द्वितीय विश्व-युद्ध ख़त्म होने के बाद भारत में माहौल बड़ा ही रोदलू सा हो गया था. लोग लसराये रहते थे. नेता लेंझड़िया गए थे. लग रहा था अब देश को कोई बचा नहीं सकता. अंग्रेज और क्रूर हो गए थे. जनता को कुछ पता ही नहीं चल रहा था कि क्या हो रहा है. टैक्स हर साल बढ़ जाते थे. जमीनें जब्त हो जाती थीं. गरीबी सपने में भी नाचती थी. ऐसे ही वक़्त में आये थे मोहनदास करमचंद गांधी. पढ़िए क्या हुआ उसके बाद:
1. अफ्रीका के जेम्स बॉन्ड गांधी आये इंडिया

महात्मा गांधी अफ्रीका में
साउथ अफ्रीका से आये थे. अफ्रीका गए थे 20 दिन के लिए. एक केस के सिलसिले में. रह गए 20 साल. वहां एक अंग्रेज ने उनको लात मारी थी. गांधी ने इस लात का बदला बड़ा जमा के दिया. वहां पर भारत से गए बहुत लोग थे. उनके साथ अंग्रेजों का व्यवहार बड़ा ही बुरा था. भारतीयों को ID कार्ड ले के घूमना पड़ता था. गांधी ने सबको इकठ्ठा किया. बोले कि लड़ेंगे. वहां के भारतीयों में सिर्फ गांधी को अंग्रेजी आती थी. खूब मेहनत की. सबके पेपर बनाये. अंग्रेजों के साथ एक बात थी कि वो कानून खूब बघारते थे. गांधी ने इन्हीं कानूनों का इस्तेमाल किया. पता था कि मासूम जनता को लेकर लड़ाई कानून से ही लड़ी जा सकती है. तो इंग्लैंड से लेकर अमेरिका तक चिट्ठी लिख भेजी. इज्जत वापस पाई. ये आसान नहीं था. अंग्रेज तो सिर पर चढ़े ही थे, हिन्दुस्तानी भी गांधी के सिर हो लेते. एक पठान तो इनसे इतना नाराज हुआ कि बीच रोड पर मारने लगा. कपड़े फाड़ दिए. गांधी ने सब बर्दाश्त कर लिया. ये ट्रेनिंग थी उनकी. 50 की उम्र में भारत आकर बड़ी लड़ाई जो लड़नी थी.
2. शुरू हुई गांधीगिरी, सब हैरान थे
जब मोहनदास भारत आये तो यहां के नेताओं को बड़ी उम्मीदें थीं उनसे. पर मोहनदास का अलग स्टाइल था. तुरंत कूद नहीं पड़े. पहले पूरी स्टडी की. चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में किसानों और मजदूरों की मांगें मनवा लीं अंग्रेजों से. अंदाज़ वही था. कलक्टर कहते कि यहां आना मना है. गांधी सन्देश भेजवा देते कि जा रहे हैं दस बजे, गिरफ्तार कर ल्यो. जनता गांधी के अंदाज पर भौंचक थी. मुस्कुराते थे लोग. पहले कलक्टर से डर लगता था. अब गांधी बाबा के साथ खड़े रहते और सोचते कि क्या ऐसा भी हो सकता है कि सामने-सामने बात करें?
1919 में अंग्रेज 'रौलेट एक्ट' लेकर आये. इसमें था कि किसी को भी पुलिस जब चाहे तब उठा सकती है. बिना किसी चार्ज के. इरादा था कि कोई क्रांतिकारी ना बनने पाए. देश में लोग फ्रस्टिया गए. किसी को भी धर लिया जाता था. गांधी ने तय किया कि अप्रैल 1919 में इसके खिलाफ 'सत्याग्रह' 'होगा. ये सब कुछ गांधी स्टाइल में होना था. शांतिपूर्ण ढंग से. मार खानी है, खा लो. हाथ ना उठाना. अपनी बात कहना. सब चल रहा था. इसी दौरान पंजाब के जालियांवाला बाग़ में एक सभा हो रही थी. तसल्ली से. कोई दिक्कत नहीं थे. तभी अचानक से पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया. किसी को जब तक कुछ समझ आता, गोलियां चलनी लगीं. पुलिस अफसर डायर वहां खड़े होकर डायरेक्शन दे रहा था. किसी को कोई मौका नहीं मिला. कोई बात नहीं हुई. कोई लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट नहीं. नो हेल्लो चेक. सीधा गोली. जो बच गए, उनको घुटनों पर चलवा के मैदान से बाहर खदेड़ा गया.

गांधी ने अपना आन्दोलन वापस ले लिया. लोग एकदम नाराज हो गए कि यही तो मौका था. झपट पड़ने का. बदला लेने का. गांधी बाबा ने ये क्या किया? यही वो दौर था, जब कुछ लोगों ने कहना शुरू किया कि गांधी अंग्रेजों के एजेंट हैं. उनका काम अंग्रेजी राज को बनाये रखना है.
पर गांधी को पता था कि जनता ज्यादा देर तक झेल नहीं पाती गोलियां. और अंग्रेजों के पास ताकत बहुत है. सबसे अजीब बात तो यही थी कि अंग्रेजी सेना में हिन्दुस्तानी सिपाही थे, जो एक ही इशारे पर अपने ही लोगों को मार डालते. ऐसे में कैसे लड़ाई की जाती?
3. चौरी-चौरा और गांधी पर आरोप
गांधी ने इंतजार किया. मौका मिला. 1919 में अंग्रेजों ने फिर ड्रामा शुरू किया. बोले कि अब हम लोग यहां चुनाव करवाएंगे. और धर्म के आधार पर कैंडिडेट खड़े किये जायेंगे. एक धर्म का आदमी दूसरे धर्म वाले को वोट नहीं करेगा. अब गांधी ने 1920 में फिर माहौल बनाया. इस बार तैयारी की 'असहयोग आन्दोलन' के लिए. इरादा साफ़ था. अंग्रेजी राज हिन्दुस्तानियों के दम पर ही चल रहा था. जब हेल्प नहीं करेंगे तो सरकार बैठ जाएगी. शुरू हो गया. सरकार लड़खड़ाने लगी. आन्दोलन एकदम पीक पर था. बौखलाहट में पुलिस सबके पीछे पड़ गई. गांधी का सख्त आदेश था कि हम लोग हिंसा नहीं करेंगे. पर भीड़ तो भीड़ होती है. बहकावे में आ जाती है.
फ़रवरी 1921 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में एक उन्मादी भीड़ ने पुलिस थाना फूंक दिया. उसमें पुलिसवाले जल के मर गए. गांधी ने आन्दोलन वापस ले लिया.
कुछ लोगों के लिए अब कन्फर्म हो गया कि गांधी को अंग्रेजों ने ही भेजा है. 'क्रांतिकारियों' का काम लगाने के लिए. पर गांधी की वही थ्योरी थी. हम अपने आदर्श से पीछे हट नहीं सकते. अगर हटेंगे तो अंग्रेजों को मौका मिल जायेगा. फिर हम उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे. हमें अपना तरीका बरक़रार रखना है.
4. जनता गांधी बाबा पर फ़िदा हो गई
उस वक़्त देश में खलबली मची हुई थी. किसान, साधु, व्यापारी, भिखारी सभी गांधी बाबा के भक्त थे. प्रतापगढ़ में बाबा रामचंद्र ने किसानों को इकट्ठा कर लिया था कि अब बढ़ा हुआ टैक्स नहीं देंगे. पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. तभी एक अफवाह उड़ गई कि रामचंद्र को छुड़ाने गांधी बाबा खुद आ रहे हैं. जनता मतवाली एकदम जेल के पास पहुंच गई. दर्शन करने. पुलिस ने रामचंद्र को छोड़ दिया. उन्होंने बाहर आकर सब क्लियर किया.
उस वक़्त कांग्रेस पर 'सवर्ण हिन्दुओं' की पार्टी होने का आरोप लगता था. तो शुरू हुई मुसलमानों को जोड़ने की कवायद. 1922 में हिंदुस्तान के मुसलमानों ने तुर्की में खलीफा के खिलाफ अत्याचार को लेकर 'खिलाफत आन्दोलन' शुरू किया. गांधी ने इसमें फुल सपोर्ट किया. लोगों का इतना भरोसा था कि मुसलमान औरतों को समझाने सिर्फ गांधी जाते थे. किसी और मर्द का उनके कमरे में जाना मना था. गांधी मस्जिद में अपने भाषण देते थे. ये गांधी की एक कोशिश थी मुसलमानों को अपने साथ लेकर चलने की. पर इस कोशिश ने उनके दुश्मन बना दिए. हिन्दुओं में भी और मुसलमानों में भी.
गांधी बाबा को लेकर जनता में बड़ी कहानियां थीं. कि बाबा पानी पर चलते हैं. एक कोढ़ के रोगी को छूकर ठीक कर दिया. उनको देख लो तो 'सरग' मिलेगा. लाठी लेकर आये हैं. अंग्रेजों को मारकर भगायेंगे. उनकी लाठी चला के मार दो, वापस आ जाती है.
पहले ये सब पढ़ते थे तो बड़ी हंसी आती थी. अब रोने को दिल करता है. इतने सालों बाद जनता के लिए कुछ भी तो नहीं बदला है. अभी भी जनता कितने ही अरमानों से किसी के भी पीछे चल देती है. कितने ही लोग ठग रहे हैं. हर कोई गांधी नहीं होता.आगे पढ़ेंगे, उन नौजवानों के बारे में जिन्होंने भारत में जवानी की परिभाषा बदल दी.
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