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'साइंस और आस्था' के बीच की लड़ाई, वरुण ग्रोवर का स्टैंडअप नहीं, ये लेक्चर वायरल होना चाहिए!

मशहूर बॉलीवुड राइटर Varun Grover ने हाल ही में YouTube पर एक वीडियो अपलोड किया है. इसमें उन्होंने Science और Faith को लेकर मजेदार बातें की.

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पुणे में लेक्चर के दौरान राइटर वरुण ग्रोवर. (YouTube)

मशहूर भारतीय गीतकार और लेखक वरुण ग्रोवर एक ऐसी शख्सियत हैं, जो ना केवल अपने लिखे गानों और फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, बल्कि उनका स्टैंड-अप सुनकर पेट भी दुखने लगता है. ये वही वरुण हैं, जिन्होंने 'मसान' जैसी फिल्में लिखीं और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के गाने दिए. उन्होंने पुणे में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर मेमोरियल कार्यक्रम में 'विज्ञान और आस्था' पर एक लेक्चर दिया था. इस लेक्चर को उन्होंने हाल ही में अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया है. तो आइए समझने की कोशिश करते हैं कि वरुण ग्रोवर की 'साइंस और आस्था के बीच का खेल' को कैसे देखते हैं.

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हत्यारों की बंदूक भी साइंस की

वरुण ने शुरुआत की सामाजिक कार्यकर्ता और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एएनआईएस) के संस्थापक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की बात से, जिनकी हत्या सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि वो अंधविश्वास के खिलाफ लड़ रहे थे. वरुण कहते हैं कि दाभोलकर के हत्यारे बंदूक लेकर आए थे. बंदूक, गनपाउडर, प्रोजेक्टाइल मोशन, थर्मोडायनामिक्स, ये सब साइंस की देन है. हत्यारे ये प्रूव करने आए कि आस्था साइंस से बड़ी है, लेकिन बंदूक से गोली चलाकर खुद साइंस का झंडा गाड़ गए. और सबसे बड़ी बात? दाभोलकर चले गए, लेकिन उनके विचार? वो तो और चमक गए. वरुण कहते हैं-

गोली से वो विचार नहीं मिटते बल्कि वो और बोल्ड और अंडरलाइन हो जाते हैं. लोग उनको दोबारा बार-बार जाकर पढ़ते हैं, बार-बार जाकर सुनते हैं, बार-बार उस रास्ते पर चलना चाहते हैं. बंदूक जो वो सोचते हैं एक 'इरेजर' है वो असल में एक परमानेंट 'मार्कर' है.

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आस्था = एमवे स्कीम, साइंस = किराने की दुकान

वरुण ने आस्था और धर्म को Amway स्कीम से जोड़ दिया. इस बारे में वरुण बोलते हैं,

आस्था दुनिया की पहली पिरामिड स्कीम है. जैसे एमवे, जितने लोग जोड़ो, उतने पावरफुल हो. ऊपर वाला सबसे बड़ा, नीचे वाले बस रिक्रूट लाते रहो. आपका काम है और रिक्रूट लाना. आपको चार लोगों को जाकर बताना है कि ये बहुत बढ़िया स्कीम है. इसमें बहुत पैसा मिलता है और तुम्हें कैसे मिलता है? तुम और चार को पकड़ के लाओगे तो मिलेगा.

दूसरी तरफ साइंस को वरुण ने किराने की दुकान बताया.

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विज्ञान आपके बगल की किराने की दुकान है. वहां पर आपको जो चाहिए, जैसा चाहिए आप वो ले सकते हैं. नहीं पसंद आएगा आप छोड़ सकते हैं. आप सवाल पूछ सकते हैं कि यार ये चावल में इस बार पिस्सू दिख रहा है तो बोलेगा अच्छा ठीक है. अगली बार थोड़ा सही लाएंगे. तो आप कोई सामान लाएं, आप बोल सकते हैं कि ये अच्छा नहीं था आप कोई सामान लाएं बोले कि ये बहुत बढ़िया था अगली बार यही लाना.

मतलब, साइंस में सवाल पूछने से रिश्ता मजबूत होता है. आस्था में सवाल पूछो तो रिश्ता टूट जाता है. वरुण के मुताबिक, हमारे देश में बचपन से यही सिखाया जाता है- बड़े जो बोलें, वो सही. चाहे वो थप्पड़ मारें, बाथरूम में बंद करें, या शादी-बच्चे का टाइमटेबल बताएं. ये 'कंफर्मिज्म' हमारे अंदर भरा पड़ा है.

जब गणेश जी ने नहीं पिया दूध

वरुण ने अपनी कहानी सुनाई, जो अन्य भारतीय बच्चे से मिलती-जुलती है. गलती करी तो 'भगवान देख रहे हैं' वाला डर. लेकिन वरुण को बचपन से कहानियों का शौक था. चंदा मामा, माइथोलॉजी, फिर बरमूडा ट्रायंगल और एलियंस की किताबें. लेकिन असली खेल हुआ 1995 में, जब पूरे देश में खबर फैली कि गणेश जी की मूर्ति दूध पी रही है.

15 साल के वरुण मंदिर गए, दूध पिलाया, लेकिन गणेश जी ने नहीं पिया. दोस्त बोला, "तेरा मन साफ नहीं है." वरुण ने अपने दोस्त से कहा कि तुम पिला कर देखो. तो उसका भी नहीं पिया. तो वरुण ने कहा कि “तेरा भी मन साफ नहीं है.” इस पर दोस्त ने जवाब दिया कि उसके दूध में यूरिया है.  

वरुण ने जवाब दिया, "भाई, तुझे यूरिया का पता है, तो कैपिलरी एक्शन भी पता होना चाहिए!" उसी दिन दूरदर्शन पर वैज्ञानिकों ने बताया कि ये सब कैपिलरी एक्शन और सर्फेस एक्शन यानी साइंस का खेल है.

साइंस और आस्था: लड़ाई या दोस्ती?

वरुण ने साइंस और आस्था की जंग को पुराने जमाने से जोड़ा. वे बताते हैं कि लाखों साल पहले हमारे चिंपैंजी जैसे पूर्वजों के जीन में एक 'एरर' हुआ. वो कहते हैं कि उसी एरर ने हमें बड़ा दिमाग दिया, जो सवाल पूछने लगा. बिजली क्यों चमकती है? मरते क्यों हैं? इन सवालों के जवाब देने के लिए पहले पुजारी आए. फिर साइंस ने धीरे-धीरे जवाब ढूंढे.

वरुण ने बताया कि पहले तो चर्च, टेंपल और मॉस्क ने साइंटिस्ट्स को फंड किया, लेकिन जब साइंस ने कहा कि पृथ्वी गोल है, तो बात अखर गई. वरुण का कहना है कि दोनों में टकराव तो है, लेकिन दोस्ती भी हो सकती है. क्यों? क्योंकि दोनों ही जवाब देते हैं, कहानियां सुनाते हैं, कम्युनिटी बनाते हैं, और 'सरेंडर' का भाव देते हैं. बस फर्क इतना है कि साइंस मुश्किल जवाब देता है, आस्था आसान जवाब देती है.

धर्म से सबसे बड़ा सवाल

वरुण ने धर्म को लेकर एक सवाल उठाया कि अगर तुम्हारा भगवान पूरी दुनिया बनाता है, तो दूसरे धर्म वालों से नफरत क्यों? वरुण कहते हैं,

तुम दूसरे इंसान से नफरत कैसे करते हो ये बोल कर कि वो दूसरे धर्म का है. ये कैसे हुआ उसको भी तो तुम्हारे भगवान ने बनाया होगा. या तुम ये कह रहे हो कि तुम्हारे भगवान ने सिर्फ तुम्हारे धर्म के लोग बनाए हैं. फिर दूसरे धर्म के भी एक भगवान है, ऊपर उन्होंने अपने धर्म के लोग बनाए हैं. तो भगवान जो हैं बहुत सारे, उन्होंने ज्योग्राफिकल एरिया बांटा हुआ है. सिर्फ देश के हिसाब से नहीं, शहर के हिसाब से नहीं, मोहल्ले के हिसाब से नहीं, मार्केट के एक ही मॉल में, तो ये चल क्या रहा है?

वरुण कहते हैं कि वो आपकी आस्था की पूरी इज्जत करता हूं. अगर आप ये मानते हैं कि पूरी दुनिया का हर इंसान आपके भगवान ने बनाया है. इसका मतलब है कि वो जो दूसरे धर्म का इंसान है, आप मान लीजिए आपके भगवान ने बनाया है.

अब कलाकार की बारी

वरुण ने लेक्चर के आखिर में कलाकारों की जिम्मेदारी बताई. उन्होंने बताया कि कलाकार साइंस और आस्था के बीच का पुल है. उन्होंने अल्बर्ट कामो की किताब 'द प्लेग' की कहानी सुनाई, जिसमें एक डॉक्टर और प्रीस्ट प्लेग से जूझ रहे गांव में लोगों की मदद करते हैं. प्रीस्ट डॉक्टर से पूछता है कि मैं तो भगवान के लिए ये काम और सेवा कर रहा हूं, आप किस लिए कर रहे हैं? डॉक्टर जवाब देता है, "मैं इंसान हूं, और इंसान अच्छे होते हैं."

वरुण आगे कहते हैं कि ‘हम अच्छे लोग हैं, हम बेहतर लोग बन सकते हैं. हम समझदार लोग हैं. चेतना हमारे अंदर है, विवेक हमारे अंदर है, रेशनल थिंकिंग हमारे अंदर है. इसको सिर्फ हमको समझना है और सामने लाना है.’

यह वरुण का एक पुराना लेक्चर है. वरुण ग्रोवर ने 20 अगस्त 2024 को डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की याद में हुए एक इवेंट में यह लेक्चर दिया था. 18 अप्रैल 2025 को वरुण ने इसे अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया.

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