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पेड़ लगाने को आए थे करोड़ों रुपये, खरीदे आईफोन, फ्रिज, लैपटॉप, इस रिपोर्ट ने सब बाहर ला दिया

Uttarakhand CAG Report: किसी प्रोजेक्ट के लिए अगर जंगल का कोई हिस्सा काटा जाता है, तो उसकी भरपाई करनी होती है. उसके बदले CAMPA कुछ पैसे वसूलता है जिनका इस्तेमाल फिर से पेड़ लगाने के लिए किया जाता है. CAG रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि CAMPA के फंड्स के पैसों का इस्तेमाल उन चीजों के लिए किया गया जो जंगल से जुड़ी नहीं थीं.

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उतराखंड के जंगलों की एक तस्वीर. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)
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अंकित शर्मा

उत्तराखंड बजट सत्र 2025 के दौरान, सदन में CAG ऑडिट रिपोर्ट पेश की गई. रिपोर्ट से पता चला है कि राज्य में फॉरेस्ट फंड के पैसों से आईफोन, फ्रिज और लैपटॉप खरीदे गए. इसके अलावा भी वित्तीय लेन-देन से जुड़ी कई गड़बड़ियों (Uttarakhand Audit Report) का पता चला है. CAG का मतलब है, कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया. इनका काम होता है, सरकारी खर्चे की जांच करना.

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हालिया रिपोर्ट साल 2017 से 2022 तक के सरकारी खर्चे से संबंधित है. सरकार के समक्ष इस रिपोर्ट को 28 अक्टूबर, 2024 को पेश किया गया था. इसके बाद 20 फरवरी, 2025 को इसे CAG की सरकारी वेबसाइट पर डाला गया. वित्तीय गड़बड़ियां CAMPA के फंड्स से जुड़ी हैं. CAMPA का मतलब है, 'प्रतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण'. 2016 में इसका गठन किया गया था. CAMPA का उद्देश्य है, नष्ट हुए जंगलों को फिर से अपने पुराने रूप में लाना.

CAMPA के तहत जंगलों के विकास पर खर्च होने वाले पैसों को डायवर्ट किया गया. इनका इस्तेमाल अन्य कामों के लिए किया गया.

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  • 56.97 लाख रुपये, जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी (JICA) प्रोजेक्ट को कर भुगतान के लिए दिए गए, जो ‘वैद्य खर्चा’ नहीं था. 
  • 13.51 लाख रुपये, अल्मोड़ा के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) के ऑफिस में 'सोलर फेंसिंग' पर खर्च हुए. इसके लिए जरूरी अप्रूवल नहीं लिए गए थे. 

'सोलर फेंसिंग' का मतलब है, खेत के चारों ओर सोलर से चलने वाला घेरा लगाना. इसमें तार के जरिए जानवरों को हल्का झटका लगता है. इससे जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचता और वो फसलों से दूर रहते हैं. 

  • 6.54 लाख रुपये, जन जागरूकता अभियान के लिए अलॉट हुए थे, लेकिन इनका इस्तेमाल ‘चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट’ (CCF), विजिलेंस और कानून विभाग के ऑफिस पर किया गया.

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आईफोन, फ्रिज और लैपटॉप पर करोड़ों खर्च
  • 13.86 करोड़ रुपये, का दुरुपयोग संभागीय स्तर (डिवीजन लेवल) पर किया गया. इन पैसों का इस्तेमाल टाइगर सफारी प्रोजेक्ट्स पर, कानूनी फीस भरने के लिए और व्यक्तिगत यात्राओं के लिए किया गया. इसके अलावा इन्हीं पैसों से आईफोन, फ्रिज, लैपटॉप और ऑफिस के सामान खरीदे गए. जबकि ये फंड इस तरह के खर्चों के लिए था ही नहीं.
जंगल की जमीन का गलत उपयोग

हालिया ऑडिट में ये भी पता चला है कि जंगल की जमीन का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया है. ये फॉरेस्ट कंजर्वेशन (FC) के गाइडलाइंस का उल्लंघन है. 

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  • 188.62 हेक्टेयर फॉरेस्ट लैंड का इस्तेमाल फाइनल अप्रूव्ल के बिना ही नन-फॉरेस्ट चीजों के लिए किया गया.
  • 52 ऐसे मामले हैं, जिनमें भारत सरकार के जरूरी क्लीयरेंस के बिना ही फॉरेस्ट लैंड पर प्रोजेक्ट्स शुरू किए गए.

रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि इन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ है. इसके बावजूद इनमें शामिल एजेंसियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. 

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पेड़ लगाने का प्रोजेक्ट फेल क्यों हुआ?

ऑडिट में बताया गया है कि जंगल क्षेत्र को संतुलित रखने के लिए जो भी प्रयास किए गए, वो पर्याप्त नहीं हैं. राज्य में पेड़ लगाने के लिए 60 से 65 प्रतिशत का सर्वाइवल रेट होना चाहिए. आसान भाषा में इसका मतलब है कि काटे गए जंगल के बदले जितने भी पेड़ लगाए जाते हैं, उनमें से 60 से 65 प्रतिशत का जिंदा बचना जरूरी है. लेकिन राज्य में ये सर्वाइवल रेट मात्र 33.51 प्रतिशत है. इसके पीछे कुछ कारण भी बताए गए हैं-

  • पेड़ों को ऐसे इलाकों में लगाया गया जहां की जमीन बहुत ढलानदार और चट्टानी थी. ऐसी जगहों पर पेड़ों का बढ़ना और जीवित रहना मुश्किल होता है.
  • इलाके में पहले से मौजूद पाइन के बड़े पेड़ों के कारण, नए पौधों का बढ़ना मुश्किल हो गया. नए पौधों को पर्याप्त धूप, जगह और पोषण नहीं मिला.
  • पौधों की सुरक्षा में लापरवाही बरती गई. इसके कारण मवेशियों और इंसानी गतिविधियों से उनको नुकसान हुआ.
  • काटे गए पेड़ों की भरपाई के लिए 22.08 लाख रुपये खर्च किए गए. लेकिन उम्मीद के मुताबिक रिजल्ट नहीं मिला.

CAG रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019-20 में CAMPA फंड से 2.31 करोड़, 2020-21 में 7.96 करोड़ और 2021-22 में 3.58 करोड़ से ज्यादा रुपये गैर जरूरी चीजों पर खर्च हुए हैं. इस तरह इस फंड से कुल 13.86 करोड़ रुपयों का गैर जरूरी इस्तेमाल हुआ है. 

CAG रिपोर्ट में एक और जरूरी खुलासा किया गया है. बताया गया है कि इस तरह की गड़बड़ी नई नहीं है. साल 2013 की ऑडिट रिपोर्ट का हवाला भी दिया गया है. उस रिपोर्ट में भी ऐसी ही कई कमियों का पता चला था. वो रिपोर्ट साल 2006 से 2012 तक के सरकारी खर्चे से जुड़ी थी. उस रिपोर्ट में इन गड़बड़ियों का खुलासा हुआ था-

  • जब भी किसी परियोजना के लिए जंगल काटे जाते हैं, तो उसकी भरपाई के लिए पैसे वसूले जाते हैं. इन पैसों का इस्तेमाल पेड़ लगाने के लिए जाता है. ये काम CAMPA के जरिए किया जाता है. रिपोर्ट में पता चला था कि 212.28 करोड़ रुपये का शुल्क जमा ही नहीं किया गया था. 
  • 2.13 करोड़ रुपये, ऐसे प्रोजेक्ट्स पर खर्च हुए थे जिनकी अनुमति ही नहीं मिली थी. 
  • 3.74 करोड़ रुपये, तय सीमा (sanctioned limit) से ज्यादा खर्च किए गए थे.
  • 12.26 करोड़ रुपये, वैसी चीजों पर खर्च हुए जो पर्यावरण से जुड़े ही नहीं थे. जैसे कि प्रिंसिपल सेक्रेटरी के आवास की मरम्मत, सरकारी घरों और गाड़ियों का रख-रखाव.
  • 6.14 करोड़ रुपये, अनावश्यक चीजों पर खर्च हुए थे. जैसे कि बजट मीटिंग के दौरान लंच. ऐसे ही 35 लाख रुपये कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के लिए एक समारोह पर खर्च हुए थे.

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