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AI के नाम पर जो खरीद रहे हैं, उसमें 'इंटेलीजेंस' आखिर है कितना?

AI vs Automation: मोबाइल फोन से लेकर रेफ्रिजरेटर तक और वॉशिंग मशीन से लेकर CCTV कैमरा तक, AI टेक्नॉलजी के नाम पर हमें क्या-क्या नहीं बेच दिया जाता है. सच ये है कि एआई कैमरा, एआई रोबोट, एआई चैटबॉट और एआई वॉशिंग मशीन के दावों के बीच असली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साधारण ऑटोमेशन में बड़ा फर्क है. जानते हैं कि कैसे मार्केटिंग में 'एआई वॉशिंग' के जरिए हर स्मार्ट डिवाइस को मशीन लर्निंग का तमगा दिया जा रहा है.

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artificial intelligence vs automation
AI के नाम पर क्या-क्या बिकता है?
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दिग्विजय सिंह
19 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 19 फ़रवरी 2026, 02:12 PM IST)
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तारीख- 24 सितंबर, 2025…जगह- यूपी का नोएडा शहर… 'माबदौलत' (यानी कि मैं…) ने एक SUV खरीदी. डिलीवरी लेते समय डीलर ने बताया कि “सर आपकी कार में 360 डिग्री कैमरा लगा है. जो AI की मदद से आपको कार की छत के ऊपर का एंगल भी दिखाएगा.” मानो कोई ड्रोन कैमरा कार को ऊपर से शूट कर रहा हो. 

हमने कार चलाकर देखा तो वाकई मजा आ गया. हफ्तों तक यही समझते रहे कि एआई तकनीक की बदौलत ये करामात हो रहा है. एक दिन हमने अपने कार की यही खूबी हमारे लल्लनटॉप के टेक एक्सपर्ट सूर्यकांत को बता दी. फिर उसके बाद जो उन्होंने बताया, उस सुनकर पलभर में ‘जिंदगी बदल गई, हालात बदल गए और ज़ज्बात भी बदल गये.’ 

सूर्या भाई ने बताया कि जिस तकनीक को हम अब तक AI मानकर चल रहे थे, वो असल में ‘Lidar Sensor’ बोले तो “लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग सेंसर” का कमाल है. लाइडर सेंसर यानी 

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अगर आपको ‘Lidar Sensor’ का असली यूज देखना है तो आईपैड का कैमरा उठाकर देख लीजिए. आपके टेबल पर रखे कॉपी मग से लेकर कमरे की दीवारों तक का सारा तियां-पांचा निकालकर सामने रख देगा. इसी तकनीक के सहारे मैप बनाने वाले डेवलपर ‘पते का सही पता’ अपने सिस्टम में डालते हैं. फिर भले वो Google बाबा हों या Apple या फिर अपना देसी Mapple. और एक हम थे जो इसे AI समझे हुए थे.

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AI के नाम पर कुछ भी चिपका दिया जाता है

गलती से हुई इस मिस्टेक ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. रोजमर्रा की ज़िंदगी में हमें AI के नाम पर क्या-क्या नहीं चिपका दिया जाता. फ्रिज लेने जाओ तो उसमें AI कूलिंग, एयर कंडीशनर लो तो उसमें AI टेंपरेचर कंट्रोल. फोन खरीदो तो AI कैमरा और CCTV लगवाओ तो वहां भी AI सिक्योरिटी. जहां देखो AI का लेबल लगाकर कुछ भी चिपका दिया जा रहा है. 

इसका ताजा-ताजा नमूना तो दिल्ली में हुए ‘AI इम्पैक्ट समिट’ में देखने को मिला. जहां को रोबॉटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ऐसी खिचड़ी पकाई गई. जिसे देखकर हर कोई चकरा गया. अरे हम ओरियन (Orion) ‘द एआई डॉग’ की बात कर रहे हैं. नाम तो सुना होगा. 

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ओरियन (Orion) एआई डॉग (फोटो- GNT)

यहां इस रोबोट को AI का प्रतीक बनाकर पेश किया गया. जबकि दोनों में बड़ा बेसिक अंतर है. रोबोट मतलब मशीन जो भौतिक दुनिया में काम करे. जैसे हाथ हिलाना, सामान उठाना, चलना. जबकि एआई मतलब सॉफ्टवेयर या सिस्टम जो डेटा से सीखे, पैटर्न पहचाने और नए हालात में फैसला ले सके. अब ये बात और है कि आगे चलकर पता चला कि पूरा का पूरा 'ओरियन द एआई डॉग’ चाइनीज निकला. मगर उस पर चर्चा किसी और दिन. फिलहाल मुद्दे पर बने रहते हैं.

सौ बात की एक बात ये है कि AI के जमाने में बाजार भी हर कंज्यूमर प्रोडक्टर पर AI का ठप्पा लगाकर बेचने में जुटा है. यही पर असली खेल शुरू होता है मार्केटिंग का.

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AI और मार्केटिंग

अब इतना लंबा चौड़ा मीटर सेट हो ही गया है तो चलिए एक नजर डाल लेते हैं कि AI की आड़ में हमें क्या-क्या बेचा जा रहा है. और असली खेला कहां होता है.

कैमरा में एआई, असल में फिल्टर

फोन कंपनियां कहती हैं कि हमारा कैमरा एआई से आपका चेहरा पहचानता है, स्किन टोन सुधारता है, बैकग्राउंड ब्लर करता है. मगर सच क्या है? कई मामलों में यह पहले से तय एल्गोरिदम और फिल्टर होते हैं. जैसे ही चेहरा दिखा, सॉफ्टवेयर ने पहले से सेट किया हुआ ग्लो लगा दिया. इसमें सीखने की प्रक्रिया नहीं, बस नियमों का पालन है.

हां, कुछ कंपनियां सच में मशीन लर्निंग मॉडल इस्तेमाल करती हैं. जैसे Google का पिक्सल फोन इमेज प्रोसेसिंग के लिए बड़े डेटा पर ट्रेन किए गए मॉडल का इस्तेमाल करता है. लेकिन हर फोन का AI कैमरा उतना एडवांस नहीं होता.

कस्टमर केयर का AI चैटबॉट

वेबसाइट पर चैट विंडो खुली. आपने लिखा रिफंड चाहिए. सामने से जवाब आया, कृपया अपना ऑर्डर नंबर डालें. आपने कुछ अलग पूछा तो वही घिसा पिटा जवाब.

इसे AI चैटबॉट कहा जाता है. असल में कई बार ये कीवर्ड मैचिंग सिस्टम होता है. अगर आपने रिफंड शब्द लिखा तो जवाब नंबर 3 भेज दो. इसमें न समझ है न संदर्भ.

दूसरी तरफ बड़े भाषा मॉडल होते हैं जो संदर्भ समझते हैं. जैसे OpenAI का बनाया हुआ सिस्टम. जो अलग-अलग सवालों का नया जवाब बना सकता है. फर्क साफ है. एक स्क्रिप्ट पढ़ रहा है, दूसरा सीखकर जवाब दे रहा है.

AI सीसीटीवी या मोशन अलार्म

कई हाउसिंग सोसायटी में बोर्ड लगा मिलेगा ‘एआई सर्विलांस इन एक्शन’. कुछ-कुछ इस तरह का…

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AI CCTV- दावा और हकीकत

 

ये तथाकथित AI CCTV कैमरे हकीकत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कोसों दूर होते हैं. असलियत में कैमरा सिर्फ हरकत होते ही रिकॉर्डिंग शुरू करता है. कोई बिल्ली भी गुजरे तो अलार्म बज जाता है.

असली एआई आधारित सिस्टम व्यक्ति और जानवर में फर्क कर सकता है. संदिग्ध गतिविधि पहचान सकता है. लेकिन हर जगह ऐसा नहीं होता. कई बार साधारण मोशन सेंसर को भी एआई कह दिया जाता है.

AI वॉशिंग मशीन और AI फ्रिज

विज्ञापन कहता है एआई तय करेगा कितने पानी में कपड़े धुलेंगे. मगर अंदर की कहानी कुछ और है रे बाबा. असल में मशीन सेंसर से वजन नापती है और पहले से तय चार्ट के मुताबिक पानी डालती है. यह ऑटोमेशन जरूर है. मगर ये जरूरी नहीं कि आपकी वॉशिंग मशीन खुद सीख रही हो.

हां, अगर मशीन समय के साथ आपके उपयोग के पैटर्न को सीखकर मोड बदलने लगे, तब बात अलग है. लेकिन अधिकतर मामलों में यह स्मार्ट लॉजिक है, जादुई बुद्धिमत्ता नहीं.

स्टॉक मार्केट का AI गुरु

कई ऐप दावा करते हैं हमारा AI आपको सही शेयर बताएगा. पूछिए कैसे. जवाब मिलेगा हमारा एल्गोरिदम डेटा एनालिसिस करता है. बस यहीं पर असली खेला शुरू होता है.

डेटा एनालिसिस और एआई में फर्क है. अगर सिस्टम सिर्फ तय फार्मूले से औसत निकाल रहा है, तो वह सांख्यिकी (Statistics) है. हां, अगर वह नए पैटर्न सीखकर भविष्यवाणी बेहतर कर रहा है, तब उसे एआई कहा जा सकता है.

कॉलेज का AI रोबोट

कई कॉलेज के टेक फेस्ट में लाइन फॉलोअर रोबोट चलता है. उसे कहा जाता है AI रोबोट. जबकि वह सिर्फ सेंसर से लाइन पहचानकर दाएं-बाएं मुड़ रहा होता है. उसे सिखाया नहीं गया, उसे पहले से कोड किया गया है.

अगर वही रोबोट नई लाइन देखकर खुद सीख जाए कि रास्ता कैसे पकड़ना है, तब उसे बुद्धिमान कहेंगे.

‘AI वॉशिंग’- बोले तो नई बोतल में पुरानी शराब

जैसे कभी कंपनियां पर्यावरण के नाम पर ग्रीन शब्द चिपकाकर बेचती थीं. वैसे ही अब AI शब्द चमकदार ‘स्टिकर’ बन गया है. इससे प्रोडक्ट आधुनिक लगता है, कीमत बढ़ाने का मौका मिलता है. फायदा ये कि निवेशक खुश होते हैं.

असली AI पहचानने की छोटी चेकलिस्ट

अब सवाल ये उठता है कि AI कहां है और कहां नहीं है, इसकी पहचान कैसे करें? इस सवाल का जवाब दरअसल चार छोटे-छोटे सवालों में जुड़े हैं.

  • पहला सवाल पूछिए क्या सिस्टम डेटा से सीखता है?
  • दूसरा क्या वह समय के साथ बेहतर होता है?
  • तीसरा क्या वह नई परिस्थिति में भी काम कर सकता है?
  • चौथा क्या उसका निर्णय केवल पहले से लिखे नियमों पर आधारित है?

अगर हर चीज पहले से तय है, तो वह ऑटोमेशन है. अगर सिस्टम अनुभव से खुद को बदल रहा है, तो वह एआई की दिशा में है. गुरुवार 19 फरवरी को दिल्ली के 'AI इम्पैक्ट समिट' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को रियल टाइम में 13 भाषाओं में प्रसारित किया गया. वो भी खुद पीएम मोदी की आवाज में. ये है असली AI का इस्तेमाल

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AI ने पीएम मोदी के भाषण को 13 भाषाओं में सुनाया

अब AI के इसी ‘असली कमाल’ को ऐसे ही एक दूसरे उदाहरण से समझते हैं. इस X पोस्ट के वीडियो को क्लिक कीजिए. ये शख्स अंग्रेजी में अपनी बात कह रहा है, मगर सुनने वाले उसे अपनी पसंद की भारतीय भाषा में सुन रहे हैं. ये हमारे देसी ‘सर्वम एआई’ का कमाल है. 

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सौ बात की एक बात

जैसे हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती. वैसे ही AI का स्टीकर चिपका कर बेची जा रही है हर मशीन या गैजेट में एआई नहीं होता. हर रोबोट बुद्धिमान नहीं होता.
और हर एल्गोरिदम भविष्यवक्ता नहीं होता.

एआई बड़ा शब्द है, लेकिन उसे समझना जरूरी है. वरना आने वाले समय में टूथब्रश भी AI वाला मिलेगा और हम पूछते रह जाएंगे कि इसमें बुद्धि कहां है. 

वीडियो: गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने रोबोटिक डॉग पर क्या सफाई दी?

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