अमेरिका ने आखिरकार वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (WHO) से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे काल के शासन के पहले दिन ही WHO को नोटिस भेज दिया था. लिखा था कि उन्हें WHO के काम करने का तरीका सही नहीं लगता. खासकर जिस तरह से COVID-19 मामले में WHO ने कोताही बरती थी. एक्सपर्ट का मानना है कि अमेरिका WHO का सबसे बड़ा कंट्रीब्यूटर रहा है. इस फैसले के बाद ग्लोबल हेल्थ पर गहरा असर पड़ेगा.
अमेरिका अब WHO का सदस्य नहीं, 570 मिलियन डॉलर की फंडिंग बंद, भारत पर क्या असर?
US ने WHO से अपनी सदस्यता ख़त्म ख़त्म कर ली है. Trump ने एक साल पहले ही WHO से बाहर निकलने की धमकी दी थी. अब ये प्रोसेस पूरा हो गया है. WHO की कुल फंडिंग का 18 फीसद हिस्सा अमेरिका से आता है.
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न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, अमेरिका का WHO पर 260 मिलियन डॉलर का उधार बकाया है. वहीं एक यूएस अधिकारी ने कहा कि अमेरिका ने पहले ही बहुत कर दिया है. ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट बताती है कि औसतन अमेरिका एक साल में 111 मिलियन डॉलर सदस्य शुल्क और 570 मिलियन डॉलर का योगदान देता है. ट्रंप प्रशासन ने पहले ही WHO की फंडिंग पर रोक लगा दी थी. ट्रंप ने आरोप लगाए कि WHO ने COVID-19 की महामारी को रोकने के लिए सही कदम नहीं उठाए.
उन्होंने कंप्लेन में ये भी कहा कि WHO के अब तक के चीफ एग्जीक्यूटिव में कोई भी अमेरिकी नहीं रहा है. जबकि WHO अमेरिका पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहती है. ट्रंप प्रशासन चाहता है कि लोगों तक स्वास्थ्य मदद पहुंचाने के लिए उसे किसी तीसरे की ज़रूरत न पड़े. कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि जेनेवा स्थित WHO हेडक्वार्टर के बाहर से अमेरिका का झंडा भी गायब है.
रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका शुरू से WHO का सबसे बड़ा डोनर रहा है. करीब 18 फीसदी फंडिंग यहां से आती थी. सदस्यता ख़त्म होने के बाद से WHO के फंडिंग पर असर पड़ेगा. WHO के स्टाफ कम हो जाएंगे और कई हेल्थ प्रोग्राम अनिश्चितकाल के लिए रुक जाएंगे. एक्सपर्ट का मानना है कि इससे अमेरिका, WHO और दुनिया सब पर असर पड़ेगा.
उनका कहना है कि इससे गरीब देशों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा. अफ्रीका के देशों में WHO कई हेल्थ प्रोग्राम जिसमें एबोला, पोलियो और एमपॉक्स जैसे खतरनाक बिमारियों के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाता है. मैटरनल हेल्थ, चाइल्ड केयर, HIV और मलेरिया के वैक्सीन प्रोग्राम भी चलाए जाते हैं. ये सब अमेरिका स्पॉंसर करता था.
WHO से अलग होने के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों और फार्मा कंपनियों के लिए शोध करना मुश्किल हो जाएगा. साथ काम करने से जिन नए वायरस के बारे में पता लगाया जा सकता है अब वो कम मुमकिन होगा. वैज्ञानिकों की चिंता है कि डेटा कहां से आएगा?
इस फैसले के बाद से भू-अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों पर भी असर पड़ेगा. WHO के बाकी सदस्यों के बीच (जिनमें भारत भी शामिल है) खींचतान होगी. ग्लोबल हेल्थ के लिए मानक तय करना और निर्देश जारी करना भी मुश्किल हो जाएगा. हालांकि भारत पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
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