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'आरक्षण हटाओ आंदोलन' वालों को पीएम मोदी, राहुल गांधी की ये बातें पसंद नहीं आएंगी

सोशल मीडिया से तेजी से उभरे ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के इंस्टाग्राम पेज के करीब 59 लाख फॉलोअर्स हो चुके हैं और यह अब सड़क पर भी उतर चुका है. लेकिन आरक्षण को लेकर मोदी सरकार और राहुल गांधी की स्पष्ट नीतियों के बीच इस आंदोलन के लिए राजनीतिक समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा.

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आरक्षण पर मोदी और राहुल गांधी दोनों की नीतियां स्पष्ट हैं. (फोटो- India today)

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  • आरक्षण हटाओ आंदोलन ने सोशल मीडिया पर हजारों समर्थक जुटा लिए हैं और महाराष्ट्र के नागपुर में जमीनी विरोध प्रदर्शन भी किया है, जो जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ है और तार्किक समाधान चाहता है।
  • जनवरी 2026 में UGC के नियम जो कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए थे, जनरल कैटेगरी के छात्रों के विरोध के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी, जिससे आंदोलन को नया जोर मिला।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक रूप से आरक्षण को बरकरार रखने का आश्वासन दिया है, जबकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 50 प्रतिशत सीमा हटाकर आरक्षण विस्तार की बात कही है, जिससे आंदोलन का राजनीतिक समर्थन असमंजस में है।

‘पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर. जाति-जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर.’ रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी से ली गई ये पंक्तियां ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के इंस्टाग्राम पेज पर सबसे ऊपर टंकी हैं. हालांकि ये पेज आरक्षण विरोधी अभियान का हरकारा है.

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यह कॉकरोच जनता पार्टी की तर्ज पर सोशल मीडिया पर उगे आरक्षण विरोधी आंदोलन का सबसे पहला पेज है, जिस पर एकाएक बाढ़ की तरह समर्थक आए. महज कुछ फॉलोअर्स से शुरू होकर इस अभियान का समर्थन करने वाले अकाउंट्स की संख्या 59 लाख के आसपास पहुंच गई.

यह पेज जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ आवाज उठा रहा है और चाहता है कि इस मुद्दे पर कोई ‘तार्किक’ समाधान निकले. सोशल मीडिया की आभासी जमीन पर शुरू RHA ने बीते दिनों महाराष्ट्र के नागपुर में अपना पहला जमीनी विरोध प्रदर्शन भी किया. लेकिन सवाल है कि क्या इस आंदोलन के मुद्दे को किसी ऐसी पार्टी से राजनीतिक समर्थन मिलेगा, जिसके पास कानून बदलने या ऐसा करने की शक्ति में असर पैदा करने की ताकत हो? मसलन, सरकार नहीं भी तो क्या आंदोलन इस मुद्दे पर विपक्ष को अपने पाले में खींच पाएगा. जैसा कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को मिला. 

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इसका सवाल का जवाब खोजेंगे. लेकिन सबसे पहले जानते हैं कि इस आंदोलन की वैचारिक जमीन क्या है? किस ताप से सोशल मीडिया पर ये गर्मागर्म बवंडर उठा और एक झटके में लाखों को लोगों को अपने पाले में खींच ले गया.

2026 की जुलाई का महीना. दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक के मुद्दे पर जोरदार प्रदर्शन चल रहा था. बार-बार पेपर लीक से परेशान युवाओं ने केंद्र सरकार की तकरीबन गर्दन ही पकड़ ली थी. लिहाजा, 25 जुलाई को ताकतवर सरकार के बड़े मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ. सोशल मीडिया पर पैदा हुई कॉकरोच जनता पार्टी की ये पहली और सबसे बड़ी जीत मानी गई. इसी जीत ने ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ को उम्मीद की पहली किरण थमाई. 

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आरक्षण हटाओ आंदोलन का इंस्टा पेज.

इस आंदोलन का समर्थन करने वाले लोगों ने पेपर लीक, बेरोजगारी और नौकरियों के घटते मौकों को भारत की आरक्षण व्यवस्था से भी जोड़ना शुरू कर दिया. उनका तर्क था कि बार-बार होने वाली परीक्षा में गड़बड़ियों की वजह से जनरल कैटेगरी की सीटों के लिए पहले से ज्यादा कड़ा कंपटीशन हो गया है.

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लोगों ने दावा किया कि NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले ज्यादातर उम्मीदवार जनरल कैटेगरी से थे. उनका तर्क था कि आरक्षण व्यवस्था की वजह से ही जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए परीक्षा और ज्यादा मुश्किल हो गई है. लिहाजा, असफल होने पर वो आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं. 

लेकिन ये जो कुछ हो रहा था, वो सब यहीं से शुरू नहीं हुआ था. इसकी जड़ में जाने के लिए कुछ महीने और पीछे जाना होगा. जनवरी 2026 में. 

UGC विवाद ने दी हवा

UGC ने हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूट्स में समानता और भेदभाव रोकने के लिए ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ जारी किए थे. इनमें कॉलेज और यूनिवर्सिटी में इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी. मकसद था- कैंपस में जातिगत भेदभाव को रोकना.

UGC के इन नए नियमों का उन छात्रों ने स्वागत किया, जो जनरल कैटेगरी से नहीं आते थे. लेकिन जनरल कैटेगरी के छात्र नए नियमों के विरोध में सड़क पर उतर आए. विरोध करने वाले लोगों का कहना था कि इन नियमों में SC, ST और OBC छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव पर तो खास ध्यान दिया गया है, लेकिन जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए वैसी सुरक्षा नहीं है. आरोप लगा कि नियमों की कई बातें साफ नहीं हैं और एकतरफा हैं. लिहाजा, उनका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है.

विवाद बढ़ा. लोग UGC मुख्यालय तक पहुंच गए. धीरे-धीरे इसका असर दूसरे राज्यों के कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस में भी दिखाई देने लगा. सरकार ऐसे लोगों को नियमों के समर्थन में लाने में नाकाम रही. मामला पहुंच गया सुप्रीम कोर्ट. फिर जनवरी 2026 में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इन नियमों पर रोक लगा दी. कोर्ट ने कहा कि नियमों के कई प्रावधान पहली नजर में ‘अस्पष्ट’ लगते हैं और उनका गलत इस्तेमाल किए जाने की आशंका है. वही बात, जो विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग कह रहे थे. 

यानी नियम लागू होने से पहले ही वापस ले लिए गए. लेकिन, इस विवाद ने जातिगत आरक्षण की पुरानी बहस को एक बार फिर से राजनीतिक रूप से जिंदा कर दिया. 

UGC विवाद के शांत होने के बाद NEET पेपर लीक से फिर से सड़क पर प्रदर्शनकारियों का जुटान हुआ. इस आंदोलन के बहाने बोतल का ये जिन्न फिर बाहर आया और इस बार सोशल मीडिया पर ज्यादा संगठित रूप से आंदोलनकारियों की एकजुटता दिखी.

आरक्षण हटाओ आंदोलन को किसका सपोर्ट?

NEET पेपर लीक तो सारे देश के हर वर्ग के छात्रों से जुड़ा मुद्दा था. इस आंदोलन में समाज के हर वर्ग ने अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगाया. कांग्रेस, सपा, आम आदमी पार्टी समेत तमाम राजनीतिक पार्टियों ने भी इसमें भागीदारी की. लेकिन क्या आरक्षण हटाओ आंदोलन को इनमें से किसी का समर्थन मिलेगा? ये बड़ा सवाल है. उससे भी बड़ा सवाल कि इसको लेकर सरकार क्या सोचती है?

आरक्षण पर पीएम मोदी की मंशा क्या है?

याद कीजिए 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा का विवादित बयान देकर बीजेपी को फंसा दिया था. लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने ये मुद्दा लपककर ऐसा साबित करने की कोशिश की कि बीजेपी और आरएसएस मिलकर आरक्षण को खत्म कर देंगे. नतीजा, चुनाव में बीजेपी को ऐसा झटका लगा कि अगले कई सालों तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम मंत्रियों को आरक्षण के प्रति अपनी निष्ठा को जोर देकर और साफ अक्षरों में बार-बार साबित करनी पड़ी है.

2016 के बाद आरक्षण को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के बयानों को देख लेंगे तो ये प्रतिबद्धता साफ समझ आएगी.

मार्च 2016 में पीएम मोदी ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि आरक्षण एक अधिकार है, जिसे कोई छीन नहीं सकता. उन्होंने कहा कि जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे, तब यह अभियान चलाया गया था कि आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा. लेकिन वह दो बार प्रधानमंत्री रहे और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. बीजेपी ने मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा में कई सालों तक सरकार चलाई है, लेकिन आरक्षण व्यवस्था को कभी नुकसान नहीं पहुंचा. इसके बावजूद अफवाहें फैलाई जा रही हैं.

पीएम मोदी ने तो ये तक कह दिया कि अब ‘अगर खुद बाबासाहेब आंबेडकर भी सामने आकर कहें, तब भी आरक्षण नहीं छीना जा सकता.’

मई 2024 में पीएम मोदी ने दो बार आरक्षण को लेकर बयान दिया. हरियाणा के भिवानी में उन्होंने कहा, “जब तक मोदी जीवित है, कोई भी दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नहीं छीन सकता.” उन्होंने इस आश्वासन को राजनीतिक भाषण से अलग ‘मोदी की गारंटी’ बताया. 

पीएम मोदी के भाषणों से साफ जाहिर है कि उनकी सरकार आने वाले समय में आरक्षण को हाथ भी नहीं लगाने वाली है.

राहुल गांधी के क्या विचार?

आरक्षण बचाओ आंदोलन वालों के पास इसके बाद विकल्प बचता है अगली सरकार का. यानी एक ऐसा सीनैरियो जिसमें विपक्ष के लोग अगर सरकार में आ जाएं तो क्या उनकी मांगों पर विचार होगा? 

यहां तो उन्हें ज्यादा निराशा हाथ लगेगी. लोकसभा में इस समय विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है. कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ही विपक्ष से प्रधानमंत्री होने के सबसे बड़े दावेदार हैं. ऐसे में अगर ये आंदोलन अगली सरकार यानी राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की प्रतीक्षा करे तो इस मुद्दे पर क्या प्रगति हो सकेगी?

इसको समझने के लिए हम राहुल गांधी के आरक्षण पर दिए भाषणों को जान लें. सबकुछ साफ हो जाएगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो आरक्षण को बरकरार रखने भर की बातें करते हैं. लेकिन राहुल गांधी तो एक कदम आगे हैं. उन्होंने तो 50 फीसदी के आरक्षण के दायरे को दीवार की तरह तोड़ देने की बातें कही हैं. 

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सितंबर 2024 की बात है. अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से राहुल गांधी का एक बयान आया. हल्ला हुआ कि राहुल गांधी ने भारत में आरक्षण खत्म करने की बात कह दी है. राहुल ने यहां एक बयान दिया था, जिसमें कहा था कि ‘जब भारत जातिगत तौर पर एक निष्पक्ष जगह बन जाएगा. तब हम आरक्षण खत्म करने के बारे में सोचेंगे. और अभी भारत एक निष्पक्ष जगह नहीं है.’ बीजेपी ने उनके इस बयान को ऐसे फैलाया, जैसे वो भारत से आरक्षण खत्म करने की बात कह रहे हैं.

अगले ही दिन राहुल को इससे होने वाले नुकसान का अंदाजा हो गया. उन्होंने तत्काल अपनी बात पर सफाई दी. बोले कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया कि वो आरक्षण के खिलाफ हैं, लेकिन वो साफ कर रहे हैं कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं बल्कि आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से भी आगे ले जाएंगे. 

इसके बाद राहुल गांधी की आरक्षण को लेकर भाषा एकदम स्पष्ट हो गई. अप्रैल 2025 में अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने तीन ऐतिहासिक संकल्प लिए. उनमें से पहला था, राष्ट्रीय कानून लाकर आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा खत्म करेंगे. दूसरा, SC/ST सब-प्लान को कानूनी रूप देंगे. तीसरा, निजी शिक्षण संस्थानों में SC/ST/OBC आरक्षण लागू करवाएंगे.

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राहुल गांधी का ट्वीट

सितंबर 2025 में बिहार चुनाव से पहले 10-सूत्रीय संकल्प जारी करते हुए राहुल गांधी ने फिर कहा कि आरक्षण की 50% सीमा बढ़ाई जाएगी. इसके साथ ही प्राइवेट कॉलेजों में आरक्षण लागू होगा और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में 50 फीसदी का आरक्षण दिया जाएगा.

इन सबके अलावा, मई 2024 में रतलाम रैली में भी राहुल ने कहा कि वह आरक्षण 50 फीसदी से ऊपर बढ़ाएंगे. कोर्ट की लगाई 50% की सीमा हटा देंगे और दलित, आदिवासी, पिछड़ों और गरीबों को जितना आरक्षण चाहिए उतना देंगे. इतना ही नहीं, अप्रैल 2025 में पटना में राहुल ने अपने संसद के भाषण के बारे में बताया और कहा, 

मैंने संसद में मोदी जी से कहा. अगर आप आरक्षण की 50 फीसदी की दीवार नहीं गिराएंगे तो हम उसे तोड़कर फेंक देंगे.

तो कुल मिलाकर ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की राह आसान नहीं है. सरकार से मांगें मनवाना तो छोड़िए. इस आंदोलन को विपक्ष का समर्थन भी मिलना मुश्किल है.

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