प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की प्रयागराज मेला प्रशासन के साथ जबरदस्त तनातनी जारी है. इस बीच स्वामी अविमुक्तेशवरानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भी पूरी तरह मुखर हैं. सीएम पर हमला बोलते हुए उन्होंने उनकी तुलना मुगल बादशाह औरंगजेब से की. इससे पहले सीएम योगी ने बिना किसी का नाम लिए धर्म के खिलाफ आचरण करने वाले को 'कालनेमि' करार दिया था. कहा जा रहा है कि इस बयान के निशाने पर स्वामी अविमुक्तेशवरानंद ही थे.
प्रतापगढ़ के उमाशंकर पांडेय कैसे बने 'शंकराचार्य' अविमुक्तेश्वरानंद? CM योगी से टकराने पर चर्चा में हैं
Swami Avimukteshwarananda की शुरुआती पढ़ाई गांव के ही एक स्कूल में हुई. इसके बाद की पढ़ाई गुजरात के बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में हुई. 2022 में वे द्वारका पीठ के प्रमुख बने.


स्वामी अविमुक्तेशवरानंद और मेला प्रशासन के बीच विवाद स्नान और फिर एक नोटिस को लेकर हुआ. आरोप है कि प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने पहले स्वामी अविमुक्तेशवरानंद को पालकी पर बैठकर स्नान करने जाने से रोका. फिर एक कानूनी नोटिस थमा दिया. इसमें उनके ‘शंकराचार्य’ पद के दावे को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया. नोटिस में पूछा गया कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है तो नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ शब्द का प्रयोग कैसे किया जा रहा है?
मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को इसका जवाब देने के लिए 24 घंटे दिए थे. दरअसल, अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्योतिष पीठ के किसी भी नए 'पट्टाभिषेक' पर रोक लगा दी थी. पूरे विवाद पर दी लल्लनटॉप के एसोसिएट एडिटर सिद्धांत मोहन ने स्वामी अविमुक्तेशवरानंद ने बात की. बातचीत में उन्होंने योगी शासन पर जमकर निशाना साधा. स्वामी अविमुक्तेशवरानंद ने कहा,
इतिहास में हमें सुनाया गया कि औरंगजेब नाम का एक व्यक्ति था, वो बड़ा खराब था क्योंकि उसने मंदिर और मूर्तियां तोड़ी थीं. हमारे मन में यह धारणा बन गई कि जो मंदिर और मूर्ति तोड़ता है वह औरंगजेब होता है और वह खराब व्यक्ति होता है.
उन्होंने आगे कहा,
अब धारणा बनने के बाद काशी में हमने देखा कि वहां पर सैकड़ों मंदिर और उनके अंदर की मूर्तियों को तोड़कर मलबे में फेंका गया और बड़ी बुरी तरह से उनको तोड़ा गया. हमने पूछा कि भाई यह कौन कर रहा है? तो पता चला कि यह (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी और (मुख्यमंत्री) योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं. तो हमारे बाल मन ने जो धारणा पहले से अख्तियार की थी, वो तो यही थी न कि जो मूर्ति और मंदिर तोड़े वो औरंगजेब होता है. तो मूर्ति और मंदिर तो इन लोगों ने तोड़ा तो ये औरंगजेब नहीं हैं तो क्या हैं?
स्नान से रोके जाने पर आपत्ति जताते हुए स्वामी अविमुक्तेशवरानंद ने मुगलों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा,
हर सनातनी आकर स्नान कर सकता है तो जिन शंकराचार्यों ने प्रतिबंध हटाकर आम हिंदू जनता को संगम में स्नान करने का अवसर दिया, उन्हीं शंकराचार्यों को रोककर आप क्या मुगल बनेंगे? और मुगल बनेंगे तो क्या शंकराचार्य रुक जाएंगे? जब शंकराचार्य मुगलों के द्वारा रोके जाने पर भी नहीं रुके तो तुम्हारे रोकने से रुक जाएंगे?
अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शंकराचार्य बनने पर बात करते हैं. 11 सितंबर, 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया था. वे द्वारका की शारदा पीठ और बद्रिकाश्रम के ज्योतिष पीठ के प्रमुख थे. उनके निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ और स्वामी सदानंद को शारदा पीठ का प्रमुख बनाया गया था.
कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?स्वामी अविमुक्तेशवरानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में 15 अगस्त 1969 को हुआ था. बचपन में इनका नाम उमाशंकर पांडे था. शुरुआती पढ़ाई ब्राह्मणपुर गांव के ही एक स्कूल में हुई. इसके बाद की पढ़ाई गुजरात के बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में हुई. फिर संस्कृत का अध्ययन करने वह वाराणसी पहुंचे. सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में इसकी पढ़ाई पूरी की. काशी में ही उनकी मुलाकात स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुई थी. साल 2000 में उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए. फिर उनका नाम उमाशंकर पांडे से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पड़ गया.
धीरेंद्र शास्त्री को चुनौती और धर्म सेंसर बोर्ड
2023 में जोशीमठ की धंसती जमीन को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. इस दौरान उन्होंने कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री का नाम लिए बिना उन्हें 'चमत्कार दिखाने' की चुनौती भी दी. उन्होंने कहा था कि 'चमत्कार' दिखाने वाले जोशीमठ आकर धंसती जमीन को रोककर दिखाएं, तब मैं उनके ‘चमत्कार’ को मान्यता दूंगा. 2023 में ही उन्होंने ‘धर्म सेंसर बोर्ड’ बनाया था. इस बोर्ड का गठन 'पठान' फिल्म के 'बेशर्म रंग' गाने को लेकर हुए विवाद के चलते किया गया था.
ज्ञानवापी मामले में अनशन पर बैठे थे
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 4 जून 2022 को ज्ञानवापी परिसर में पूजा का ऐलान किया था. पुलिस प्रशासन की तरफ से रोके जाने के बाद वे 108 घंटे तक अनशन पर रहे थे. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के कहने पर उन्होंने अनशन खत्म किया था. दिसंबर, 2022 में 2015 के एक मामले को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आत्मसमर्पण किया था. मामला एक यात्रा के दौरान बलवा, आगजनी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हत्या की कोशिश करने से जुड़ा था. हालांकि, चंद घंटों की ज्यूडिशियल कस्टडी के बाद उन्हें मामले में बेल मिल गई थी. इसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस मामले को कुछ 'अधर्मियों' की साजिश बताया था.
देहरादून हवाई अड्डे के खंभे पर नाराजगी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जनवरी, 2023 में देहरादून हवाई अड्डे के खंभों पर बौद्ध धर्म का मंत्र लिखा देख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भड़क गए थे. उन्होंने सभी खंभों पर बौद्ध धर्म का मंत्र लिखा होने पर आपत्ति जताई जाती थी. बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि वो बौद्ध धर्म के विरोधी नहीं हैं, लेकिन क्या खंभों पर 'जय बद्री विशाल' या 'जय केदार बाबा' नहीं लिखा हो सकता था.
एक बार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद छिंदवाड़ा के किसी मंदिर में साईं की मूर्ति देखकर भी नाराज हो गए थे. उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा था कि आखिर राम-कृष्ण के मंदिर में साईं का क्या काम है? उन्होंने यह भी कहा था कि वो आगे से ऐसे मंदिर में नहीं जाएंगे.
वीडियो: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यूपी पुलिस और सतुआ बाबा के बारे में क्या बताया?












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