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गांव में ईसाई पादरियों की एंट्री बैन, सुप्रीम कोर्ट में याचिका आई, खारिज हो गई

Supreme Court on Christion Missionaries: याचिकाकर्ता की तरफ से दलील दी गई कि ईसाई प्रार्थना के दौरान पादरियों पर कथित 700 हमलों का मामला CJI बेंच के पास लंबित है. यह भी आरोप लगाया गया कि ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को गांव में शव दफनाने की इजाजत नहीं है.

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ ईसाई मिशनरी ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल की थी. (PTI/ITG)

पिछले साल छ्त्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी गांवों में ईसाई पादरियों और कन्वर्टेड ईसाइयों की एंट्री बैन कर दी गई. ग्राम सभा ने गांव के बाहर ही इनकी एंट्री बंद करने के होर्डिंग लगा दिए. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ग्राम सभा के फैसले को बरकरार रखा था. कांकेर जिले के रहने वाले दिगबल टांडी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 16 फरवरी को सर्वोच्च अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज कर दी.

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याचिकाकर्ता की तरफ से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस पेश हुए. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनकी दलील का विरोध किया. दोनों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. 

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस नाथ ने कहा,

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"आपको नियमों के तहत सही अथॉरिटी से संपर्क करना चाहिए था... वे हलफनामे, मटेरियल और सबूतों के आधार पर मामले की जांच करते."

बीते साल छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एंट्री बैन करने वाले होर्डिंग को बरकरार रखा था और याचिकाकर्ता को अपनी बात संबंधित ग्राम सभा में रखने का आदेश दिया था. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कथित तौर पर 'लालच' या 'गलत तरीके' से धर्म परिवर्तन कराने पर बड़ी टिप्पणी की थी.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा था,

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"भारत के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में धर्म बदलना लंबे समय से एक सेंसिटिव मुद्दा रहा है. धर्म बदलने के अलग-अलग तरीकों में से ईसाई मिशनरियों द्वारा गरीब और अनपढ़ आदिवासी और ग्रामीण आबादी के बीच किए गए धर्म बदलने के तरीकों ने खास तौर पर विवाद खड़ा किया है. हालांकि, संविधान हर नागरिक को धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी देता है, लेकिन जबरदस्ती, लालच या धोखे से इस आजादी का गलत इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय बन गया है. बड़े पैमाने पर या जानबूझकर धर्म बदलने की घटना ना केवल सामाजिक मेलजोल को बिगाड़ती है बल्कि मूल समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को भी चुनौती देती है."

गोंसाल्वेस ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने ईसाई पादरियों और कन्वर्टेड ईसाइयों की एंट्री बैन करने वाले होर्डिंग को असंवैधानिक नहीं बताया. उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरी के कामकाज पर 'बिना ठोस सबूत' टिप्पणियां कीं.

सीनियर वकील गोंसाल्वेस ने यह भी कहा कि मामला सिर्फ होर्डिंग तक सीमित नहीं है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की बेंच के पास ईसाई प्रार्थना के दौरान पादरियों पर कथित 700 हमलों का मामला लंबित है.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को एक और मामले के बारे में बताया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को गांव में शव दफनाने की इजाजत नहीं है. उन्होंने एक तीसरी याचिका का भी जिक्र किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ईसाई धर्म अपनाने वालों के शवों को कब्र से निकालकर दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया.

यह भी पढ़ें- गांव में पादरियों और ईसाईयों की एंट्री रोकने का पोस्टर लगा, HC ने कहा- 'ये असंवैधानिक नहीं'

SG तुषार मेहता ने गोंसाल्वेस को कहा कि आप हाई कोर्ट में जो मुद्दा था, उससे अलग हटकर सुप्रीम कोर्ट में बातें कर रहे हैं. गोंसाल्वेस ने यह भी दावा किया कि छत्तीसगढ़ में पिछले 10 सालों में धर्म बदलने के किसी भी मामले में एक भी सजा नहीं हुई है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी.

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