दुकान पर QR कोड स्कैन किया, पैसे दिए और सामान लेकर निकल गए. न कैश की टेंशन, न छुट्टे का झंझट. लेकिन जिस UPI को हम मुफ्त की सुविधा समझकर इस्तेमाल कर रहे हैं, उसकी कीमत अब तक कौन चुका रहा था? और क्या आगे दुकानदारों को हर बड़े UPI पेमेंट पर चार्ज देना पड़ेगा? 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कुछ ऐसा ही जवाब दिया. सरकार ने साफ कहा कि UPI को हमेशा मुफ्त रखने का कोई वादा नहीं किया गया था.
‘UPI को फ्री रखने का वादा... ' सरकार ने MDR पर अपना इरादा साफ कर दिया
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार, 5 नवंबर को UPI से जुड़े एक मामले में सुनवाई हुई. इसमें Merchant Discount Rate (MDR) के मामले पर सरकार ने अपना पक्ष रखा. केंद्र सरकार ने कोर्ट को अपना इरादा साफ-साफ बता दिया. छोटे और बड़े व्यापारियों को लेकर भी कुछ बातें बताई हैं.

सितंबर 2026 में केंद्र सरकार की संस्था National Payments Corporation of India यानी NPCI ने 2,000 रुपए से ज्यादा के मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर Merchant Discount Rate यानी MDR लगाने का आदेश निकाला था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. अब सरकार ने कोर्ट में अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि UPI का सिस्टम चलाने, उसे सुरक्षित रखने और बेहतर बनाने में हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं. ऐसे में हर ट्रांजैक्शन को हमेशा मुफ्त रखना टिकाऊ नहीं है.
MDR क्या होता है और ये किससे वसूला जायेगा? मान लीजिए आपने किसी दुकान से 5,000 रुपये का सामान खरीदा. आपने UPI से पेमेंट किया. आपके खाते से 5,000 रुपये कटे, लेकिन दुकानदार को मिलने वाली रकम में से पेमेंट प्रोसेस करने का एक हिस्सा काट लिया जाए. इसी चार्ज को Merchant Discount Rate यानी MDR कहते हैं. ये चार्ज ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाता, बल्कि व्यापारी के खाते में से पेमेंट सेटलमेंट के दौरान काटा जायेगा. इस रकम का बंटवारा पेमेंट सिस्टम से जुड़े बैंकों और दूसरे सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच होता है. NPCI इसे 15 अक्टूबर 2026 से लागू करना चाहती थी, लेकिन फिलहाल ये चार्ज अभी लागू नहीं हुआ है.
इसको लेकर कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 नवंबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया. सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि नए फ्रेमवर्क पर विचार पहले से चल रहा था और इसे अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स से बातचीत करने के बाद फाइनल किया गया है. सरकार के मुताबिक, व्यापारियों को कभी ये गारंटी नहीं दी गई थी कि UPI पर प्रोसेसिंग फीस हमेशा जीरो रहेगी. अब तक दी जाने वाली सब्सिडी भी सरकार की मर्जी पर निर्भर थी, इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी. सरकार ने ये भी कहा कि संविधान का आर्टिकल 14 समानता का अधिकार देता है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हर तरह के ट्रांजैक्शन पर एक जैसी व्यवस्था होनी चाहिए.
छोटे और बड़े व्यापारियों की स्थिति अलग-अलग है. इसलिए पेमेंट की रकम और व्यापारी की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग नियम बनाना गलत नहीं है. सरकार का तर्क है कि 2,000 रुपये तक के ट्रांजैक्शन को मुफ्त रखकर आम ग्राहकों और छोटे व्यापारियों को राहत दी गई है. वहीं, बड़े ट्रांजैक्शन करने वाले कारोबारियों से मामूली चार्ज लिया जायेगा.
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सरकार ने अपने हलफनामे ये भी कहा कि UPI से पेमेंट मुफ्त होने का मतलब ये नहीं कि उसे प्रोसेस करने में कोई खर्च नहीं आता. साइबर सिक्योरिटी में फ्रॉड रोकने और विवादों का निपटारा करने के लिए लगातार निवेश करना पड़ता है. सरकार ने बताया कि 2021-22 से 2024-25 के बीच उसने बैंकों को जीरो MDR व्यवस्था बनाए रखने के लिए 8,730 करोड़ रुपये दिए हैं. कुल जमा ये कि सरकार के मुताबिक पूरी व्यवस्था का खर्च सिर्फ सरकारी सब्सिडी से उठाना लंबे समय तक संभव नहीं है. इस पूरे मामले में एक अहम सवाल ये भी है कि क्या व्यापारी इस चार्ज का बोझ ग्राहकों पर डाल देंगे? भले ही सरकार ने कहा है कि MDR को ग्राहकों से वसूलने की अनुमति नहीं हैं, लेकिन ये चीज़ प्रैक्टिकली कितनी पॉसिबल है, इसपर विचार करने की जरूरत है.
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