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शिवराज चौहान ने नेहरू का नाम लेकर सिंधु जल संधि पर ऐसा दावा किया, वीडियो वायरल हो गया

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू ने सिंधु जल संधि करके देश के साथ 'अन्याय' किया था जबकि तब के जल विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया था.

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शिवराज सिंह चौहान ने सिंधु जल समझौते को ऐतिहासिक अन्याय बताया है. (तस्वीर-इंडिया टुडे)

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सिंधु जल समझौते को ‘ऐतिहासिक अन्याय’ बताया है. उन्होंने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ये डील करके उन्होंने भारत के साथ ‘अन्याय’ किया था. केंद्रीय मंत्री ने ये भी दावा किया कि उस वक्त के जल विशेषज्ञों के ‘विरोध के बावजूद’ सिंधु संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे. उन्होंने आगे कहा कि हमारे किसानों का पेट काटकर पाकिस्तान को पानी दिया जा रहा था. अब पीएम मोदी की सरकार ने इस ‘ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त किया’ है.

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दिल्ली स्थित पूसा भवन में सोमवार, 19 मई को किसानों के साथ संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा,

“सिंधु जल समझौते को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है. यह कोई साधारण घटना नहीं है. आज मैं अपने किसान भाइयों से कहना चाहता हूं कि हमारे देश के साथ कितना बड़ा अन्याय हुआ है. एक पुरानी कहावत है कि ‘लम्हो ने ख़ता की, सदियों ने सज़ा पाई'. ठीक यही हुआ हमारे साथ. जब यह सिंधु जल समझौता हुआ, उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी थे. मैं किसान नेताओं व सभी वक्ताओं को प्रणाम करता हूं कि उन्होंने बताया कि इस समझौते के तहत भारत ने 80% से ज़्यादा पानी पाकिस्तान को दे दिया."

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कृषि मंत्री ने आगे कहा, 

“जिन नदियों का उद्गम स्थल भारत में है, जो पहले भारत की जमीन पर बहती हैं. रावी, झेलम, सतलुज, सिंधु जैसी नदियां. पंजाब कभी पंचनद था. पांच नदियों वाला प्रदेश और आज सिर्फ डेढ़ नदी का पंजाब रह गया है. लेकिन केवल पानी ही नहीं दिया गया, उस समय भारत ने पाकिस्तान को पैसा भी दिया. 83 करोड़ रुपये. आज उस रकम की कीमत करीब 5500 करोड़ रुपये होती है. जिससे वे वहां नहरें, जल संरचनाएं बना सकें, वह पानी ले जा सकें. ये कैसी दरियादिली है. अपने देश के किसानों का पेट काट कर हम उनको पानी दे रहे हैं, जो आतंकियों को पैदा करने के लिए ज़िम्मेदार हैं.”

शिवराज सिंह चौहान ने आगे कहा कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 1960 में संसद में इस समझौते का विरोध किया था. उस दौरान उन्होंने कहा था कि ये समझौता नहीं होना चाहिए था.

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