दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति और खुद को ‘ग्लोबल चौधरी’ समझने वाले अमेरिका के पैरों तले जमीन खिसक गई है. खबर आई है कि अमेरिका के हथियारों का गोदाम खाली होने की कगार पर पहुंच गया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है कि ईरान के साथ हुए सीधे सैन्य टकराव के बाद अमेरिका के पास एडवांस मिसाइलों और गोला-बारूद की भारी कमी हो गई है.
अमेरिका के पास ‘गोला-बारूद’ खल्लास, भारत में क्यों महंगा होने वाला है पेट्रोल-डीजल?
America's Ammunition Crunch: अमेरिका में हथियारों की भारी कमी से दुनिया के समीकरण बदल गए हैं. जानिए कैसे ये संकट भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ा सकता है और क्यों ये 'मेक इन इंडिया' के लिए एक बड़ी लॉटरी साबित होने वाला है.


‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की मानें तो हालात इतने खराब हैं कि अमेरिका ने चुपके से अपने नाटो (NATO) सहयोगियों को भी सचेत कर दिया है कि किसी नए संकट की स्थिति में वो अब पहले की तरह असीमित हथियारों की सप्लाई नहीं कर पाएगा.
व्हाइट हाउस और अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस खबर को मीडिया की मनगढ़ंत कहानी बताकर खारिज करने की कोशिश की. मगर सच छुपता नहीं है. ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी संसद से सेना के लिए 87.6 बिलियन डॉलर (करीब 8350 करोड़ रुपये) के आपातकालीन फंड की मांग कर दी है. इसमें से 21 बिलियन डॉलर (करीब 2100 करोड़ रुपये) सिर्फ नए हथियार खरीदने और हथियार कंपनियों की रफ्तार बढ़ाने के लिए हैं.
अब जब सरकार खुद अरबों डॉलर की भीख मांग रही है, तो साफ है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है. दूसरी तरफ, अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी इस फंड का कड़ा विरोध कर रही है. उनका कहना है कि बिना मंजूरी के देश को जंग में झोंक दिया गया और अब टैक्सपेयर्स का पैसा फूंका जा रहा है.

मगर सवाल ये है कि वाशिंगटन में बैठे पेंटागन के खाली होते गोदामों से नई दिल्ली में रहने वाले आपके और हमारे जीवन पर क्या असर पड़ेगा? इसका जवाब बहुत सीधा और चौंकाने वाला है.
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर लगेगी आग
अब बात करते हैं कूटनीति की कड़वी हकीकत की, जो सीधे आपकी जेब से जुड़ी है. अमेरिका के पास हथियार खत्म होने का मतलब है कि मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में ईरान और इजरायल के बीच चल रहा तनाव अब बेकाबू हो सकता है. जब तक अमेरिका के पास हथियारों का पूरा स्टॉक था, वो एक बड़े सुरक्षा कवच की तरह काम करता था. अब जब अमेरिका खुद बैकफुट पर है, तो खाड़ी देशों में जंग की आग भड़कने का खतरा दोगुना हो गया है.
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल (Crude Oil) इन्हीं खाड़ी देशों से आयात करता है. अगर मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा या सप्लाई चेन बाधित हुई, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. इसका सीधा नतीजा ये होगा कि भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम एक बार फिर आम आदमी का बजट बिगाड़ देंगे. अमेरिका की इस सैन्य लाचारी की पहली किश्त भारत के आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल पंप पर चुकानी पड़ सकती है.
ड्रैगन का डंक और भारत पर डबल दबाव
इस पूरे संकट का सबसे खतरनाक पहलू है चीन यानी ड्रैगन की चालबाजियां. जब अमेरिका खुद अपने हथियार बचाने और नाटो का कोटा काटने में लगा है, तो वो ताइवान या हिंद महासागर में चीन से सीधे भिड़ने की हैसियत में बिल्कुल नहीं बचेगा. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिपोर्ट यानी SIPRI के मुताबिक वाशिंगटन ने अपने स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स और पनडुब्बियों के कोटे में जो कटौती की है, उससे साफ संकेत मिलता है कि वो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अब ज्यादा एक्टिव नहीं रह पाएगा.
एशिया में दादागिरी कर रहे चीन को रोकने के लिए बना 'क्वाड' (QUAD) संगठन भी अब कमजोर पड़ सकता है. भारत की विदेश नीति को लंबे समय से कवर करने वाले सीनियर जर्नलिस्टे रोहित शर्मा कहते हैं,
'क्वाड' के कमजोर होने की सूरत में, हिंद महासागर और LAC पर चीन के अग्रेशन को अकेले काउंटर करने का पूरा दारोदर अब भारत के कंधों पर आ गया है. भारत को हमेशा से चीन और पाकिस्तान के खिलाफ टू-फ्रंट वॉर (Two-Front War) के लिए तैयार रहना पड़ता है. अब अमेरिका की इस कमजोरी का फायदा उठाकर चीन सीमा पर फिर से आंख दिखाने की गुस्ताखी कर सकता है.
अमेरिकी हथियार संकट और भारत पर असर का पूरा ढांचा
अमेरिका के पास असलहा खत्म हो रहा है तो ये भारत के लिए अच्छी और बुरी दोनों तरह की खबर है. इस ग्राफिक्स के जरिए जानने की कोशिश करते हैं कि इस संकट का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

'मेक इन इंडिया' की सबसे बड़ी जीत
मगर रुकिए, इस पूरी डरावनी तस्वीर के बीच भारत के लिए दो बहुत ही सकारात्मक और ऐतिहासिक पहलू भी निकलकर सामने आ रहे हैं. पहला पहलू है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत.
जरा सोचिए, अगर भारत आज भी हथियारों के लिए पूरी तरह से केवल पश्चिमी देशों या दूसरे मुल्कों पर निर्भर होता, तो आज हमारा क्या हाल होता? अमेरिका जैसा रईस और शक्तिशाली देश अगर सप्लाई चेन के संकट में फंस सकता है, तो किसी और देश का क्या भरोसा किया जाए? रक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने पिछले कुछ सालों में जो विदेशी हथियारों पर अपनी निर्भरता कम की है. साथ ही घरेलू रक्षा उत्पादन (Defense Manufacturing) को बढ़ावा दिया है, वो आज एक मास्टरस्ट्रोक साबित हो चुका है. अपने दम पर गोला-बारूद बनाने की क्षमता ही देश को असली संप्रबूता देती है, जो आज भारत के पास है.
भारतीय कंपनियों की खुल गई लॉटरी
दूसरा बड़ा फायदा है भारतीय बिजनेस और कॉर्पोरेट जगत के लिए. अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस इस समय भारी दबाव में है और वो दुनिया भर से मिल रहे ऑर्डर्स को पूरा नहीं कर पा रहा है. ऐसे में दुनिया की नजरें अब भारत की तरफ मुड़ रही हैं. सारा दारोमदार इस बात पर है कि भारत सरकार का रक्षा उत्पादन विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए कितना तैयार है.
भारत की दिग्गज डिफेंस कंपनियां जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), टाटा और कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स के लिए ये संकट एक बहुत बड़े बिजनेस मौके (Business Opportunity) में बदल चुका है. भारत पहले से ही कई तरह के रक्षा उपकरणों के पार्ट्स और आर्टिलरी शेल्स का एक्सपोर्ट कर रहा है. डिफेंस एक्सपर्ट राजीव रंजन कहते हैं,
अब अमेरिकी कंपनियों की लाचारी का फायदा उठाकर भारतीय कंपनियां ग्लोबल डिफेंस सप्लाई चेन पर अपना कब्जा जमा सकती हैं. इससे ना सिर्फ देश में रोजगार बढ़ेगा, बल्कि भारत एक बड़े हथियार निर्यातक देश के रूप में स्थापित हो जाएगा.
वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती धमक
इस पूरे मामले का एक और पहलू भारत की विदेश नीति का संतुलन है. जब यूक्रेन संकट शुरू हुआ था, तब पश्चिमी देशों ने भारत पर दबाव बनाया था कि वो रूस से तेल और हथियार खरीदना बंद कर दे. भारत ने तब भी अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को सर्वोपरि रखा और किसी एक गुट का हिस्सा बनने से मना कर दिया.
आज अमेरिका की ये हालत देखकर ये साबित हो गया है कि भारत की वो नीति कितनी दूरदर्शी थी. अगर भारत सिर्फ अमेरिका या नाटो के भरोसे बैठा रहता, तो आज भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती. क्योंकि अब अमेरिका खुद अपने हाथ खड़े कर रहा है. रूस के साथ मजबूत रिश्ते और फ्रांस जैसे देशों से राफेल जैसे एडवांस जेट्स की डील ने भारत को एक ऐसा सुरक्षा कवच दिया है, जो किसी एक देश की मर्जी या लाचारी का मोहताज नहीं है. वैश्विक कूटनीति के मंच पर भारत अब एक 'बैलेंसिंग पावर' बनकर उभरा है.
भारत को अब क्या करना होगा?
इस महा-संकट से सीख लेते हुए भारत को अपनी रणनीतियों को और ज्यादा धार देनी होगी. सबसे पहले, भारत को अपने 'वॉर वेस्टेज रिजर्व्स' (War Wastage Reserves) यानी युद्ध के समय इस्तेमाल होने वाले गोला-बारूद के स्टॉक को अगले पांच साल की जरूरतों के हिसाब से एडवांस में तैयार रखना होगा. DRDO के ऊपर भी जिम्मेदारी काफी हदतक बढ़ गई है.
दूसरा, प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को रक्षा क्षेत्र में और तेजी से बढ़ाना होगा ताकि लालफीताशाही के चक्कर में प्रोडक्शन की रफ्तार कम ना हो. अमेरिका की कमजोरी हमारे लिए एक चेतावनी भी है और एक ऐतिहासिक मौका भी. अगर भारत ने इस समय सही कूटनीतिक चालें चलीं, तो वो ना सिर्फ अपनी सीमाओं को सुरक्षित रख पाएगा, बल्कि दुनिया के रक्षा बाजार में एक नया 'ग्लोबल हब' बनकर उभरेगा.
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