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दिल्ली जिस प्रदूषण से हर साल बेहाल हो जाती है, उसके लिए बजट 2026 में क्या है?

2026-27 के केंद्रीय बजट में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए केंद्र सरकार की ओर 1 हजार 91 करोड़ रुपये आवंटित किया गया है. जबकि, 2024-25 के केंद्रीय बजट में 13 सौ करोड़ रुपये आवंटित किया गया था.

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देश में प्रदूषण कंट्रोल करने के लिए पिछली बार के तुलना में कम फंड प्राप्त हुआ. (फोटो- इंडिया टुडे)

दिल्ली को जो प्रदूषण हर साल खांसने को मजबूर कर देता है, उसके लिए निर्मला सीतारमण के बजट में इस बार क्या रहा? ये सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि इस साल साफ हवा को लेकर दिल्ली में लोग सड़कों पर उतर आए. सर्दियां आते ही दस्तक देने वाले प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को लताड़ लगाई. ऐसे में सभी को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार के बजट में इश बार प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई के लिए कुछ न कुछ तो होगा ही. चलिए देखते हैं इस उम्मीद पर सरकार कितनी खरी उतरी है.

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इंडिया टुडे से जुड़ी श्रेया चटर्जी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने इस बार प्रदूषण कंट्रोल के बजट पर  पिछले साल के मुकाबले कटौती कर दी है. साल 2026-27 के केंद्रीय बजट में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए केंद्र सरकार की ओर 1 हजार 91 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं जबकि, 2024-25 के केंद्रीय बजट में 1300 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. प्रदूषण कंट्रोल के बजट में ये कटौती ऐसे समय में आई है, जब देश कई प्रकार के पर्यावरणीय संकटों से गुजर रहा है. लू, शहरों में बाढ़, खतरनाक चक्रवात आए दिन दस्तक दे रहे हैं. बावजूद, इसके पर्यावरण का संरक्षण करने और जलवायु को सही करने के प्रयास में सरकार का कदम काफी सीमित नजर आ रहा है. 

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026-27 के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को 3 लाख 75 हजार 946 करोड़ रुपये दिए गए हैं. यह साल 2025-26 के बजट से करीब 8 प्रतिशत ज्यादा है. पर्यावरण संरक्षण के लिए दिए गए इस बजट की प्रतिशत वृद्धि देखने में सम्मानजनक लगती है लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों की नजर में ऐसा नहीं है. 

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पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते जलवायु जोखिम, तेजी से हो रहे पारिस्थितिकी गिरावट और विदेशी प्रतिबद्धताओं (टैक्स या टैरिफ) का सामना कर रहे देश के लिए यह बजट बहुत ही कम और छोटा है. हालांकि, बजट से कुछ संस्थाओं में मजबूती नजर आ रही है. जैसे- बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसे सरकारी निकायों के लिए बजट की आवंटन राशि बढ़ी है. वहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को भी ज्यादा फंड मिला है. 

इन सबके बाद भी प्रदूषण कंट्रोल करना, जो कि सबसे जरूरी है और सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है, उसे नजरअंदाज किया जा रहा है.  प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के लिए जारी फंड 1 हजार 91 करोड़ रुपये है. वह भी ऐसे समय में जब महानगरों में हवा की क्वालिटी अक्सर 'गंभीर' श्रेणी में चली जाती है. 

क्लाइमेट एक्टीविस्ट लिसिप्रिया कंगुजम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बजट में हुए इस कटौती पर सवाल उठाया और लिखा,

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यह देखकर बहुत निराशा हुई कि 2026-27 के बजट में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए 1,091 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए हैं. जो कि पिछले साल के 1,300 करोड़ रुपये से कम है. पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को नजरअंदाज करने से वायु प्रदूषण का संकट और भी बदतर होगा.

हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि प्रदूषण अब भी उनकी प्राथमिकता है. आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने कहा कि केंद्र सरकार कई फंडिंग चैनलों के जरिए से हवा और पानी के प्रदूषण को कम करने की लगातार कोशिश कर रहा है. ठाकुर ने आगे कहा,

प्रदूषण सरकार के लिए एक प्राथमिकता है. हम हवा और पानी के प्रदूषण से संबंधित परियोजनाओं पर कई राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. सीवेज कंट्रोल के साथ-साथ गंदे पानी की उचित निकासी पर भी जरूरी फंड आवंटन किया गया है.

ठाकुर ने अपने बयान में आगे कहा कि बजट का एक बड़ा हिस्सा पानी और स्वच्छता बल्कि विशेष तौर पर स्वच्छता से ही जुड़ा हुआ है. सरकार के लिए सभी प्रकार का प्रदूषण सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है. जिसे कम करने और उससे निपटने के लिए अलग-अलग तरीकों से कोशिश की जा रही है.

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बता दें कि विपक्ष अभी भी इस बजट से कुछ खास आश्वस्त दिखाई नहीं दे रहा है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने वायु प्रदूषण पर पूरी तरह से संसदीय बहस की मांग की है. साथ ही सरकार से प्रदूषण को कंट्रोल के लिए आवंटित किए गए बजट को और बढ़ाने की भी मांग की है. नेता प्रतिपक्ष ने एक वीडियो के जिए मैसेज देते हुए कहा,  

अब समय आ गया है कि सरकार संसद में चर्चा की इजाजत दे और प्रधानमंत्री प्रदूषण को राष्ट्रीय स्वास्थ्य इमरजेंसी घोषित करें. हमें एक साथ आना होगा और एक गंभीर प्लान बनाना होगा. साथ ही हमें यह भी पक्का करना होगा कि इससे इस समस्या से निपटने के लिए बजट में पर्याप्त पैसा भी हो.

हालांकि, अब भी एक बड़ा और अहम सवाल बना हुआ है. भारत जैसा बड़ा देश, जो एक गंभीर हवा और जलवायु संकट से जूझ रहा है, क्या यह बजट ऐसी ‘इमरजेंसी’ के पैमाने से मेल खा रहा है? 

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