“अल्केमिस्ट का क्या है कि जिस तरह कस्तूरी मृग अपने सरीर के अन्दर की कस्तूरी के लिए पूरे जंगल में ढूंढती रहती है लेकिन वह यह नहीं जानती कि वह कस्तूरी उसके सरीर के अन्दर है बस इसी प्रकार अल्केमिस्ट का नायक अपनी भीतरी यात्रा की खोज में पूरी दुनिया में घूम रहा है इस पर धर्मवीर भारती की दो लाइने हैं कि ‘भटकोगे बेबात कहीं, लौटोगे हर बार यहीं पर’.”
अलंकार मिश्रा, पुजारिनी प्रधान, विजय कुमार और ‘एलीट्स’ के हाथों से फिसलता इंटरनेट?
गांव-कस्बों और छोटे शहरों के क्रिएटर्स इंटरनेट कल्चर को बदल रहे हैं.

ये धर्मवीर भारती, पाउलो कोएल्हो और कस्तूरी मृग का कोलैब करवाने वाले अलंकार मिश्रा हैं. दर्शन यानि Philosophy की गाढ़ी बातों को बड़ी आसानी से (मैं यहां आसान भाषा में लिखना चाह रहा था लेकिन खुद का ज्यादा प्रमोशन हो जाता) समझाते हैं.
लोग कहते हैं कि सुकरात और शेक्सपियर खुद अलंकार मिश्रा से कॉपी करते हैं. कहा जाता है कि इस अलंकार के बारे में हमारे हिंदी टीचर ने नहीं पढ़ाया था.


अलंकार की रीलें वायरल हैं. वीडियो के कॉमेंट्स में वो बातें हैं जो एक क्रिएटर सुनना चाहता है. रीलों पर इतने व्यू आ रहे हैं कि बड़े-बड़े मार्केटिंग वाले लार चुआ दें. मिलियन-मिलियन में नंबर्स हैं. अब तक तमाम ऐड एजेंसीज, मार्केटिंग वाले अलंकार के इनबॉक्स में घुस गए होंगे और हम और आप जब बात कर रहे हैं, शायद कोई Ad डील साइन हो रही होगी.
पुजारिनी प्रधान, बंगाल की एक क्रिएटर हैं. सोशल मीडिया पर वह फेमिनिज़्म, क्लासिक फ़िल्मों, धर्म और साहित्य जैसे कठिन टॉपिक्स पर आमतौर पर अंग्रेजी में वीडियो बनाती हैं. वीडियोज़ में किसी तरह का लाग-लपेट, लल्लो चप्पो नहीं होता बल्कि वो खाना बनाते, बच्चे की देखभाल करते और घर के काम करते हुए वीडियोज़ बनाती हैं.
पुजारिनी अभी प्राइम वीडियो की सीरिज़ ‘ग्राम चिकित्सालय’ के प्रमोशनल वीडियो में नज़र आई थीं. लोगों ने इसे अपनी जीत की तरह ट्रीट किया था. लोगों को लगता है जैसे हमारे बीच से निकले किसी इंसान ने दुनिया जीत ली हो.
वहीं “शॉर्ट्स” को सच में शॉर्ट करने वाले क्रिएटर विजय कुमार यानि Vijay3Guy हैं. अपने कट-टू-कट और छोटे-छोटे से कॉन्टेंट के लिए खूब वायरल रहते हैं. इन दिनों विजय लंदन गए हैं, विम्बल्डन देखने और उनकी रील पर इस “विजय” को अपनी जीत की तरह सिलेब्रेट करने वाले खूब लोग हैं.
अलंकार, पुजारिनी और विजय तीन अलग-अलग दुनिया के लोग हैं लेकिन इन तीनों क्रिएटर्स में कई चीजें कॉमन हैं. तीनों एक बने-बनाए खांचे को तोड़ते हैं. साथ ही वो एक ‘दिखावे’ को चैलेंज करते हैं, जो इंस्टाग्राम के साथ चला आ रहा है. सालों से माहौल बना कि रील बनाने के लिए आपके पास फैंसी सेटअप होना चाहिए, अच्छा कैमरा. अच्छी लाइटिंग होनी चाहिए, एडिटिंग ऐसी होनी चाहिए कि नोलन भी आकर आपके पैर पकड़ ले. लेकिन इन तीनों ने इसे गलत साबित कर दिया. वो कहते हैं ना कि ‘पढ़ने वाले कहीं भी पढ़ लेते हैं’, वैसे ही ‘रील बनाने वाले कहीं भी बना लेते हैं.’
ऐसा नहीं है कि जैसी रीलें ये तीनों बना रहे हैं, वैसी रीलें पहले नहीं बनती थीं. फिलॉसफी की, फिल्मों की, फ़ेमिनिज़्म की, हर तरह का कॉन्टेंट अधिकतर एक ख़ास तबका बना रहा था. इंस्टाग्राम पर कब्ज़ा ‘एलीट’ लोगों का था. अंग्रेजी में बतियाते, महंगे पॉडकास्ट माइक लगाकर चार दोस्तों के साथ गप्प मारते ‘साउथ दिल्ली-साउथ मुंबई’ के ये कॉन्टेंट क्रिएटर बहुत थे और काफी हद तक हमारी फीड्स पर इनका ही कब्ज़ा था. कस्बों से आने वालों की रीच काफी हद तक बस लिप-सिंक तक थी.
सिर्फ़ इतना ही नहीं एलीट्स के कब्ज़े में बिज़नेस भी था. ज़्यादातर ब्रांड डील्स उनके हिस्से ही गिरतीं थीं. ‘रेस 3’ में डेज़ी सिंह ने कहा था कि “Our business is our business, none of your business.” मगर छोटे कस्बों से आए क्रिएटर्स ने ये भी दिखा दिया कि बिज़नेस भी बस ‘उनका’ यानि एलीट्स का नहीं है और फिलॉसफी या गहरी बातों को डिस्कस कर कॉन्टेंट बनाना भी एलीट लोगों की बपौती नहीं है. इंटरनेट पर एलीट गेटकीपिंग टूट रही है. जिसके चलते ये भ्रम भी टूट रहा है कि कोई भी ट्रेंड या इंटरनेट पर क्या डिस्कस करना ‘कूल’ होगा और क्या नहीं.

कॉमिक कॉन, मार्वल-DC की फिल्मों, F1 रेस, नासा-इसरो के मिशन्स, Anime, Manga, The Kardashians, GTA, UFC, Taylor Swift, K-Pop, Stoicism, Absurdism, FIFA जैसी पॉप-कल्चर की चीजों को गहराई और दिल से करने वाले क्रिएटर्स अब छोटे शहरों से भी निकल रहे हैं. इन लोगों ने ये भी दिखा दिया कि अब इंटरनेट शिफ्ट हो गया है और अब इंटरनेट का कल्चर छोटे शहर के लोग भी तय करेंगे. वो अब बस प्रोडक्ट नहीं हैं, जिन्हें कुछ बेचा जाए, बल्कि ‘ट्रेंड सेटर’ भी हैं.
गांव-कस्बों और छोटे शहरों के लोग इस तरह के कॉन्टेंट में ज़्यादा इसलिए भी दिखने लगे हैं क्योंकि वे हमेशा से इस तरह का कॉन्टेंट देखते, पढ़ते और सुनते आए थे. कई मामलों में वो बेटर भी रहते थे क्योंकि उनके पास शहरी लोगों की तुलना में ध्यान भटकाने की कम चीजें थीं.
फर्क बस इतना है कि उनकी आवाज़ इंटरनेट का हिस्सा नहीं बन पाती थी. लेकिन अब छोटे शहरों से आए लोगों के पास खुद को एक्सप्रेस करने का एक मीडियम है, जैसे इंस्टाग्राम, यूट्यूब वगैरह.
इस बात को ‘मेहनत रंग लाती है’, ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ जैसी बातों से ख़त्म नहीं करूंगा. कई बार मेहनत रंग नहीं भी लाती और जिनकी हार हुई है, वो भी कोशिश तो कर ही रहे थे. लेकिन फिर भी ये ज़रूर कहूंगा कि आने वाला समय छोटे शहरों से आने वाले कॉन्टेंट क्रिएटर्स का है और ‘एलीट्स’ के हाथों से इंटरनेट की पकड़ फिसल रही है.
इसका मतलब ये नहीं कि स्टूडियो, कैमरे और हाई-प्रोडक्शन कंटेंट खत्म हो गए हैं या हो जाएंगे. MrBeast भी चल रहा है और येती की कहानियां सुनाते, भविष्य बताते पॉडकास्ट भी. फर्क बस इतना है कि अब मुकाबला एकतरफा नहीं रहा. इंटरनेट लोकतांत्रिक पहले भी था, दिखना लोकतांत्रिक अब हुआ है.
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