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आपने कभी वेश्यावृति में फंसी लड़कियों को घर बुलाके बच्चों से मिलवाया है?

कुछ सवाल हैं 'द ग्रेट इंडियन लिबरल' से..

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symbolic image, क्रेडिट: Reuters
ऋषभ
ऋषभ
ये ऋषभ श्रीवास्तव हैं. दी लल्लनटॉप के नए साथी. खूब पढ़ते हैं. खूब लिखते हैं. नॉलेज वाला हिस्सा ऋषभ का अच्छा-खासा भरा हुआ है. और ये लगातार उसे भर ही रहे हैं. साथ ही लिख भी रहे हैं. ऋषभ के मन में कुछ सवाल हैं, जिसके जवाब उन्हें भी नहीं पता. और शायद बहुतों को नहीं पता. पढ़िए और बताइए. क्या आपके पास इन सवालों के जवाब हैं?



 
वजह जो भी हो पर कहीं न कहीं हम अपने आप से कतराते हैं. अपने आप से सवाल करने में. अपने आप को कटघरे में खड़ा करने में. कुछ सवाल हैं जो हम दूसरों से पूछते हैं. क्योंकि हमारे पास जवाब नहीं हैं. और जो लोग हमसे आगे हैं वो जवाब देते नहीं. कभी कभी लगता है कि हमारे जैसे मूढ लोगों को वो उसी हाल में छोड़ देना चाहते हैं ताकि अपने प्रगतिशील होने का दंभ भरा जा सके. राम के लिये रावण जरूरी है. बैटमैन के लिए जोकर.
लगने के बावजूद कुछ सवाल हैं 'द ग्रेट इंडियन लिबरल' से, जो समाज से ऊब चुके हैं. वो ऊबन मिटाते हैं 'मूढ' लोगों को कोसकर. पर सवाल नहीं मिटते हैं:
1. आप बताइए कि कितनी वेश्यावृत्ति में फंसी लड़कियों को आपने घर पर बुलाया है और अपने बच्चों से परिचय कराया है कि देखो ये भी इंसान हैं, इन्हें भी दोस्त बना सकते हो.


 
2. आपने अपने बच्चों को प्रेरित किया है क्या लिव इन में रहने को? अगर समर्थन करते हैं तो प्रेरित भी करना पड़ेगा. ये बहाना नहीं चलेगा कि उनकी च्वॉइस है और उनके दिमाग में चतुराई से डालते रहें कि गलत है.


 
3. क्या आपने अपनी बीवी ज्यादा कमाऊ चुनी थी? क्या आप अपने बच्चों के पॉटी का ख्याल रखते थे?


 
4. हमारे बेटों को दबे रंग वाली लड़कियों से प्यार क्यों नहीं होता? हमारी लड़कियां जो शुक्ला, राय, सिंह, माथुर होती हैं. उनको पासवान, राम, पासी से प्यार क्यों नहीं होता?


 
5. अपने बच्चों से सेक्स के बारे में बात की है आपने कभी?


 
6. अपनी लड़की के लिए ब्रा पैंटी कभी खरीदा है आपने? इसमें कुछ आपत्तिजनक नहीं है ना? फिर क्यों नहीं खरीदा? या खरीदा है?


 
7. अपने ही घरों में लड़कियां 12 साल की होने के बाद दुपट्टा क्यों लेने लगती हैं? घर में किससे खतरा है?


 
(मैं बस सवाल पूछ रहा हूं. क्योंकि जवाब नहीं है मेरे पास. जज्बाती बात कहने का मकसद नहीं है. क्योंकि मैंने ये देखा है कि बिन मां की लड़की के अंडरगारमेंट्स के लिए उसके पिताजी पड़ोस की औरतों का सहारा लेते थे, परंतु प्रगतिशील थे.)
हम सबके नारे 'अमर रहें' वाले ही हैं. कोई भगत सिंह को लेके इमोशनल है, कोई प्रगतिशीलता को लेकर. जीवन में उतारना दुष्कर होता है. इंसान न्यूरोटिक हो जाता है उतारते-उतारते.
ये सारी इंटेलेक्चुअल बातें नवाबी शौक हैं. जैसे अलीगढ़ फिल्म में प्रोफेसर साहब का जीवन दिखाया गया है. पर क्या उस रिक्शेवाले का कोई नजरिया नहीं है? क्या वो गे था? या शादीशुदा बच्चेवाला था? क्या वाकई में किसी का गे एमएमएस आ जाए रिक्शेवाले के साथ, तो समाज स्वीकार कर लेगा? क्या एक गे, एक वेश्या को आप घर में रेंटर बनाएंगे? अभी तक क्यों नहीं बनाया?
बहुत सारी बातें हैं जो सबकुछ गड्डमड्ड कर देती हैं. कहने सुनने के लिए अच्छा है पर करने के लिए? सवाल ये है कि जीवन में कितना उतारा है? शुरू से ही प्रगतिशील थे या बाद में हुए? जब नहीं थे तब क्या करते थे? कैसे बदले? सदाशयता और विनम्रता कहां से आयी? कैसे आएगी? बताते क्यों नहीं? कैसे किया ये बताइये. क्योंकि मूढ लोगों के प्रति आपकी घृणा जरूर बयान करती है कि आप शुरू से ऐसे नहीं हैं.
सवाल करना सबसे आसान काम है. सच है. पर जवाब देना भी आसान है. कैसे वहां तक पहुंचे, ये बताना मुश्किल है. क्योंकि बहुत दिनों तक ये सारा ठीकरा पढ़ाई के माथे फोड़ा जाता रहा. पर अब साबित हो चुका है कि पढ़ाई से इसका कोई लेना देना नहीं.

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