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गहरे समुद्र में खजाने की खोज! 'समुद्र मंथन' योजना बदलेगी पेट्रोलियम के लिए विदेशों पर भारत की निर्भरता?

Samudra Manthan Scheme: भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी तेल निर्भरता को कम करने के लिए लाई गई 84,000 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' योजना कई मायनों में अहम हो सकती है. जानकारों का मानना है कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में होने वाले इस डीप-वाटर एक्सप्लोरेशन का देश की अर्थव्यस्था पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है.

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'समुद्र मंथन' से पूरी होगी पेट्रोलियम की जरूरत? (फोटो- ONGC)

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  • केंद्र सरकार ने 'समुद्र मंथन' नामक योजना मंजूर की है, जिसमें 84,000 करोड़ रुपये निवेश कर समुद्र के भीतर तेल और गैस के विशाल भंडारों की खोज की जाएगी।
  • भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे विदेशी निर्भरता कम करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है।
  • इस योजना के सफल संचालन से घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, जिससे ऊर्जा आयात बिल में कमी और आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।

ये वो दौर है जब दुनिया की हर बड़ी महाशक्ति अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा फिक्रमंद है. भारत जैसे तेजी से बढ़ते विकासशील देश के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की जरूरतें हर गुजरते दिन के साथ आसमान छू रही हैं. ऐसे में केंद्र सरकार ने एक ऐसा मेगा प्लान मंजूर किया है, जो देश की तकदीर और तस्वीर दोनों को पूरी तरह से बदलने का दम रखता है.

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इस महत्वाकांक्षी योजना का नाम 'समुद्र मंथन' रखा गया है, जिसके जरिए भारत सरकार ने देश के अपतटीय यानी समुद्र के भीतर छिपे तेल और गैस के विशाल भंडारों को खंगालने का फैसला किया है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रोजेक्ट पर कुल 84,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम दांव लगाया गया है. इस योजना की गूंज देश के तमाम बड़े बिजनेस अखबारों और मुख्यधारा की मीडिया सुर्खियों में साफ सुनाई दे रही है.

'समुद्र मंथन' का ब्लू प्रिंट

अगर इस पूरी योजना की वित्तीय रूपरेखा और ब्लूप्रिंट को समझें, तो 84,000 करोड़ रुपये का ये निवेश सामान्य नहीं है. सरकार और देश की प्रमुख सरकारी तेल खोज कंपनियां मिलकर इस पूंजी को गहरे समुद्र में ड्रिलिंग और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर झोंक रही हैं. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के वो इलाके, जो अब तक अछूते रहे हैं या जहां खोजबीन के पर्याप्त संसाधन नहीं पहुंच पाए थे, उन्हें अब इस बजट के जरिए खंगाला जाएगा.

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‘एनर्जी वॉच’ के मुताबिक इसमें जियोलॉजिकल सर्वे, सिस्मिक डेटा जुटाने और अत्याधुनिक ड्रिलिंग शिप्स को तैनात करने का बड़ा काम किया जाना है. जानकारों का मानना है कि ये फंडिंग भारत के एनर्जी सेक्टर में अब तक के सबसे बड़े निवेशों में से एक है, जिससे आने वाले सालों में घरेलू उत्पादन को एक अभूतपूर्व रफ्तार मिलने की पूरी उम्मीद है.

क्यों पड़ी जरूरत?

ये जानना बेहद जरूरी है कि आखिर भारत को इस तरह के मेगा प्रोजेक्ट की इतनी बड़ी और तुरंत जरूरत क्यों आन पड़ी है. आंकड़े ये बताते हैं कि भारत अपनी कुल कच्चा तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है. यानी हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से दूसरे देशों और खासकर खाड़ी के मुल्कों पर निर्भर हैं. जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं, तो देश में पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ जाते हैं. इसका सीधा असर आम आदमी की जेब और देश के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है.

‘DW’ की रिपोर्ट के मुताबिक 'समुद्र मंथन' योजना के जरिए सरकार इसी विदेशी निर्भरता के आंकड़े को बड़े पैमाने पर घटाना चाहती है. अगर समंदर के भीतर छिपे ये भंडार उम्मीद के मुताबिक निकल आए, तो भारत का आयात बिल काफी हद तक कम हो सकता है.

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कितना मुश्किल है सागर में तेल की खोज

समंदर की गहराइयों से तेल और प्राकृतिक गैस निकालना लोहे के चने चबाने जैसा बेहद कठिन काम है. इसे डीप-वाटर एक्सप्लोरेशन कहा जाता है, जहां तकनीक और इंजीनियरिंग के स्तर पर भयंकर चुनौतियां सामने आती हैं. जमीन पर कुएं खोदना और हजारों फीट गहरे समुद्र के पानी के नीचे ड्रिलिंग करना दो बिल्कुल अलग दुनिया है.

‘द प्रिंट’ के मुताबिक पानी के भारी दबाव, भयानक अंधेरे और तूफानी मौसम के बीच काम करने के लिए अत्यधिक उन्नत तकनीक और स्पेशल रिग्स की जरूरत होती है. एक छोटी सी तकनीकी चूक या गलती करोड़ों रुपये के नुकसान के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है. यही वजह है कि इस प्रोजेक्ट में देश की महारत्न कंपनियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर की दिग्गज तकनीकी कंपनियों की मदद लेने पर भी जोर दिया जा रहा है.

'समुद्र मंथन' और अर्थव्यवस्था पर असर

इस पूरी कवायद का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि ये देश की अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति यानी जियो-पॉलिटिक्स पर भी गहरा असर डालेगा. जब देश के भीतर ही तेल और गैस का बंपर उत्पादन शुरू होगा, तो विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी. इस बचाए गए पैसे को देश के बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास कार्यों में लगाया जा सकेगा.

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इसके अलावा, ग्लोबल मंच पर भारत की स्थिति और ज्यादा मजबूत होगी क्योंकि ऊर्जा के मोर्चे पर आत्मनिर्भर देश के हाथ में कूटनीति के कई और नए पत्ते आ जाते हैं. 'समुद्र मंथन' योजना सिर्फ तेल निकालने का जरिया भर नहीं है, बल्कि ये भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में उठाया गया एक बहुत ही दूरदर्शी और ठोस कदम है. 

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