इंडिया टाइम्स की एक खबर
के अनुसार महाराष्ट्र के एक किसान ने बैंगन की अपनी पूरी फसल खुद अपने हाथों से नष्ट कर दी. कारण ये था कि उसे बैंगन के लिए 20 पैसे प्रति किलो की पेशकश की गई थी.
अहमदनगर जिले के किसान
राजेंद्र बवाके ने एक इंटरव्यू में
पीटीआई को बताया कि -
मैंने अपनी 2 एकड़ भूमि में बैंगन बोया था. सिंचाई के लिए पाइप लगाए. उर्वरक, कीटनाशक और आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया. इस सब में कुल 2 लाख रुपये तक का खर्च हुआ. लेकिन बदले में मैंने केवल 65,000 रुपये कमाए. इसके बाद ज़्यादा नुकसान न हो ये सोचकर बची हुई फसल मैंने खुद ही नष्ट कर दी.
मार्च 2018 के प्रदर्शन में किसान सभा के झंडे के साथ अशोक ढवलेडेढ़ लाख रुपए एक झटके में डूबना बेहद खतरनाक है. लेकिन सोचिए ये स्थिति कितनी खतरनाक है. जब किसान को हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. और फिर पैसे डूब जाने के डर के साए में तिल-तिल मरता है.
अभी कुछ दिन पहले नासिक के एक किसान
संजय साठे को अपने साढ़े सात कुंतल प्याज 1064 रुपए में बेचना पड़ा था. ऐसी कई घटनाएं हुई होंगी. वो तो इस किसान ने अपनी पूरी कमाई प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर दी. इसलिए ये मामला चर्चा में आ गया. विडंबना ये कि 2010 में संजय को कृषि मंत्रालय ने बराक ओबामा से मिलने के लिए चुना था.
पिछले छह महीने में ये चौथी बार था, जब किसानों ने आंदोलन किया.
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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय.
और यहां पर तो केवल पानी सींचने तक ही बात सीमित नहीं है. मैंने देखा है कि कैसे किसान अपने बच्चों की तरह अपनी फसल को पालता है. बेशक फसल के साथ अलग तरह की भावनाएं जुड़ी होती हैं. लेकिन ऐसा कुछ करना, जैसा मजबूरी में राजेंद्र ने किया, अपने ही हाथों अपने बच्चों का गला घोंटने सरीखा लगता है. इसी दर्द के चलते
प्रेमचंद की
पूस की रात मुझे उनकी सबसे बेहतरीन कृति लगती है.
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सोशल मीडिया के इस दौर में मुझे एक ऐसी पोस्ट भी देखने को मिली, जिसमें बताया गया था एक तरफ उपभोक्ता किसानों के दर्द से रोते हैं और दूसरी तरफ सब्ज़ियों के महंगे होने से रोते हैं. उस पोस्ट को देखकर ऐसा लगा रहा था गोया किसान अगर कोई चीज़ सस्ती बेच रहा है तो फुटकर खरीदारों को वो सस्ती मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं है. कम से कम भारत में तो नहीं. तो फिर ये दिक्कत भारत में क्यूं है कि जो चीज़ किसान 20 पैसे में बेचते हैं, वही हमें 20 रुपए की पड़ती है?
मार्च में नासिक से मुंबई तक निकाला गया किसानों का लांग मार्च, जिसकी अगुवाई ऑल इंडिया किसान सभा कर रही थी.इसके कई कारण हैं -
# एक अनुमान के अनुसार किसान जितनी फसल पैदा करता है, उसका आधे से भी कम हिस्सा एंड यूजर यानी उपभोक्ता मतलब हमारे आपके पास पहुंचता है. इसकी वजह है स्टोरेज की उचित सुविधा का न होना. फूड प्रोसेसिंग की उचित सुविधा न होने से किसान की उपज ज्यादा वक्त तक सहेजकर नहीं रख पाता है. फूड प्रोसेसिंग में फसल की लाइफ बढ़ जाती है. जैसे आलू से कहीं ज़्यादा उम्र आलू के चिप्स की होती है. अचार बनाने पर कच्चे आम की उम्र कई गुनी बढ़ जाएगी. छोटे स्तर पर तो ये सब किसान या एंड यूज़र कर सकते हैं, लेकिन टनों फसल को बचाना आसान नहीं.
पिछले साल की बाढ़ की एक तस्वीर. गोया कम परेशानियां थीं.# फसल, सब्जी और दालें उपभोक्ताओं के लिए महंगी और किसानों के लिए सस्ती होने का एक कारण ‘वायदा बाज़ार’ भी है. इसके बारे में कम ही बात होती है. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है कि वायदा बाज़ार में आपको कोई चीज़ यानी कमोडिटी वास्तव में खरीदने की ज़रूरत नहीं. आप कंप्यूटर पर बैठकर सौदा कर लेते हैं. माना आपने तीन बोरी गेहूं खरीदे. इसके लिए गेहूं की डिलीवरी की जरूरत नहीं. इसमें मान लिया जाता है कि आपके पास तीन बोरी गेहूं है. बाजार में रेट बढ़ने पर आप इसे बेच सकते हैं. जब आप बेचेंगे तब भी केवल माना ही जाएगा कि आपने अपने गेहूं बेच दिए. इसका नुकसान भी किसानों को होता है. इसे समझने के लिए आपको कमोडिटी मार्केट का पूरा इकोनॉमिक्स समझना पड़ेगा. मोटा-मोटी ये है कि जो न खेती बाड़ी से जुड़े हैं और न ही अंतिम उपभोक्ता हैं. इस वायदा बाज़ार के चलते पूरा मार्केट कमोबेश उनके हाथों की कठपुतली है.
# तीसरा कारण है बिचौलिए. माना कि ऊपर की सारी बातों और चीज़ों का कोई अस्तित्व नहीं है. फिर भी किसाने से 20 पैसे में बैंगन खरीदने वाला थोक विक्रेता उसमें अपना मुनाफा जोड़कर एक रुपए में. उसके आगे का दो रुपए में और उससे आगे फुटकर विक्रेता चार रुपए में बेचता है. यकीन मानिए जितनी छोटी चैन इस उदाहरण में बताई गई है. दरअसल किसान और एंड यूज़र के बीच उतनी छोटी चैन होती नहीं.
अप्रैल, 2017. तमिलनाडु के किसान अपना कर्ज माफ कराने के लिए दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए.# फिर एक चौथा कारण होता है ट्रांसपोर्टेशन. मुझे याद है एक ड्राइवर ने एक दिन बताया था कि वो महाराष्ट्र से केले जम्मू कश्मीर और जम्मू कश्मीर से सेब महाराष्ट्र ले जाया करता था. सोचिए इस पूरी प्रोसेस में केले और सेब कितने महंगे हो जाते होंगे?
# और अंत में वो चीज़ जिसका कोई अंत नहीं है – ग्रीड. लालच. गये वो दिन जब हिदायतें दिया करते थे कि तेते पांव पसारिए, जेते लंबी सौर. आज हम अकेले या परिवार भर के लिए चादर नहीं शामियाने की व्यवस्था कर लेना चाहते हैं. सब कुछ संचय कर लेना चाहते हैं. क्या पता कल हो न हो? लेकिन ये कल हमारा न होना तो हमें मोटिवेट करना चाहिए सब कुछ लुटा देने के लिए.
बहरहाल, इसके अलावा भी ढेरों कारण है इस मूल्य की असामनता में, लेकिन उतने चल सकते हैं. 20 पैसे के बल्दे अगर किसान को 5 - 7 रुपए मिलते हों और हमें सब्ज़ी 20 के बदले 10-12 रुपए में मिलती हो तो इसमें किसी का कोई घाटा नहीं है. और अगर है भी तो पहले से कम, कहीं कम है.
धान की रोपाई से पहले क्यारी बनाने और फिर खेत तैयार करने में खर्च के साथ मेहनत भी लगती है.
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इस देश का सबसे फेवरेट अलंकार विरोधाभास अलंकार है. क्यूंकि वो किसान जो सबके लिए भोजन और कई अन्य उन सामग्रियों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है. उसका कोई ‘आर्टिफिशियल विकल्प’ नहीं है. फिर भी उसकी अपनी जिंदगी में जीवन यापन के लाले हैं.
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किन्नू के 12 रुपये किलो से 50 रुपये किलो तक पहुंचने की कहानी -