पश्चिम बंगाल के ‘लगभग सभी’ सरकारी अस्पतालों में शिफ्ट की खरीद-बिक्री चल रही है. सुनने में शायद अजीब लग रहा हो मगर इसका पूरा नेटवर्क है, जो व्हाट्सऐप पर रन करता है. व्हाट्सएप पर ग्रुप बने हुए हैं. ग्रुप में मेडिकल इंटर्न के मैसेज आते हैं. जिसमें शिफ्ट की लोकेशन, टाइमिंग और पैसा तीनों मेंशन होते हैं. फिर कोई इंटर्न पैसों के बदले ड्यूटी निभाने चला जाता है. ये सब कुछ अस्पताल प्रशासन के नाक के नीचे हो रहा था. क्या है पूरा स्कैम? शुरुआत से समझते हैं.
बंगाल के सरकारी अस्पतालों में व्हाट्सऐप पर बिक रहीं शिफ्ट, इंटर्न का 600 रुपये प्रति घंटा रेट
पश्चिम बंगाल के 'लगभग सभी' सरकारी अस्पतालों में मेडिकल इंटर्न के बीच शिफ्ट की खरीद-बिक्री चल रही है. ये बात खुद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री शरद्वत मुखोपाध्याय ने बताई है. पता चला कि व्हाट्सऐप ग्रुप के ज़रिए शिफ्ट को खरीदा और बेचा जा रहा था.

इंग्लिश अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने सरकारी अस्पतालों में इंटर्न की शिफ्ट की सेल-पर्चेज पर एक रिपोर्ट छापी है. अधिकारियों ने बताया कि मेडिकल इंटर्न के बीच शिफ्टों की अदला-बदली कोई नई बात नहीं है. आपसी तालमेल के तौर पर अनौपचारिक ढंग से ये व्यवस्था शुरू हुई थी.
मगर अब ये व्यवस्था 'पैसे देकर ड्यूटी बदलने' (कैश-फॉर-ड्यूटी) के एक नेटवर्क में तब्दील हो गई है. ये नेटवर्क कोलकाता और राज्य के अन्य हिस्सों के मेडिकल कॉलेजों में एक्टिव है. जहां इंटर्न अपनी अनिवार्य रोटेटरी शिफ्ट को 200 से 600 रुपये प्रति घंटे के बदले दूसरों को सौंप देते हैं.
व्हाट्सऐप पर ऐसे ही एक ग्रुप का नाम 'इंटर्नशिप रिप्लेसमेंट' है. इसमें 255 से ज़्यादा सदस्य हैं. ये लोग नियमित रूप से अपनी शिफ्ट की उपलब्धता और उसके बदले मिलने वाली अपेक्षित रकम के बारे में जानकारी शेयर करते हैं.
कैसे शेयर करते हैं मैसेज?एक अधिकारी ने एग्जाम्पल देते हुए बताया कि ग्रुप में एक मैसेज डाला जाता है. इसमें समय के हिसाब से पूछा जाता है कि क्या कोई इमरजेंसी रूम (ER) की शिफ्ट लेने के लिए तैयार है? जैसे कि "आज दोपहर 3 बजे से ER की इवनिंग शिफ्ट" या “आज रात 10 बजे से सुबह 8 बजे तक की नाइट ER शिफ्ट”. साथ में रेट भी बताते हैं.
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ये पूरी एक्टिविटी तब सामने आई जब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री शरद्वत मुखोपाध्याय एक अस्पताल में औचक निरीक्षण पर गए थे. उन्होंने बताया कि मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज में निरीक्षण के दौरान, उन्हें एक डेंटल कॉलेज का इंटर्न मिला जो MBBS इंटर्न की जगह काम कर रहा था. इस मुद्दे पर बात करने के लिए उन्होंने इस महीने मेडिकल कॉलेजों के प्रिंसिपलों और उपाध्यक्षों के साथ एक बैठक की.
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि ये प्रथा “लगभग सभी” सरकारी अस्पतालों में बड़े पैमाने पर पाई गई है. उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने इसमें शामिल कई इंटर्न की पहचान की है, उन्हें चेतावनी दी है और अब वे बायोमेट्रिक अटेंडेंस अनिवार्य करने जा रहे हैं.
ये सब हुआ क्यों?अधिकारियों ने बताया कि बंगाल के एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में औसतन लगभग 250 इंटर्न होते हैं. MBBS की डिग्री पाने के लिए उन्हें तय घंटों तक काम करना होता है, जिसमें मरीजों की केस हिस्ट्री लिखना जैसे काम शामिल हैं. इसके बदले उन्हें 40,000 से 50,000 रुपये महीना स्टाइपेंड मिलता है. ऐसे में किसी इंटर्न को केवल मेडिकल ग्राउंड या किसी इमरजेंसी पर ही छुट्टी मिलती है. ड्यूटी का समय 6 घंटे से लेकर 24 घंटे तक हो सकता है, और जो घंटे छूट जाते हैं, उन्हें बाद में पूरा करना जरूरी होता है.
एक सरकारी अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
"ये देखना बेहद अनएथिकल है कि इंटर्न अपनी ड्यूटी बदलने के लिए ऐसे मोलभाव कर रहे हैं, जैसे वे कोई किराने का सामान खरीद रहे हों."
आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में मेडिकल ऑफिसर तापस प्रमाणिक ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,
“आरजी कर में 10 मेडिकल ऑफिसर हैं, इसलिए सब हमें चेहरे से पहचानते हैं. अगर कोई अपनी ड्यूटी बदलना चाहता है, तो वो बाकी नौ मेडिकल ऑफिसर में से ही किसी के साथ ऐसा करता है. लेकिन, इंटर्न के मामले में ऐसा देखा गया है कि वे अपनी जगह पर आयुर्वेद के छात्रों, और यहां तक कि मेडिकल से न जुड़े अपने दोस्तों को भी काम पर लगा देते हैं.”
वहीं, एक दूसरा धड़ा भी है जो कह रहा है कि सभी को एक तराजू में नहीं तौलना चाहिए. कुछ इंटर्न दिन-रात लगाकर मेहनत करते हैं. एक इंटर्न ने कहा कि सरकार को ड्यूटी की समीक्षा तो करनी ही चाहिए. मगर साथ में उन कंडीशन और प्रेशर पर भी ध्यान देना चाहिए जिसमें वे काम करते हैं.
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