आरजे रौनक माने बउआ, माने सुकुमार अविश्वास, माने बैरागी जी. इंट्रो देने की जरूरत नहीं है. ये आदमी हमारे व्हाट्सएप पर फैमिली वाले ग्रुप में घुस चुका है. हम भी जानते हैं और आप भी जानते हैं कि कौन हैं. थोड़ा और जानना हो तो ये पढ़ लीजिएगा. 'सड़कों पर पैंफलेट बांटता था, वहीं से लैंग्वेज और लोगों को जाना'
"कुत्ते-कमीने मैं तेरा ख़ून पी जाऊंगा" शायद चेन्नई के उस MBBS के स्टूडेंट ने धर्मेन्द्र के इस डायलॉग को सीरियसली ले लिया, पर सवाल ये है कि ख़ून पीने के लिए उसे छत से फेंककर उसकी हड्डी तोड़ने की क्या ज़रूरत थी?
खैर, डॉक्टरी की पढाई करने वाले के ऐसे करम देख के अच्छा हुआ कि हम डॉक्टर नहीं बने. वैसे कहते हैं कि डॉक्टर हमेशा प्रैक्टिस करते हैं, कहीं वो भी कुत्ते को नीचे फेंक के उसके इलाज की प्रैक्टिस तो नहीं कर रहा था? अगर ये बात सच है तो उनका इंटेंशन गलत नहीं था बस तरीका थोडा अटपटा था. (थोड़ा अटपटा कहने पर कहीं आपने भी मन में मुझे कुत्ता तो नहीं कह दिया?)
वैसे आप बेशक मुझे कुत्ता कह सकते हैं. मुझे इस शब्द से कोई दिक्कत नहीं. क्योंकि अगर कुत्ता सचमुच वफादार होता है और स्वान निद्रा की बात शास्त्रों में भी बड़े दबाव के साथ कही गयी है. तो लोग कुत्ता शब्द को गाली क्यों मानते हैं?
वैसे कई लोग कुत्ते को कुत्ता कहने वालों से नाराज़ हो जाते हैं. भाई हम इंसानों को जब कुत्ते देखते होंगे तब वो भी अपनी बिरादरी से यही कहते होंगे. 'वो देखो इंसान.' वो थोड़े हमें नाम से संबोधित करते होंगे, कि 'देखो फलाने जा रहे हैं.'
खैर उस स्टूडेंट ने कहा कि उसने कुत्ते को तीसरी मंज़िल से सिर्फ 'फन' के लिए फेंका. वैसे अगर ये बात है तो एक मौका कुत्ते को भी मिलना चाहिए.
ग़नीमत तो ये थी कि जब वो कुत्ता नीचे गिरा, तब वहां कोई न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर नहीं था. वरना उसे बैंडेड लगाने से पहले उसके मुंह पर माइक लगा देता और पूछता
"कैसा लग रहा है आपको? क्या किसी कार्यवाई की मांग है आपकी? क्या आप इंसानों के इस क्रूर व्यवहार के खिलाफ अपनी बिरादरी के साथ जंतर मंतर पर जायेंगे? क्या मोदी सरकार के आने की वजह से इंटॉलरेन्स बढ़ गया है और इसी वजह से आपके साथ ये बर्ताव किया गया? क्या आपको कन्हैया कुमार और केजरीवाल का सपोर्ट मिला?"
कसम से वो कुत्ता उस डॉक्टरी के स्टूडेंट से पहले उस रिपोर्टर को काटने को दौड़ता.
एक संस्था ने उस स्टूडेंट के बारे में बताने वाले तो 1 लाख का ईनाम देने की बात कही है. वैसे कई कुत्ते इसपर भी ऑब्जेक्ट कर सकते हैं कि ये इनकी तौहीन है. अरे गब्बर को पकड़ने के लिए सन 75 में 50000 का ईनाम था, और 2016 आ गया. इस स्टूडेंट पर सिर्फ 1 लाख? हमारे लिए ये कोई गब्बर से कम थोड़े ही हैं. इस स्टूडेंट को डॉक्टरी पूरी करनी चाहिए और उसे आजीवन कुत्ता काटने वाले मरीजों का फ्री में इलाज़ करना चाहिए. और उसे कम से कम 20 इंजेक्शन लगाने चाहिए, 14 मरीज़ को और 6 अपने आप को.
वैसे कई 'टेम्पररी एक्टिविस्ट' उस कुत्ते की मदद के लिए आगे आये हैं (वो भी सिर्फ सोशल मीडिया पर) क्योंकि जानवरों की पीड़ा उनसे देखी नहीं जाती. पर इनमें से ज्यादातर लोगों की समझ से सिर्फ 'कुत्ता' ही जानवरों की कैटेगरी में आता है. वरना हर वीकेंड वो महाठंडी या भयंकर ठंडी बियर/ ब्रीज़र के साथ, चिकन (ये भी जानवर है) मटन (ये भी जानवर से बनता है) खाते हुए सेल्फ़ी लेकर इंस्टाग्राम पर ज़रूर लगाते हैं. बीफ बैन पर भी इनके अंदर का गुस्साया एक्टिविस्ट बाहर निकला था (फिर से सिर्फ सोशल मीडिया पर) और अपनी खाने की आज़ादी के लिए चिल्लाया भी था. शायद इस पोस्ट के बाद उन्हें पता चले कि बीफ भी जानवर ही होता है. वैसे एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में कुत्तों की पॉपुलेशन लगभग 0.5 बिलियन है जबकि चिकन की पॉपुलेशन 50 बिलियन से कहीं ज्यादा. अब बताओ जानवरों से प्यार है या सिर्फ 'डॉगी जानवर' से? (ये डेटा क्रॉस चेक करने की कोशिश से बेहतर होगा कि लिखने वाले का पॉइंट समझने की कोशिश करें )
खैर मुझे पढ़ने के मामले में आपके पेशेंस पर पूरा भरोसा है. इसलिए अब और नहीं लिखूंगा. लेकिन उस डॉक्टरी के स्टूडेंट के किये उस घटियापन पर मेरे दिल, कलेजे, फेफड़े और दायें पैर की सबसे छोटी उंगली से एक बद्दुआ निकलती है, "जैसे लोहा, लोहे को काटता है, हीरा, हीरे को काटता है,पत्थर, पत्थर को काटता है. वैसे हीे एक दिन उसे कुत्ता काटेगा."
आखिर में याद आया कि कल घर पर एक रिश्तेदार आये थे. मैं गर्मी से परेशान, ऑफिस से घर पहुंचा ही था कि उन्होंने पूछा था, "आप करते क्या हैं?" मैंने झुंझला कर कहा "मैं कुत्ता हूं अंकल " वो मुस्कुराते हुए बोले "अच्छा तो प्राइवेट जॉब में हो." वैसे अगर आप भी प्राइवेट जॉब में हैं, और ये पढ़कर मुस्कुरा दिए तो भाई आपको भी आपकी वफादारी मुबारक हो.
दफा हो जाइए