम 1942 की शरद ऋतु तक साथ काम करते रहे. जब मैं बर्लिन में ही थी, तभी आपके भाई ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनसे विवाह करना चाहूंगी? चूंकि वर्षों से मैं उन्हें सच्चरित्र व्यक्ति के तौर पर जानती रही थी और हम दोनों के बीच आपसी समझ भी थी और हम दोनो ही एक-दूसरे को चाहते थे, मैंने हामी भर दी. इसमें एक ही कठिनाई थी, वह थी इसके लिए जर्मन सरकार से आवश्यक अनुमति प्राप्त करने की. हालांकि मैं जन्म से आस्ट्रियन हूं, पर उस समय जर्मन प्रजा थी और इसलिए जर्मन कानून का पालन मेरे लिए आवश्यक था. तब किसी जर्मन नागरिक को किसी विदेशी से विवाह करने की अनुमति मिलना बेहद कठिन था. और चूंकि हम दोनों इसके लिए किसी का एहसान नहीं चाहते थे, ना ही इस ममाले का बतंगड़ बनाना चाहते थे, इसलिए हमने आपस में ही इसे निबटाने का फैसला किया और जनवरी 1942 में हिन्दू विधि से हमारा विवाह हो गया. इस पूरे मामले को गुप्त रखा गया. केवल दो दोस्तों को ही इसका पता था. 29 नवम्बर 1942 को हमारी बेटी हुई. इससे पहले सितम्बर में मैं वियना लौट आई थी ताकि जर्मन अधिकारी इस बारे में मुझसे बेवजह पूछताछ कर मुझे परेशान न करते रहें. इसी वजह से मैंने अपना विवाह पूर्व नाम और राष्ट्रीयता भी बनाए रखे हैं. हमारी पुत्री का नाम अनीता ब्रिगीटा है. हालांकि उसका नाम अमिता होना था, पर जर्मन अधिकारियों को इस तरह के असामान्य नाम से निश्चय ही आपत्ति होती और इसीलिए मैं उसका नाम अनीता रखा, जो अमिता से मिलता-जुलता है. इसमें ब्रिगीटा जोड़ने की वजह यह रही कि जर्मन में ब्रिगीटा का लघु रूप गीटा (गीता) है. दुर्भाग्य से आपके भाई अपनी पुत्री को सिर्फ एक बार ही देख पाए, जब वह सिर्फ चार हफ्ते की थी. 1943 में यूरोप से जाने से पहले वह वियना आकर अपनी पुत्री से फिर से मिलना चाहते थे, पर उन्हें यहां से अचानक रवाना होना पड़ा और वह अपनी पुत्री से फिर से मिले बिना ही चले गए. उनके यूरोप छोड़ने से पहले तीन सप्ताह तक मैं उनके साथ रही, पर तब मैं अनीता को अपने साथ नहीं ला सकी थी. पूर्व की ओर रवाना होने से पहले उन्होंने इस संबंध में आपको पत्र भी लिखा और मुझसे उसकी एक प्रति (फोटो) सम्भाल कर रखने को कहा और हिदायत दी कि यदि उन्हें कुछ हो गया तो यह पत्र मैं आपको भेज दूं. यह पत्र बांग्ला में लिखा गया है और इसमें उनके विवाह तथा उनकी पुत्री के जन्म की सूचना दी गई है. दुर्भाग्यवश फिलहाल किसी तरह का दस्तावेज या फोटो विदेश भेज पाना संभव नहीं है, इसलिए मैं आपको व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखकर पूरी बात बता रही हूं. भविष्य में जब कभी फोटो भेजने की अनुमति होगी, मैं आपको उस पत्र की तस्वीर के साथ बच्चे की तस्वीर भी भेजूंगी ताकि आप देख सकें कि यह बच्ची देखने में कैसी है. मैं अब अपनी जीवन शैली के बारे में आपको बताना चाहूंगी ताकि आप जान सकें कि आपके भाई की पुत्री को मैं किस तरह से पाल रही हूं. यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि मैं आपसे या आपके पिरवार से किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मांग रही हूं. इस पत्र को लिखने का कारण सिर्फ इतना है कि आप इस बच्ची के बारे में जान लें ताकि मुझे यदि कुछ हो गया तो उसके साथ किसी का सहारा रहे. हालांकि मुझे पूरी आशा है कि मैं जिउंगी और अपना जीवन यापन भी करूंगी, जब तक कि अनीता बड़ी होकर खुद अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती है. मैं फिलहाल वियना के ट्रंक आफिस में क्लर्क के तौर पर काम कर रही हूं. यहां मेरा मेरा पद अंग्रेजी तथा फ्रेंच के दुभाषिये का है. मेरी मासिक आय दो सौ आस्ट्रियन शीलिंग है. मैं अपनी मां के साथ रह रही हूं जिन्हें मेरे पिता के निधन के बाद से नगर पालिका से पेंशन मिलती है. इस तरह हमारे सामने किसी तरह की आर्थिक समस्या नहीं है. भोजन एवं कपड़े आदि की समस्या यदि है भी तो वह विश्व में चौतरफा अभाव के कारण है. अनीता फिलहाल स्कूल जाने लायक नहीं हुई है. वह जब छह साल की हो जाएगी, उसे प्राथमिक उपसंहार स्कूल में दाखिला लेना होगा. बाद में भी मेरी कोशिश होगी कि मैं उसे अपनी क्षमता अनुसार अच्छी से अच्छी शिक्षा दिला सकूं. वह एक होशियार बच्ची है और मैं समझती हूं कि मैं उसकी इतनी मदद जरूर कर सकूंगी कि उसका भावी जीवन आसान बना रहे. आपके भाई की इच्छा के अनुरूप उसे ईसाई धर्म की दीक्षा नहीं दी गई है. वह हम दोनों को एक दिन भारत लेकर जाना चाहते थे और तब उसका पालन हिन्दू बालिका के तौर पर ही किया जाना था. हालांकि हो सकता है कि मुझे स्कूल में उसके दाखिले से पहले उसे ईसाई धर्म की दीक्षा दिलानी पड़े क्योंकि संभवतः अब उसे यूरोप में ही रहना होगा और किसी धर्म का न होना उसके लिए बाद में समस्या बन जा सकती है. आपको यह जानकर खुशी होगी कि अनीता बिलकुल ही अपने पिता पर गई है. उसकी आंखें, मुंह और नाक उसके पिता जैसे ही हैं. उसकी आंखों का रंग अपने पिता के मुकाबले थोड़ा हल्का है. उसके बाल श्यामल हैं (आप उन्हें सनहला कह सकते हैं). उसका रंग भी अपने पिता के मुकाबले थोड़ा हल्का है और कोई भी उसे देख कर तत्काल समझ सकता है कि वह यूरोपीय नहीं है. तीन साल की बच्ची के स्वभाव का बारे में फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता है कि उसमें बेहद अच्छी आत्मा का वास है. वह बेहद कोमल हृदय, दूसरों की सहायता करने वाली और प्यारी है. साथ ही उसमें दढ इच्छा शक्ति है. मैं कह सकती हूं कि उसका स्वभाव भी अपने पिता के जैसा ही है. वह धर्मिक प्रवृति की है और पूजा करना उसे पसन्द है क्योंकि शुरू से उसे ईश्वर में विश्वास करना सिखाया गया है. हालांकि उसकी कुछ बुराइयां भी हैं. इस दुनिया में कौन ऐसा है जिसमें कोई बुराई न हो? यदि आप इस पत्र के पाने की सूचना मुझे दे सकें तो मैं आपकी आभारी होउंगी. कृपया यह भी बताएं कि आप और आपका परिवार कैसे हैं? क्या आपकी आदरणीय माता अभी जीवित हैं? यदि आप सही समझें तो उन्हें मेरा और मेरी पुत्री का प्रणाम कहें. आपका पुत्र अमीय कैसा है? वह फिलहाल भारत में है या इंग्लैंड में? भारत के मौजूदा हालात के बारे में हम यहां के समाचार-पत्रों में काफी कुछ पढ़ते रहते हैं. रेडियो पर भी उनके बारे में सुनते हैं. स्वाभाविक तौर पर मुझे भारत के बारे में जानना अच्छा लगता है, पर साथ ही मैं इस बात को लेकर दुखी भी हो उठती हूं कि युद्ध उपरांत उसे भी आस्ट्रिया की तरह ही कठिनाइयां झेलनी पड़ रही हैं. चूंकि मैं सुनती हूं कि भारत भुखमरी से गुजर रहा है, ऐसे में मैं आशा करती हूं कि खुद आपकी और आपके परिवार की स्थिति उतनी बुरी नहीं होगी. यहां मैं बताना चाहूंगी कि आपके भाई की मौत की खबर सुनकर मैं बेहद हतप्रभ और दुखी हुई. मेरे लिए तो उनकी मौत के साथ ही वह एकमात्र व्यक्ति चला गया जिसे मैं वाकई प्यार करती थी और जिसका आदर करती थी. फिर भी मैं उन भारतीय महिलाओं का तरह नहीं रह सकती, जिनका पति चला गया हो क्योंकि मुझे यूरोप में ही रहना है और यहीं रहकर अपना जीवन यापन करना है. इस कारण मेरा लोगों के साथ मिलना-जुलना जरूरी हो जाता है. और फिर मैं कोई ऐसा तमाशा भी नहीं कर सकती क्योंकि यहां कोई मेरी भावना समझ ही नहीं पाएगा. इसके अलावा यह मामला अभी तक छिपा हुआ है. लेकिन अपनी स्मृतियों में मैंने उनका मंदिर बना रखा है और उनकी बच्ची की बदौलत वह हमेशा मेरे लिए जीवित रहेंगे. बच्ची को लेकर आपकी कोई सलाह हो या आप कुछ और भी जानने चाहें तो कृपया मुझे जरूर बताएं. आपके प्रश्नों का जवाब या अन्य कोई जानकारी देने में मुझे खुशी होगी. इस संदर्भ में मैं आपसे सिर्फ इतना ही चाहूंगी कि आप मुझे कुछ पारिवारिक चित्र भेज दें ताकि अनीता के बड़ी होने पर मैं उसे उसके पिता के परिवार के बारे में कुछ जानकारी दे सकूं. आपको और आपके परिवार को मेरी शुभकामनाएं. सादर भवदीय एमिली शेंकल शरत की तरफ से इसका जवाब न मिलने पर एमिली ने 15 मई और 1 अगस्त 1946 को यह पत्र उन्हें फिर से भेजा. तब उन्हें शरत की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला. बाद में पता चला कि इनमें से कोई भी पत्र शरत को मिला ही नहीं. इस बीच वियना में रह रहे भारतीय डॉ. अकमत ने सुभाष की पत्नी तथा पुत्री तथा उनकी कठिनाइयों के संबंध में नेहरू और सरदार पटेल का ध्यान दिलाने का बीड़ा उठाया. डॉ. अकमत और उनकी पत्नी एमिली और अनीता से परिचित थे. 11 एवं 13 अगस्त 1947 को, एक तरह से स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर शरत को क्रमशः नेहरू और सरदार पटेल की ओर से डॉ. अकमत का संदेश प्राप्त हआ. शरत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहा कि यदि यह जानकारी सही है तो सुभाष की अनुपस्थिति में वह उनके परिवार का भार खुद उठाने में सक्षम हैं. इस तरह अगस्त 1947 में जब शरत भारत के विभाजन की विभीषिका और बंगाल के बंटवारे की त्रासदी से जूझ रहे थे, उन्हें उन लोगों से, जो अब उनके राजनैतिक शत्रु थे, यह सुनने को मिला कि सुभाष अपने पीछे अपनी पत्नी और बच्ची को यूरोप में छोड़ गए हैं. शरत यह भी समझ रहे होंगे कि जो लोग सुभाष के भारतीय राजनीति में लौटने को लेकर आशंकित हैं, वे उन्हें बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहेंगे.
किताब का नामः बोस बंधु और भारतीय स्वतंत्रता
लेखकः माधुरी बोस
प्रकाशकः सेज भाषा
उपलब्धता: सेज
मूल्यः 325 रुपए (पेपरबैक)
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