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कहानी सेनारी हत्याकांड की: खून के बदले खून, जाति के बदले जाति

90 के दशक में बिहार में बदले की आग रात के साथ बढ़ती जाती थी.

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फोटो - thelallantop


17 साल बाद बिहार के कुख्यात सेनारी हत्याकांड में फैसला आया है. लोकल कोर्ट का. 10 लोगों को मौत की सजा हुई है. 3 को आजीवन कारावास. 18 मार्च 1999 को जहानाबाद के सेनारी गांव में 34 लोगों को काट दिया गया था.


90 का दशक. बिहार का जहानाबाद. सेनारी गांव. ये वो वक्त था जब बिहार के इस क्षेत्र में लोगों का एक ही मोटिवेशन था. बदला. कहने को तो दिन भर कहते थे. लेते भी थे. भूमिहारों और भूमिहीनों के बीच. पहला वर्ग सारी जमीनों पर कब्जा जमाये था. इनका कहना था कि हमने सब खरीदा है. बाप-दाद की मिल्कियत है. दूसरे वर्ग का कहना था कि सब छीना हुआ है. धोखे से. जबर्दस्ती से. लोगों को मूर्ख बना के.
जमीन-जायदाद की बातें बातों से नहीं सुलझतीं. जितनी बातें करो, उलझती जाती हैं. अमरबेल की तरह. किसी भी पेड़ पर लिपटती हैं. जितना छुड़ाओ, लरजती जाती हैं. तो दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी अमरबेल बो ली. रणवीर सेना और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी).
18 मार्च 1999. वाजपेयी सरकार अपना एक साल पूरा होने का जश्न मना रही थी. जनता में काफी उत्साह था. लोगों को लगता था कि अच्छे दिन आनेवाले हैं. उस रात सेनारी गांव में 500-600 लोग घुसे. चारों ओर से घेर लिया. घरों से खींच-खींच के मर्दों को बाहर किया गया. कुल 40 लोगों को चुना गया. इन लोगों की जबान नहीं खुलती थी. खींचने वालों की आंखें. एक डर में सहमा था. दूसरे ने मन इतना कड़ा कर लिया था कि बहता खून तो उसे देखना ही था.
चालीसों लोगों को खींचकर गांव से बाहर ले जाया गया. एकदम जानवरों की तरह. तीन समूहों में बांट दिया गया. बराबरी का नहीं देखा जा रहा था. बस खींच-खींच के खड़ा कर दिया गया. फिर बारी-बारी से हर एक का गला और पेट चीर दिया गया. 34 लोग मर गये. 6 तड़प रहे थे. प्रतिशोध इतना था कि मरने का कंफर्म नहीं किया जा रहा था. चीरने का करना था. बस. ये गांव भूमिहारों का था. मारने वाले एमसीसी के थे.
इस घटना के अगले दिन पटना हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार पद्मनारायण सिंह यहां पहुंचे. सेनारी उनका गांव था. अपने परिवार के 8 लोगों की फाड़ी हुई लाशें देखकर उनको दिल का दौरा पड़ा. वो भी मर गये.


तुरंत एरिया में आतंक फैल गया. जरा से खड़के पर लोग लाइसेंसी निकाल के छतों पर बैठ जाते. जो लोग अफोर्ड कर सकते थे, वो लाइसेंसी रखते थे. जो नहीं कर सकते थे, वो कट्टा खरीदते थे. पर खरीदते जरूर थे. बात-बात में अफवाह उड़ती. कि आ गये माओ वाले. लोग तुरंत पोजीशन ले लेते. दिन-रात की परवाह नहीं थी. बच्चे घरों से बाहर नहीं निकलते थे. कोई घर से बाहर सामान लेने जाता तो हथियार ले के जाता था. फिर सच्ची-झूठी कहानियां उड़तीं कि यहां देखे हैं नकाबपोश. भाग रहा था. निशाना ले रहा था. एक से एक निशानची थे गांव में. जरा से खटके पर गोली चला देते. बहुत लोग शहरों से नौकरी-पढ़ाई छोड़कर गांव में ठटे हुए थे कि बदला लिये जायेगा. बेतरह अफसोस भी होता कि उस दिन मैं था नहीं गांव में. नहीं दिखा देता. बहता खून और जलता खून सांसों को चैन नहीं लेने देते थे. रोती थीं तो औरतें जिन्हें ना तो अपने होने के बारे में पता था, ना ही उनका पता था जिनके होने का भरोसा दिला उनकी शादी कराई गई थी.


New Doc 62_1 सेनारी हत्याकांड में मरे हुए लोगों की लाशें

ये हत्याकांड यूं ही नहीं हो गया था. डेढ़ साल से दिल को ठंडा रखा गया था. खून को गर्म. इसी दिन के लिये. 1 दिसंबर 1997 को जहानाबाद के ही लक्ष्मणपुर-बाथे के शंकरबिगहा गांव में 58 लोगों को काट दिया गया था. 10 फरवरी 1998 को नारायणपुर गांव में 12 लोगों को काट दिया गया था. मरने वाले सारे दलित थे. मारनेवाले भूमिहार. इस घटना के बाद केंद्र ने बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था. पर कांग्रेस के विरोध के चलते 24 दिनों में ही वापस लेना पड़ा था. राबड़ी सरकार फिर आ गई थी.
इतने दिन से मरे हुये लोगों का पक्ष दिन गिन रहा था. सेनारी कांड के दिन पूरी तैयारी थी. गांव को घेरने के अलावा दूसरे गांवों के रास्तों की भी मोर्चाबंदी कर दी गई थी. सेनारी से एक किलोमीटर दूर पुलिस चौकी को घेरकर गोलीबारी कर दी गई. जब पूरा कांड हो गया तो 45 मिनट बाद पुलिस पहुंच पाई. पुलिस कह रही थी कि अगर हम लोग नहीं आते तो और ज्यादा लोग मरते. हमने इतनी तत्परता दिखाई कि लोग बच गये.
इस हत्याकांड में एक चीज बड़ी तड़पाने वाली थी. जमीन का संघर्ष अपनी जगह था. पर सेनारी गांव में भूमिहर और भूमिहीन के बीच झगड़ा नहीं था. लोग काम चला रहे थे. आसपास के गांवों में एमसीसी सक्रिय थी, पर इस गांव में नहीं. 300 घरों के गांव में 70 भूमिहार परिवार 'मजदूर' पड़ोसियों के साथ बड़ी शांति से रहते थे. और शायद यही वजह थी कि इसी गांव को चुना गया.
रणवीर सेना भूमिहारों ने बनाई थी. 'आत्मरक्षा' के लिये. श्रीकृष्ण सिंह के बाद बिहार में इस जाति का कोई मुख्यमंत्री नहीं हुआ था. उस वक्त इस जाति से सांसद भी बस दो ही थे. जमीन थी, पर राजनीतिक ताकत खो चुके थे. ये अप्रासंगिकता बर्दाश्त नहीं हो पाती थी. इनका ये भी कहना था कि अब पहले का जमाना नहीं है कि सबके पास 500 बीघा जमीन है. हम लोगों का भी तो परिवार बढ़ा है, टूटा है. नहीं है सबके पास उतनी जमीनें. दलित समुदाय को ये बात गवारा नहीं थी. उनके हिसाब से सारी जमीनें इन लोगों ने हड़प ली थीं. सरकार तो जैसे कोई रोल निभाना ही नहीं चाहती थी. आजादी के इतने साल बीत गये थे. पर जमीन का बंटवारा नहीं हुआ था. लोग कह रहे थे कि राष्ट्रपति शासन के दौरान ही बढ़िया था. लोग कह रहे थे कि जितने दिन ये रहा, हमने ताला नहीं लगाया घरों में.
अब सेनारी कांड के बाद सबको लगने लगा कि अस्तित्व बचाना है तो कांड करना ही पड़ेगा. अफवाहें उड़ती रहीं कि गांव के गांव फूंके जाने वाले हैं. जरा सी आग कहीं दिखती तो लोग सहम जाते. दूर अंधेरे में कुछ चमक जाता तो लोग छतों से उतर कर घर में छिप जाते. हर अजनबी की नजर स्याह लगती. बेधती हुई. हर कोई जासूस था. दुश्मन का. हर कोई महत्त्वपूर्ण था. हर जान की कीमत थी. दो जानें. उस वक्त औकात और हैसियत नहीं देखी जा रही थी. बस जाति के आधार पर फैसला हो रहा था. सब एक हो गये थे. ये नहीं समझ रहे थे कि एक होकर भी सब टूट रहे हैं. मन से. लोकतंत्र से. प्रगति से. ये एकता किस काम की थी?

9 अक्टूबर 2013 को पटना हाई कोर्ट ने लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार के सभी 26 आरोपियों को बरी कर दिया. कहा कि किसी के खिलाफ कोई सबूत नहीं था. 58 लोगों की हत्या का कोई जिम्मेदार नहीं था.

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