जून की चिलचिलाती गर्मी और बच्चों की छुट्टियां बस खत्म होने ही वाली है. ऐसे जिन लोगों ने अब तक दादा-दादी या नाना-नानी के घर की ट्रिप नहीं मारी, उनके लिए ये आखिरी मौका है. मगर मौके का फायदा तो तब उठाएं ना जब ट्रेन की टिकट कंफर्म हो जाए. क्योंकि कंफर्म टिकट की मारा मारी का असर रेलवे स्टेशनों पर साफ दिख रहा है. IRCTC के सर्वर पर इस वक्त जबरदस्त 'समर रश' है.
आपकी कंफर्म ट्रेन टिकट पर डाका डालने वाले HO और इमरजेंसी कोटा क्या होता है?
Indian Railways: गर्मी की छुट्टियों में अगर आपकी ट्रेन टिकट वेटिंग में है, तो कंफर्म होने के कितने चांस हैं? रेलवे के HO और इमरजेंसी कोटे का खेल क्या है, जिसके चलते आपकी वेटिंग लिस्ट ना नंबर सुधरने का नाम नहीं लेता.


लाखों रेलयात्री अपनी वेटिंग लिस्ट (Waiting List) टिकट को कन्फर्म होने की उम्मीद में बार-बार PNR स्टेटस चेक कर रहे होते हैं. ट्रेन के चार्ट बनने का समय करीब आते ही धड़कनें तेज हो जाती हैं कि 'सीट मिलेगी या नहीं?'
लेकिन-किन्तु-परन्तु बंधू क्या आपको मालू है कि इंडियन रेलवे के पास एक सीक्रेट निंजा टेक्निक (एल्गोरिदम) है जो ये तय करती है कि कौन सी सीट किसको मिलेगी और किसे नहीं?
PNR का कोड और वेटिंग का जाल
सबसे पहले समझते हैं आपके टिकट पर छे PNR (Passenger Name Record) नंबर को. इसके 10 डिजिट महज एक नंबर भर नहीं हैं. यहां हर नंबर कुछ कहता है. शुरू के 3 डिजिट बताते हैं कि टिकट किस जोन (Zone) से बुक हुआ है. बाकी के 7 डिजिट पैसेंजर का डेटा रखते हैं.
अब बात करते हैं वेटिंग लिस्ट की. आपकी टिकट पर ये दो तरीके से लिखा मिलता है. ज्यादातर मुसाफिर GNWL (General Waiting List) और RLWL (Remote Location Waiting List) को लेकर कन्फ्यूज रहते हैं.
GNWL: ये ट्रेन के शुरुआती स्टेशन या बड़े स्टेशंस के लिए होती है. इसकी कन्फर्म होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है.
RLWL: ये ट्रेन के बीच के महत्वपूर्ण स्टेशंस के लिए होती है. यहां सीटें कम होती हैं, इसलिए इसका कन्फर्म होना थोड़ा मुश्किल होता है.
इन्हीं के साथ या फिर यूं कह लें कि कंफर्म और वेटिंग के बीच एक नाम आता है, RAC (Reservation Against Cancellation) का. इसका मतलब है कि आपको बैठने के लिए सीट तो मिल गई है, लेकिन सोने के लिए पूरी बर्थ नहीं मिलेगी. अब जैसे ही कोई कन्फर्म टिकट वाला यात्री अपना टिकट कैंसिल करता है, RAC वाले को बर्थ मिल जाती है.
क्या है हेड ऑफिस और इमरजेंसी कोटा?
बहुत से लोग पूछते हैं कि चार्ट बनने के आखिरी समय पर वेटिंग लिस्ट वाले अचानक गायब कैसे हो जाते हैं और बर्थ किसी और को कैसे मिल जाती है? यहीं पर आता है 'कोटा' का खेल. ये भी आमतौर पर दो तरह का होता है.
1. HO Quota (Headquarters Quota): ये रेलवे का सबसे पावरफुल कोटा है. रेलवे के बड़े-बड़े अफसर लोगों और वीवीआई टाइप यात्रियों के लिए ये रिजर्व होता है. मतलब इस कैटेगरी में आने वाला वीआईपी इस कोटे का इस्तेमाल करके अपनी टिकट कंफर्म करवाता है.
2. Emergency Quota (EQ): इसे 'तत्काल वीआईपी कोटा' भी कहा जा सकता है. इसके तहत उन वीआईपी या वीवीआईपी यात्रियों के रिजर्व बर्थ दी जाती है, जिनकी यात्रा का प्लान ऐन वक्त पर बनता है. इस कोटे के तहत सांसद, विधायक या फिर कोई शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों की सिफारिश पर सीटें दी जाती हैं.
जब ट्रेन का चार्ट तैयार होता है, तो रेलवे का कंप्यूटर सिस्टम सबसे पहले इन कोटा की सीटों को ब्लॉक करता है. अगर ये सीटें खाली रह जाती हैं, तभी ये वेटिंग लिस्ट वाले सामान्य यात्रियों को अलॉट की जाती हैं. यही वजह है कि चार्ट बनने के बाद भी अक्सर वेटिंग लिस्ट में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है.
एल्गोरिदम कैसे काम करता है?
रेलवे का जो 'सीक्रेट एल्गोरिदम' है, वो सिर्फ वेटिंग लिस्ट को नहीं देखता, बल्कि गंतव्य यानी डेस्टिनेशन को भी देखता है. अगर कोई यात्री लंबी दूरी (Long Distance) की यात्रा कर रहा होता है, तो सिस्टम उसे प्राथमिकता देने की कोशिश करता है क्योंकि लंबी दूरी की टिकटें रेलवे को ज्यादा रेवेन्यू देती हैं.
प्रो टिप: अगर आपकी टिकट GNWL में है और वेटिंग कम है, तो उम्मीद रखिए. लेकिन अगर आप RLWL में हैं और चार्ट बनने में सिर्फ 2-3 घंटे बाकी हैं, तो अपनी यात्रा का कोई विकल्प जरूर तलाश लें.
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