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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को भंग करने की चेतावनी दी, 'नॉनसेंस' तक कह दिया

Supreme Court slams UP police: सुप्रीम कोर्ट में यूपी पुलिस की एक जांच में कथित 'हेरफेर' को लेकर एक मामला पहुंचा. इस पर कोर्ट ने पुलिस की फटकार लगाई. कहा, "हर चीज में आपका कोई न कोई एजेंडा होता है."

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की फटकार लगाई है. (सांकेतिक फोटो, Courtesy-इंडिया टुडे)

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  • सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को एक मामले की जांच में पक्षपात और एफआईआर में अज्ञात व्यक्ति का नाम दर्ज करने पर फटकार लगाई तथा सभी जांच CBI को सौंपने पर विचार करने का संकेत दिया।
  • इस कार्रवाई का कारण बाइक सवार से जुड़े मामले में पुलिस द्वारा आरोपी का नाम एफआईआर में न शामिल करना और जांच में धांधली के आरोप हैं, जिससे कानून व्यवस्था पर लोगों का भरोसा प्रभावित हुआ।
  • कोर्ट ने अगली सुनवाई में संबंधित पुलिस अधिकारी को पेश होने और एफआईआर में आरोपी का नाम शामिल न करने का कारण बताने के निर्देश दिए हैं, संभवतः इससे जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित होगी।

“हर चीज में आपका कोई न कोई एजेंडा होता है.” सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को फटकार लगाते हुए यह टिप्पणी की. कोर्ट ने एक मामले की जांच को लेकर पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई. शीर्ष अदालत ने ये भी कहा कि वह यूपी में सभी जांच का काम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को सौंपने का आदेश भी दे सकती है.

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बुधवार, 30 सितंबर को जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच एक बाइक सवार से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने अपनी याचिका में बताया कि उसने आरोपी को पकड़कर पुलिस के हवाले किया था. बावजूद इसके पुलिस ने 'अज्ञात व्यक्ति' के खिलाफ FIR दर्ज की. 

"यह ‘नॉनसेंस’ कहीं तो रुकनी चाहिए"

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने जांच के तरीकों पर सवाल उठाते हुए कहा,

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"हर चीज में आपका कोई न कोई एजेंडा होता है. अगर आप मामलों को इस तरह से संभालेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे? बेहतर होगा कि हम UP पुलिस की सभी जांच CBI को सौंप दें. हम UP पुलिस को भंग भी कर सकते हैं. यह ‘नॉनसेंस’ कहीं न कहीं रुकनी चाहिए."

रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसने पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हाई कोर्ट के दखल के बाद पुलिस ने चार्जशीट में आरोपी का नाम शामिल किया. बाद में उसे क्लीन चिट दे दी.

यूपी पुलिस के वकील से कोर्ट ने क्या पूछा?

याचिकाकर्ता ने बताया कि पहले बाइक पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी. लेकिन बाद में उसे 'अचानक' एक रजिस्ट्रेशन नंबर दे दिया गया. ये सभी आरोप सुनने के बाद बेंच ने यूपी पुलिस का पक्ष रख रहे वकील से सवाल पूछा,

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“(क्या) अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई? जब व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो आपने 'अंजान' क्यों लिखा? अगर मोटरसाइकिल सवार को मौके पर ही पकड़ लिया गया था तो आपने अज्ञात बाइक सवार के खिलाफ FIR क्यों दर्ज की? लोग पुलिस पर कैसे भरोसा करेंगे?”

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सुनवाई के दौरान बेंच ने पूछा,

"आप आरोपी को मौके पर ही पकड़ लेते हैं, लेकिन FIR में उसका नाम नहीं लिखना चाहते. शायद अगर सब कुछ ठीक रहा, तो आप नाम बदल सकते हैं. किसी और का नाम डाल सकते हैं. आपको अलग-अलग FIR में आरोपियों की लिस्ट रखनी चाहिए. जिस पर कम FIR हों उसका नाम शामिल कर सकते हैं. क्या वहां ऐसा ही होता है?"

पीठ ने कहा कि पकड़े गए संदिग्ध का नाम शुरुआती FIR में खाली छोड़ना, मामले की जानकारी में हेरफेर करना, कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर जनता के भरोसे को पूरी तरह खत्म कर देता है.

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की तरफ से दाखिल हलफनामे को भी संतोषजनक नहीं माना. बेंच ने मामले की अगली सुनवाई में संबंधित पुलिस अधिकारी को कोर्ट में मौजूद रहने के लिए कहा है. उन्हें ये भी बताने का निर्देश दिया गया कि आरोपी का नाम FIR में शामिल क्यों नहीं था. 

बता दें कि हलफनामे के पैरा 6 में बाइक चलाने वाले का नाम तुषार बताया गया है. 

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