
विवेक आसरी
यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.


यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.
लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरे यूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक आसरी. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको.
वादे के मुताबिक वो लाए हैं 'डाक यूरोप' की सातवीं किस्त. बता रहे हैं कि प्रेम का जश्न दरअसल औरतों की बेवफाइयों का जश्न है. जर्मनी के कोलोन में हुए फिल्म फेस्टिवल का हासिल है ये, जहां कोई भारतीय फिल्म नहीं थी. बांचिए.
छोड़कर चली गईं औरतों के कंधों पर प्रेम का इतिहास खड़ा है. ये इतिहास पिरामिड जैसा है, जिसकी चोटी पर मर्द बैठा है. प्रेमिका, पत्नी, मां, बहन, भाभी, दोस्त, पड़ोसन जाने किस-किस से धोखे खाया एक नायक. फिर उसी बेवफा पर मरता नायक, फिर उसी को जिंदगी बताता नायक. और जिसका पिरामिड जितना बड़ा, वो प्रेम का उतना बड़ा नायक. जिसे जितनी ज्यादा औरतों ने छोड़ा, वो उतना बड़ा नायक.
नायक बड़ा तब होता है, जब उसके सामने खलनायक बड़ा हो. इसलिए उसने छोड़ जाने को इतना बड़ा अपराध बना दिया कि उसका नायकत्व, छोड़े जाने से और बड़ा हो गया. छोड़े जाने का अपना दर्द गा-गाकर उसने रागनियों और सिंफनियों का जश्न रचा. प्रेम का जश्न दरअसल औरतों की बेवफाइयों का जश्न है, इसलिए जब 'एल' फिल्म में एल अपने पति की कार को जान-बूझकर ठोकती है, तो वो एक बेवफा औरत ही लगती है जो अपने पति को छोड़ चुकी है. लेकिन, अगले ही सीन में वो अपने उसी पति को अपने साथ हुए बलात्कार के बारे में ऐसे बताती है, जैसे किसी दोस्त को दिल्ली के मुनीरका में चेन स्नेचिंग के बारे में बता रही हो.

पुलिस के पास जाने की बात पर उसका रिऐक्शन और भी मजेदार है: इसमें पुलिस क्या करेगी, इट हैपन्स. और तब आपको अहसास होता है कि एल सिर्फ छोड़कर जा रही औरत नहीं है. एल ऐसी औरत है जो छोड़कर जाने से मना कर देती है. जो कहती है कि नहीं जाऊंगी. रहूंगी और अपनी शर्तों पर रहूंगी. 'एल' के रूप में डच फिल्मकार पॉल वरहोवन बेवफाई का ऐसा जश्न रचते हैं, जिसमें बोनफायर के चारों ओर नाचने वाला छोड़ा जाने वाला मर्द नहीं, बल्कि छोड़कर गई औरत है.
एक ऐसी औरत जो अपने रेपिस्ट के पास दोबारा जाती है और तिबारा और तब तक जाती है, जब तक उसे यकीन नहीं हो जाता कि उसका रेपिस्ट सेक्स नहीं, हिंसा से खुश होता है. और एक कातिल की बेटी एल को हिंसा मंजूर नहीं. हिंसा को एल माफ नहीं करती.
फिल्म देखकर बाहर निकलने पर 'एल' बालों को सहलाती एक प्रेमिका लगती है जो कब आपके बाल खींचकर उखाड़ देगी, आप नहीं जानते. और तब आप देखते हैं कि कोलोन फिल्म फेस्टिवल में ऐसी औरतें तो बहुतायत में हैं. बल्कि, पूरा फेस्टिवल ही छोड़कर जाने से मना कर देतीं औरतों का उत्सव है. अपनी बेवफाइयों का जश्न मनाती औरतों का उत्सव.
क्लेबर मेंडोंचा की 'एक्वेरियस' में 65 साल की क्लारा हो या कैली राइशार्ट की 'सर्टेन विमिन' में लॉरा डर्न, आप महसूस कर सकते हैं कि ये औरतें मांग नहीं रहीं, छीन रही हैं. ये औरतें गुहार नहीं लगा रहीं, लड़ रही हैं. और ऐसी ही औरतों को तो मर्द बेवफा कहता आया है न. आंगेला शानेलेक की 'द ड्रीमलाइक पाथ' में जब केनेथ अपनी बीमार मां के लिए टेरेस को छोड़ जाता है तो वो इंतजार नहीं करती, जिंदगी में आगे बढ़ जाती है. रोमानियाई फिल्म 'सिएरानेवादा' में क्रिस्टी पुइऊ की प्रोटैग्निस्ट दोआमना अपने पति से कड़वे सवाल पूछने से नहीं डरती. बच्चों के सामने भी नहीं.

ये सारी औरतें विद्रोही नहीं लगतीं. समाज से बाहर भागने की इनकी कोई कोशिश नजर नहीं आती. सब की सब समाज के अंदर रहकर अपनी शर्तों पर जीने का, सवाल पूछने का और बेवफाई का बराबर हक लेती हैं बस. इन औरतों में एक भी भारतीय क्यों नहीं थी? कोलोन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में एक भी भारतीय फिल्म क्यों नहीं थी?