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पीएम मोदी ने भी चेतावनी दे दी, जानिए वो 5 रेड फ्लैग्स, जो आपको कंगाल होने से बचाएंगे

Digital Arrest Scam: क्या एक वीडियो कॉल आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ में डाल सकती है? CBI या पुलिस बनकर आने वाले इस नए साइबर फ्रॉड की पूरी सच्चाई जानिए. पढ़ें 5 खतरनाक रेड फ्लैग, पीएम नरेन्द्र मोदी की चेतावनी और वो जरूरी कदम जो आपकी मेहनत की कमाई बचा सकते हैं.

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आपकी मोबाइल स्क्रीन ही आपकी जेल बन रही है!

खबर की शुरुआत करने से पहले जरा कल्पना कीजिए… शनिवार की सुबह है. छुट्टी का दिन. आप बेड पर लेटे हैं, हाथ में कॉफी का मग है और फोन पर इंस्टाग्राम स्क्रॉल कर रहे हैं. तभी फोन वाइब्रेट होता है. नंबर अनजान है. लेकिन कॉलर आईडी पर मोटे अक्षरों में लिखा है- CBI हेडक्वार्टर या मुंबई क्राइम ब्रांच.

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दिल हल्का सा धड़कता है. सोचते हैं, कहीं किसी काम से तो कॉल नहीं आया? फोन उठाते हैं. उधर से भारी आवाज आती है, पूरी रौबदार.

मिस्टर शर्मा, आपके नाम से भेजे गए एक FedEx पार्सल में 200 ग्राम ड्रग्स मिला है. आप मनी लॉन्ड्रिंग केस के मुख्य संदिग्ध हैं. कॉल मत काटिएगा. आपकी लोकेशन ट्रेस हो रही है.

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बस यहीं से शुरू होता है असली खेल. आपके दिमाग में हजार सवाल. ड्रग्स? पार्सल? मेरा नाम? मैंने तो कुछ भेजा ही नहीं. घबराहट में आवाज सूख जाती है. सामने वाला आपको एक Skype लिंक भेजता है. और कहता है, 

अभी वीडियो कॉल जॉइन कीजिए.

आप कॉल जॉइन करते हैं. स्क्रीन पर एक कमरा दिखता है. पीछे भारत सरकार का लोगो (Logo). एक शख्स पुलिस की वर्दी में बैठा नजर आता है. साइड में कोई टाइप कर रहा है. माहौल पूरा ऑफिस जैसा.

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वह कहता है, 

जांच पूरी होने तक आप डिजिटल अरेस्ट में हैं. कैमरा बंद नहीं करेंगे. किसी को कॉल नहीं करेंगे. अगर नियम तोड़ा तो तुरंत गिरफ्तारी होगी.

आपको लगता है, सच में कुछ बड़ा हो गया है. लेकिन सच्चाई ये है कि आप किसी कानूनी जांच का हिस्सा नहीं हैं. आप एक मनोवैज्ञानिक अपहरण के शिकार हो रहे हैं. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने में इसी तरह के फ्रॉड को लेकर लोगों को चेताया है. उन्होंने कहा कि 

आजकल ठग तकनीक का इस्तेमाल करके लोगों को डराते हैं, अलग-थलग करते हैं और उनकी मेहनत की कमाई हड़प लेते हैं. ये अपराध दिखता डिजिटल है, पर असल में खेल दिमाग का है.

बेंगलुरु की एक टेक प्रोफेशनल महिला ने इसी तरह के कॉल पर भरोसा किया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता 48 घंटे तक वीडियो कॉल पर बैठी रहीं. परिवार से बात नहीं की. और अंत में 25 लाख रुपये गंवा दिए. पांच साल की सेविंग्स खत्म.

ठगी के और भी तरीके

वैसे जरूरी नहीं कि साइबर ठग हमेशा डर-धमका कर या फिर डिजिटल अरेस्ट के दमपर में ही हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका डालते हों. कई बार मदद और भरोसे की आड़ में भी ये काम होता है. जैसाकि मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में एक रिटायर्ड एयरफोर्स अधिकारी के साथ हुआ. आजतक से जुड़े सर्वेश पुरोहित की रिपोर्ट के मुताबिक 79 साल के घनश्याम दत्त शुक्ल से पेंशन रुकने का डर दिखाकर और ऑनलाइन लाइफ सर्टिफिकेट बनवाने का भरोसा देकर करीब दस लाख रुपये ठग लिए गए.

रिपोर्ट के मुताबिक एयरफोर्स से रिटायर्ड वारंट ऑफिसर घनश्याम दत्त शुक्ल को एक ठग ने खुद को SBI हेड ब्रांच का अधिकारी बताकर फोन किया. लाइफ सर्टिफिकेट बनाने के नाम पर उनसे YONO ऐप डाउनलोड करवाया गया और बातचीत के दौरान चालाकी से उनका पिन नंबर हासिल कर लिया.

इसके बाद ठग ने चार किश्तों में उनके खाते से 9 लाख 87 हजार रुपये निकाल लिए. घटना 30 दिसंबर 2025 की बताई जा रही है. लेकिन घनश्याम जी को करीब डेढ़ महीने बाद पता चला कि उनके खाते से मोटी रकम गायब है. ठगी का पता चलने पर पीड़ित ने साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई. हेल्पलाइन के माध्यम से ई-जीरो एफआईआर दर्ज हुई. जिसके बाद गोला का मंदिर थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

सवाल ये है कि ये लोग करते क्या हैं? आखिर पढ़े-लिखे लोग इनकी चपेट में कैसे आ जाते हैं? और अगर कभी ऐसे हालात आ जाएं तो हम कैसे बचें?

ये ठग हैकर नहीं, दिमाग के खिलाड़ी हैं

पहले ये समझ लीजिए कि ये साइबर ठग कोई फिल्मी विलेन नहीं हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसी FBI की साइबर स्कैम और बचाव शीर्षक की रिपोर्ट कहती है कि ये लोग सोशल इंजीनियर हैं. यानी ये तकनीक से ज्यादा इंसान की सोच और डर को समझते हैं.

डर भी एक-दो नहीं बल्कि तीन तरह का.

1. वर्दी और कानून का डर: हम भारतीयों में एक बात कॉमन है. पुलिस की वर्दी, कोर्ट का नाम या CBI का जिक्र आते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है. भले हमने कुछ गलत न किया हो.

ठग इसी डर का फायदा उठाते हैं. वे अपने कमरे को ऐसे सजाते हैं कि लगे सच में थाना है. पीछे नेशनल फ्लैग. टेबल पर फाइलें. स्क्रीन पर कोई और व्यक्ति भी दिखेगा जो गंभीर चेहरा बनाकर बैठा है.

आपको लगेगा कि मामला बड़ा है. और डर में इंसान सवाल पूछना छोड़ देता है.

PIB और गृह मंत्रालय की साइबर जागरूकता मुहिम में भी बताया गया है कि पुलिस या CBI बनकर वीडियो कॉल पर डराना एक उभरता हुआ फ्रॉड है.

2. अकेला कर देना: वे कहते हैं, “किसी को मत बताइए. ये गोपनीय जांच है.” और यहीं आप फंस जाते हैं.

जब आप किसी से बात नहीं करते, तो आपके पास दूसरा नजरिया नहीं आता. कोई दोस्त, कोई भाई, कोई पत्नी अगर साथ बैठ जाए तो दो मिनट में बोल दे, “अरे ये फ्रॉड है.”

लेकिन ठग आपको कमरे में अकेला कर देते हैं. फोन कैमरा ऑन रखवाते हैं. आप बाथरूम भी जाओ तो बताकर जाना होता है.

अमेरिकी एजेंसी Federal Trade Commission (FTC) इसे Imposter Scams कहती है. इसमें ठग शिकार को कहते हैं कि किसी से बात न करें और तुरंत फैसला लें.

ये असली गिरफ्तारी नहीं. ये डिजिटल कैद है. दिमाग की जेल. जहां आपके स्मार्ट फोन की स्क्रीन ही आपके लिए हवालात की सलाखें बन जाती हैं.

3. समय का दबाव: वे कहते हैं, “अभी फैसला लीजिए. अभी पैसे ट्रांसफर कीजिए. नहीं तो केस दर्ज हो जाएगा.”

जल्दबाजी में इंसान गलती करता है. सोचने का समय नहीं मिलता. यही उनका मकसद है.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी समय-समय पर जारी अपनी एडवाइजरी में लोगों को इस जल्दीबाजी से बचने की सलाह देता रहता है.

क्या सच में डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई चीज है?

सीधी बात. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNS) या इससे पहले के भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई शब्द नहीं है. 

गिरफ्तारी की प्रक्रिया भौतिक उपस्थिति यानी फिजिकली जाकर, पहचान और कानूनी औपचारिकताओं के साथ होती है. कोई भी जांच एजेंसी चाहे CBI हो, ED हो या राज्य पुलिस, वॉट्सऐप या Skype पर पूछताछ नहीं करती.

अगर किसी की गिरफ्तारी करनी होती है तो पुलिस सामने आती है. पहचान बताती है. जरूरत हो तो वारंट दिखाती है. और सबसे जरूरी बात, आपको वकील से बात करने का अधिकार है. परिवार से संपर्क का अधिकार है.

कोई भी असली अधिकारी आपको यह नहीं कहेगा कि किसी से बात मत करो. एक सबसे जरूरी बात और समझ लीजिए.

सरकारी एजेंसियां पैसे लेकर मामला रफा-दफा नहीं करतीं. वे खाते फ्रीज कर सकती हैं. जांच कर सकती हैं. लेकिन आपसे यह नहीं कहेंगी कि “इतना पैसा ट्रांसफर कर दो तो नाम क्लियर हो जाएगा.”

अगर कोई ऐसा कह रहा है तो समझ लीजिए मामला साफ है. ये फ्रॉड है.

वे 5 रेड फ्लैग जो चीख-चीख कर कह रहे हैं, ये स्कैम है

अब आते हैं असली काम की बात पर. अगली बार अगर ऐसा कॉल आए तो ये पांच बातें याद रखिए.

रेड फ्लैग 1: कॉल का प्लेटफॉर्म

क्या कॉल WhatsApp, Skype या किसी इंटरनेट ऐप से आया है? सरकारी एजेंसियां आमतौर पर आधिकारिक नंबर से कॉल करती हैं. वीडियो कॉल पर जांच नहीं करतीं. 

अगर कोई वर्दी में व्यक्ति Skype पर धमका रहा है, तो 99 प्रतिशत केस में वह नकली है.

रेड फ्लैग 2: गोपनीयता की शर्त

क्या वह कह रहा है कि कमरे में अकेले बैठो, किसी को मत बताओ? असली पुलिस आपको अलग-थलग नहीं करती. आपको वकील लेने का अधिकार है. परिवार को बताने का अधिकार है.

अगर कोई आपको कह रहा है कि “ये टॉप सीक्रेट है, किसी से बात की तो जेल,” तो समझिए वह आपके डर पर खेल रहा है.

रेड फ्लैग 3: पैसे की मांग

क्या वह कह रहा है कि सिक्योरिटी डिपॉजिट दो? वेरिफिकेशन मनी दो? खाते में पैसा डालो ताकि केस क्लियर हो?

कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि पैसे देकर गिरफ्तारी से बचा जा सके. अगर पैसे की बात आई, वहीं कॉल काट दीजिए.

रेड फ्लैग 4: दस्तावेजों की गड़बड़ी

ये साइबर ठग अक्सर ईमेल या वॉट्सऐप पर नकली वारंट भेजते हैं. उसमें स्पेलिंग की गलतियां होंगी. लोगो पुराना होगा. कभी-कभी CBI और Interpol का नाम एक ही लेटरहेड पर होगा.

ध्यान से देखिए. असली दस्तावेज इतने लापरवाह नहीं होते. 

भारत सरकार के साइबर क्राइम पोर्टल पर भी इस बाबत स्पष्ट चेतावनी जारी की गई है. और दस्तावेजों की पहचान के तरीके बताए गए हैं. आप इस बारे में प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो की आधिकारिक वेबसाइट से भी जानकारी हासिल कर सकते हैं.

रेड फ्लैग 5: वीडियो कॉल का नाटक

वीडियो कॉल में पीछे का बैकग्राउंड गौर से देखिए. कभी-कभी वह एक वॉलपेपर होता है. या लूप में चल रहा वीडियो.

पुलिस वाला सीधे कैमरे में नहीं देखेगा. नीचे रखी स्क्रिप्ट पढ़ेगा. थोड़ा ध्यान देंगे तो सारा नाटक समझ आ जाएगा.

अगर कॉल आ जाए तो क्या करें?

अगर आपको भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ वाला ऐसा कोई कॉल आ जाए तो घबराइए मत. ये चार कदम याद रखिए.

1. कॉल काटिए: जैसे ही डराने वाली बात शुरू हो, कॉल काट दीजिए. ध्यान रहे कि आप किसी कानूनी मुसीबत में नहीं पड़ेंगे सिर्फ कॉल काटने की वजह से.

2. 1930 पर कॉल कीजिए: भारत सरकार की नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन है 1930. अगर आपने गलती से पैसे भेज भी दिए हैं तो तुरंत इस नंबर पर कॉल कीजिए. जल्दी रिपोर्ट करेंगे तो पैसा रुक सकता है.

3. ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें: सरकारी साइबर क्राइम पोर्टल पर जाकर शिकायत दर्ज करें. कॉल और शिकायत का स्क्रीनशॉट रखें. ट्रांजैक्शन डिटेल सेव करें.

4. अपने लोगों को बताइए: अब सबसे जरूरी बात. ऐसा कोई भी कॉल आए और आप पर उल्टा-सीधा आरोप लगे तो शर्मिंदा मत होइए. ना तो मोबाइल पर कथित तौरपर पॉर्न देखने की बात सुनकर या मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग्स तस्करी के आरोप सुनकर.

ठग चाहते हैं कि आप चुप रहें. लेकिन जितना ज्यादा लोग बात करेंगे, उतना ज्यादा जागरूकता बढ़ेगी. 

असली वायरस तकनीक नहीं, डर है

डिजिटल अरेस्ट का पूरा खेल तकनीक से ज्यादा डर पर टिका है. ठग आपके फोन को हैक नहीं करते. वे आपके दिमाग को हैक करते हैं.

हम अपने घर के दरवाजे पर अनजान व्यक्ति को अंदर नहीं आने देते. लेकिन फोन की स्क्रीन पर अगर कोई वर्दी में दिख जाए तो हम बिना सोचे भरोसा कर लेते हैं.

समस्या तकनीक नहीं है. समस्या अंधा भरोसा है. 

Gen Z और मिलेनियल्स से सीधी बात

याद रखिए, आप वो पीढ़ी हैं जो टू फैक्टर ऑथेंटिकेशन लगाती है. पासवर्ड मैनेजर इस्तेमाल करती है. फोन में फेस लॉक है.

लेकिन जब बात डर की आती है तो हमारा दिमाग लॉक हो जाता है. अगली बार अगर कोई कहे कि “आप डिजिटल अरेस्ट में हैं,” तो बस दस सेकंड रुकिए.

अपने आप से पूछिए, क्या भारत का कानून वॉट्सऐप पर चलता है? अगर जवाब ना है, तो कॉल काट दीजिए.

मन की बात से लेकर आपकी जेब तक

प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ में साफ कहा कि साइबर फ्रॉड आज एक बड़ी चुनौती है. लेकिन इसका इलाज सरकार अकेले नहीं कर सकती. जागरूक नागरिक ही सबसे बड़ी ताकत हैं.

जैसे कोरोना के समय मास्क और दूरी बचाव थे, वैसे ही आज के डिजिटल दौर में जानकारी और सतर्कता बचाव है.

हर घर में यह बात होनी चाहिए. माता-पिता को समझाइए. दादा-दादी को बताइए. ऑफिस में चर्चा कीजिए. क्योंकि ठग उम्र नहीं देखते. वे मौका देखते हैं.

सौ बात की एक बात

अगर कभी ऐसी कॉल आए तो तीन शब्द याद रखिए. रुको- सोचो- रिपोर्ट करो.

आपकी मेहनत की कमाई, आपकी रातों की नींद, आपके सपनों की जमा पूंजी किसी Skype कॉल की वजह से खत्म नहीं होनी चाहिए.

स्क्रीन आपकी दोस्त है. उसे जेल मत बनने दीजिए. सतर्क रहिए. सुरक्षित रहिए.

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