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SC-ST कोटा आर्थिक आधार पर नहीं दे सकते... सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मांग का किया विरोध

केंद्र सरकार ने Supreme Court में रिजर्व कैटेगरी में आर्थिक आधार पर सब-कोटा देने का विरोध किया. सरकार के मुताबिक, आरक्षण का मुख्य आधार आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है. सरकार ने साफ़ कहा है कि कोर्ट सरकार को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता.

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इनकम के आधार पर आरक्षण नीति लागू करने की मांग करते प्रदर्शनकारी. (ANI)

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  • केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका का विरोध किया जिसमें SC, ST और OBC के भीतर इनकम के आधार पर सब-कोटा देने की मांग की गई थी, सरकार ने इसे सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन मानदंड से अलग बताया।
  • सरकार ने कहा कि आरक्षण नीति में बदलाव संसद और सरकार का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट इसे कानूनन बाध्य नहीं कर सकता, साथ ही संवैधानिक अनुच्छेद 341, 342 और 342A के तहत जाति आधारित पहचान तय है।
  • सरकार ने SC और ST वर्गों के लिए क्रीमी लेयर नियम लागू करने का विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट से याचिकाओं को खारिज करने की अपील की है, सुनवाई 18 अगस्त को प्रस्तावित है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका का विरोध किया है. इस याचिका में रिजर्व कैटेगरी में इनकम के आधार पर सब-कोटा देने की मांग की गई थी. सरकार का कहना है कि अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) के लिए आरक्षण का आधार 'सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन' है. इसे बदलकर सिर्फ 'आर्थिक आधार' नहीं किया जा सकता.

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, वकील अश्विनी उपाध्याय और कुछ संगठनों (जैसे समता आंदोलन समिति) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इसमें मांग की गई थी कि SC, ST और OBC वर्गों के अंदर भी इनकम के हिसाब से अलग से कोटा बना दिया जाए. यानी इन जातियों में जो ज्यादा गरीब हैं, उन्हें पहले आरक्षण मिले.

सरकार ने क्या कहा?

सरकार ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के जरिए कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दिया. सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कोर्ट के सामने दो मुख्य तर्क रखे हैं.

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- सरकार का कहना है कि देश की आरक्षण नीति में बदलाव करना या यह तय करना कि आरक्षण किसे और कैसे मिलेगा, यह काम संसद और सरकार का है. यह कोई कानूनी विवाद नहीं बल्कि ‘पॉलिसी’ का मामला है.

- सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 'रिट ऑफ मैंडमस' जारी करके सरकार को ऐसा करने पर मजबूर नहीं कर सकता कि वह आरक्षण नीति को नए सिरे से बदले. 

केंद्र सरकार का कहना है कि अनुच्छेद 341, 342 और 342A के तहत संवैधानिक व्यवस्था, SC, ST और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) की नोटिफाइड लिस्ट में बदलाव की इजाजत नहीं देती है. सरकार ने कहा कि SCs, STs और SEBCs की पहचान जाति, जनजाति और सामाजिक पिछड़ेपन जैसे ऐतिहासिक और सामाजिक क्राइटेरिया के आधार पर की गई है, न कि सिर्फ आर्थिक स्थिति के आधार पर.

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'SC-ST के लिए क्रीमी लेयर नहीं'

केंद्र सरकार ने SC और ST के लिए ‘क्रीमी लेयर’ का नियम लागू करने का भी विरोध किया. सरकार का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में यह नियम हमेशा सिर्फ 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) तक ही सीमित रखा गया है. 

हलफनामे में इंदिरा साहनी (1992), ईवी चिन्नैया (2005), एम नागराज (2006) और अशोक कुमार ठाकुर (2008) के फैसलों का हवाला दिया गया. इसमें कहा गया कि सिर्फ आर्थिक तरक्की के आधार पर किसी को बाहर करने से 'सामाजिक पिछड़ेपन' की वह मूल अवधारणा कमजोर हो जाएगी, जिस पर SC और ST के लिए आरक्षण की व्यवस्था टिकी है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से इन याचिकाओं को खारिज करने की अपील की है. इन मामलों की सुनवाई 18 अगस्त को होने की संभावना है.

वीडियो: "धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं मिल सकता", सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी

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