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अखिलेश, हमको भी साइकल लेने के लिए बचपन में बहुत पापड़ बेलने पड़े थे

ये तो हमेशा का है, अखिलेश कौन से नए हैं, कभी किसी को पापा ने ऐसे ही साइकल थोड़े दिला दी थी.

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फोटो - thelallantop
अब तो मजाक बनने लगा है. फेसबुक वाले भी कह रहे हैं, अखिलेश यादव के घर में कोई पॉलिटिकल झगड़ा नहीं चल रहा है. अखिलेश यादव ने भी वही मांगा है जो हममें से हर किसी ने अपने बचपन में कभी न कभी मांगा है. साइकल! हम पांच बरस की उम्र में मांगते थे, अखिलेश यादव अब मांग रहे हैं. हमारे घरों में साइकल मांगना पहला विद्रोह माना जाता है. बाद में ये विद्रोह च्यूइंगम खाने और अपनी मर्जी से बाल कटाने की ओर बढ़ता जाता है. अखिलेश यादव आज जिस दौर से गुजर रहे हैं, हम भी उसी दौर से कभी गुजरे हैं, हमें उनसे सहानुभूति है, हमको पता है कितना बुरा लगता है जब पापा के हाथ में होते हुए भी वो साइकल नहीं दिलाते. उनका दुःख हम सबका साझा दुःख है.
अखिलेश यादव कौन से नए हैं? किस बाप ने पहली ही बार मांगने पर बच्चे को साइकल दिला दी है? साइकल मांगना और साइकल मिल जाने के बीच का जो टाइम होता है न वो सबसे मुश्किल होता है. उसके भी कई चरण होते हैं, जिनको बारी-बारी से कम्प्लीट करना होता है. सबसे पहले आप साइकल खोजते हैं, किसी पड़ोसी की, बड़े भाई-बहन की. दूधवाले की. अखबार वाले की. उस पर हाथ साफ करते हैं. पहले लुढ़काना सीखते हैं, हैंडल संभालना सीखते हैं. फिर कैंची चलाना सीखते हैं. ऐसा करते हुए आपको ख्याल रखना होता है कि जब तक साइकल चलाने का कांफिडेंस न आ जाए, तब तक साइकल चलाते हुए घरवाले न देखें. ये भी देखना होता है कि जिसकी साइकल आप इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे भी इतना नेम-प्रेम बना रहे कि वो साइकल छूने दे.
फिर आपको एक गुरु मिलता है, जो बताता है एक बार गिर जाओ. फिर साइकल चलानी आने लगेगी. अखिलेश को वो गुरु रामगोपाल के रूप में मिला है, जो उनका सारा डर खत्म करना चाहता है. लेकिन ऐसा होता नहीं है. जरूरी नहीं कि साइकल से गिरकर ही साइकल चलाना आए. कभी-कभी बड़ी चोट भी लग जाती है. एक बार आपको साइकल चलाना आ जाए तो ये तय करना होता है कि पापा साइकल चलाते देख लें, उन्हें महसूस हो कि इसे तो साइकल चलाना आता है. इसे साइकल दिलवा देनी चाहिए. आपके मन में ये तर्क होते हैं कि सबके पास तो साइकल है, पापा देख लें कि मैं दूसरे की साइकल चला रहा हूं तो मुझे मेरी साइकल दिला देंगे. पर ऐसा होता है क्या? नहीं. उल्टे साइकल चलाते देख लिया जाए तो आपको हड़काया जाता है, आपके अरमानों पर नौ मन पानी पड़ जाता है. खुद की साइकल तो दूर आवारागर्दी के इल्जाम लगकर दूसरे की साइकल छूना भी मना हो जाता है.
या आप कोशिश करते हैं पहले मां को मनाएं, उनसे सिफारिश लगवाएं. मां के पास जाकर साइकल की डिमांड रखना भी बहुत मुश्किल काम होता है. देखना पड़ता है, उनके और पापा के बीच तनाव जैसी कोई बात तो नहीं है. ब्रह्माण्ड के सारे नक्षत्र अपनी-अपनी जगह पर हैं या नहीं. उनका मूड ठीक है या नहीं. सरकारी दफ्तरों में भी फाइल ऐसी क्या फंसती है जैसी मां के पास फंसती है. वो भूल जाएंगी, बताते-बताते रह जाएंगी, कहेंगी तो पापा फोन में व्यस्त होंगे. उनको मौसी की ननद के बेटे के जन्मदिन में पीले स्वेटर भेजना याद रहेगा आपकी साइकल नहीं. और पापा तक अच्छे से बात पहुंचाने के एवज में वो आपसे सब करा लेंगी, आप बिना ना कहे दिन में तीन बार सब्जी लेने जाएंगे. फ्रिज की किसी भी बोतल का पानी गले तक भी कम न होने देंगे.
लेकिन तभी एक चीज और है जो पता चलती है वो ये कि इस नश्वर संसार में हर चीज आपके और आपकी साइकल के बीच में खड़ी है.
1. साइकल चलाने के लिए सड़क जगह नहीं है. 2. कहां चलाओगे? 3. स्कूल के लिए बस आती ही है. 4. अभी इतने बड़े नहीं हुए हो. 5. अभी छोटी वाली चाहिए, दो साल बाद बड़ी वाली मांगोगे. 6. बर्बाद हो जाओगे. 7. पढ़ोगे कब? 8. छोटे रह जाओगे. 9. स्कूल का होमवर्क तो पूरा होता नहीं कभी. 10. इस बार 90% से ऊपर ले आओ. दिला देंगे.
और ये जो 90% वाली बात होती है न. वहीं हौसले पस्त हो जाते हैं. पिता को ये मानना चाहिए, कि नहीं है हमारे जीन्स में वो वाली संरचनाएं जिनके कारण मार्कशीट में 90% बन जाता है. और अगर आप 90% ले भी आएं तो वो कहेंगे इस साल नहीं अगले साल. पांचवी पास हो जाओ. आपको पता भी न लगेगा कब ये पांचवी आठवीं में बदल जाएगा. कब 90% 95 में बदल जाएगा. अब हर चीज जाकर आपकी साइकल से जुड़ जाएगी. शैतानी की तो साइकल नहीं आएगी, टेस्ट में आठ नंबर आए साइकल नहीं मिलेगी. दूध नहीं पिया साइकल नहीं दिलाएंगे. टीवी का रिमोट मांगा साइकल नहीं मिलेगी. शरारत बहन ने की, पीटे आप गए, चोट आपको लगी साइकल आपको नहीं मिलेगी. बुखार हो गया, सर्दी हो गई, स्वेटर नहीं पहना था साइकल नहीं मिलेगी.
तो आप अपनी तरफ से कितने भी बेहतर बन जाओ. किसी चींटी का भी रोआं दुखी करने से बचो. इतने सज्जन हो जाओ जितने मोहनीश बहल लेकिन साइकल आपकी खतरे में ही रहेगी. ब्राजील के किसी उप जिले में कोई बच्चा साइकल से गिरकर नाखून तुड़वा लेगा तो डर के मारे आपकी साइकल आना एक साल टल जाएगी. बंबई का स्टॉक एक्सचेंज 10 नंबर गिरेगा, जाने कैसे उसका असर पापा के मूड पर पड़ेगा और आपकी साइकल की बात चलते तक वो फट पड़ेंगे.
एक मौक़ा आएगा जब आप रो पड़ेंगे, मान लेंगे कि अब तो साइकल मिलनी ही नहीं है. तब कहीं कुछ करिश्मे जैसा होगा और एक रोज़ साइकल घर पहुंच जाएगी. बस अखिलेश उसका वेट करें. अगर कर सकें तो बाकी भले मुख्यमंत्री हो या कोई हो. पापा ऐसे साइकल नहीं दिलाते. ये बात मान लें, हम अपना झेला हुआ सच बता रहे हैं. वैसे एक उपाय है. अखिलेश चाहते हैं कि उनके मन की हो जाए तो अपनी वाली पार्टी के घोषणापत्र में इस बार लिखवा दें. लैपटॉप-मोबाइल बहुत हुआ. अबकी बार जो सरकार बनी तो पांचवी पास होते ही स्कूली बच्चों को सरकार तरफ से साइकल दिलवा देंगे. जाते हैं. धन्यवाद. Chat conversation end ;)

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