सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के विवादित भाषण का पूरा अनुवाद मांगा है. कोर्ट ने कहा है कि उसे पूरे भाषण का असल अनुवाद चाहिए और यह AI का युग है, अनुवाद 98% सटीक होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 16 फरवरी को सोनम वांगचुक के हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.
'3 मिनट का भाषण, 8 मिनट का अनुवाद', सोनम वांगचुक मामले में SC ने लताड़ा, कहा- 'ये AI का युग है...'
Sonam Wangchuk Case SC Hearing: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोनम वांगचुक का मूल भाषण केवल 3 मिनट का है, लेकिन सरकार की तरफ से दिया गया अनुवाद 7-8 मिनट का है. अब कोर्ट ने सरकार से पूरा सटीक अनुवाद मांगा है.


कोर्ट ने मामले पर केंद्र सरकार की तरफ से पेश किए गए दस्तावेजों पर असंतोष जताया. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से कहा,
आपका अनुवाद 7 से 8 मिनट का है, जबकि मूल भाषण केवल 3 मिनट का है. हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के युग में हैं, जहां अनुवाद की सटीकता कम से कम 98 प्रतिशत होनी चाहिए. हमें वास्तविक भाषण का सही अनुवाद चाहिए. आपने जो टैबुलर लिस्ट दाखिल की है, उसमें दी गई कुछ बातें तो detention order में हैं ही नहीं. कम से कम वांगचुक ने जो कहा है, उसका सही ट्रांसक्रिप्ट होना चाहिए. उसमें कोई अंतर नहीं होना चाहिए. अगर भाषण 3 मिनट का है और आपका ट्रांसक्रिप्शन 7–8 मिनट तक चला जाता है, तो इसमें निश्चित रूप से दुर्भावना नजर आती है.
इससे पहले सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो की तरफ से कोर्ट में पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया था कि सरकार ने वांगचुक के नाम पर ऐसे शब्द जोड़े हैं जो उन्होंने कभी कहे ही नहीं. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ट्रांसक्रिप्शन एक विभाग ने किया है और हम इस काम में एक्सपर्ट नहीं हैं. जब अदालत ने सरकार से असल ट्रांसक्रिप्ट मांगा, तो इस पर सिब्बल ने कहा,
ये कोई नई या चौंकाने वाली बात नहीं है. मैं पहले ही ये सब कह चुका हूं, लेकिन उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया. अब उन्हें एक और मौका क्यों दिया जाए? हम तो वही दस्तावेज मान सकते हैं, जो उन्होंने कोर्ट के सामने पहले ही पेश किए हैं.
इस बीच सुनवाई के दौरान शेर-ओ-शायरी का भी दौर चला. सुनवाई के वक़्त कोर्ट ने एक शेर का ज़िक्र करते हुए कहा- हमने वो भी सुना जो उन्होंने कहा ही नहीं. इस पर कपिल सिब्बल ने जवाब देते हुए कहा- और जो हम कह रहे हैं, उन्होंने सुना ही नहीं. फिर अदालत ने कहा, ‘हम सुन रहे हैं न’. इस पर कपिल सिब्बल ने सहमति जताते हुए कहा, ‘इसीलिए तो हम यहां हैं’.
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने और भी कई आरोप सरकार पर लगाए. उन्होंने कहा,
कॉपी-पेस्ट जैसा है आदेश: सिब्बलसबसे जरूरी भाषण, जिसमें वांगचुक ने अनशन खत्म करने का ऐलान किया और अहिंसा की अपील की, वो Detaining Authority को दिया ही नहीं गया. ये सबसे नज़दीकी घटना थी. भाषण 24 सितंबर को दिया गया था और उन्हें 26 सितंबर को हिरासत में लिया गया. पदयात्रा के दौरान किसी भी हिंसक गतिविधि का आरोप नहीं लगाया गया. इन सारे तथ्यों का जवाब सरकार की तरफ से नहीं दिया गया है. Detaining Authority ने जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा किया, उनमें से कई वांगचुक से जुड़े ही नहीं हैं. सबूत के तौर पर जिन आठ वीडियो का हवाला दिया गया है, उनमें से चार वीडियो एक साल से भी पुराने हैं.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिरासत का आदेश 'कॉपी-पेस्ट' जैसा है और बिना ठीक से दिमाग लगाए तैयार किया गया है. इसके बाद कोर्ट ने सरकार को भाषण का पूरा अनुवाद जमा कराने का आदेश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी तक के लिए टाल दी. आपको याद दिलाते चलें कि सितंबर 2025 में लेह में लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के बाद वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था. इसके बाद उनकी पत्नी ने उनकी रिहाई के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की.
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सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से कहा था कि जेल में बिगड़ती सेहत को देखते हुए वांगचुक की हिरासत के फैसले पर दोबारा से विचार किया जाए. सरकार ने पिछले हफ्ते इस मामले में अपनी दलीलें पूरी कर ली थीं. 16 फरवरी को वांगचुक की पत्नी आंगमो के वकील ने जवाबी दलीलें पेश कीं.
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