राह के रोड़े खुद ब खुद कैसे हटते हैं इसकी बानगी दिल्ली में 8 जून को हुई इंडिया ब्लॉक (I.N.D.I.A.) की बैठक में साफ देखने को मिली. जिस गठबंधन में कभी नीतीश कुमार तो कभी ममता बनर्जी के समर्थक उन्हें बतौर नेता पेश करते रहे हो. जहां राहुल गांधी की अगुवाई में एक जुट होने को कई दल तैयार ना हो रहे हों. वहां बतौर नेता राहुल की राह खुद ब खुद आसान होती चली जा रही है.
इंडिया ब्लॉक से नीतीश बाहर, ममता-केजरीवाल दरकिनार! क्या राहुल गांधी के अच्छे दिन आ गए?
I.N.D.I.A. Block Meeting: 8 जून 2026 को हो रही इंडिया ब्लॉक की बैठक के बीच Rahul Gandhi के सियासी जीवन के सबसे अच्छे दिन शुरू होते दिख रहे हैं. कभी Nitish Kumar, Mamata Banerjee और Arvind Kejriwal जैसे दिग्गजों की वजह से उनकी राह में जो रोड़े थे, अब वो पूरी तरह साफ हो चुके हैं.


मोदी सरकार के सामने संसद से लेकर सड़क तक मोर्चा खोलने की रणनीति तो अपनी जगह है, पर इस बैठक सबसे बड़ा आउटकम यही है कि राहुल गांधी के सियासी जीवन के शायद सबसे अच्छे दिन शुरू हो चुके हैं.
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार संजय कौशिक की मानें तो मोदी सरकार से टकराने से पहले राहुल के सामने एक और बहुत बड़ी दीवार थी. वो दीवार थी- विपक्ष का निर्विवाद और इकलौता नेता बनने की चुनौती. लल्लनटॉप से बात करते हुए संजय कहते हैं,
इंडिया गठबंधन की बैठक से जो इनपुट और तस्वीरें आ रही हैं, उन्हें गौर से देखने पर एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि राहुल गांधी अब उस चुनौती को पार कर चुके हैं, जिसमें उन्हें इंडिया ब्लॉक के अंदर ही अपनी काबिलियत साबित करनी थी.
संजय कौशिक का मानना है कि पूरे इंडिया ब्लॉक में राहुल की लोकप्रियता इस वक्त सातवें आसमान पर है.
ऐसे में सवाल उठता है कि जहां राहुल के नाम पर सभी दलों का एकमत होना टेढ़ी खीर लग रहा था, वहां ये करिश्मा जैसे हो गया. आखिर ऐसा भी क्या हो गया कि राहुल गांधी तमाम रोड़ों को पार कर विपक्ष के 'इकलौते बॉस' बनकर उभरे हैं.
जब राह में खड़े थे क्षेत्रीय दिग्गजों के 'स्पीड ब्रेकर'
याद करिए वो दौर जब इंडिया गठबंधन की नींव रखी जा रही थी. उस वक्त राहुल गांधी के लिए राह इतनी आसान नहीं थी. गठबंधन के भीतर ही कई ऐसे कद्दावर और अनुभवी क्षेत्रीय क्षत्रप मौजूद थे, जो राहुल के नेतृत्व को आसानी से स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं थे.
इस लिस्ट में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे जैसे दिग्गज शामिल थे. इनमें से कोई खुद को पीएम पद का दावेदार मानता था, तो किसी की सीनियरिटी राहुल से कहीं ज्यादा थी. हर बैठक में एक कशमकश दिखती थी कि आखिर गठबंधन का मुख्य चेहरा कौन होगा? राहुल गांधी को इन सभी नेताओं के बीच अपनी जगह बनाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही थी.
कैसे साफ हो गया राहुल का रास्ता?
सियासत की शतरंज पर मोहरों ने ऐसी जगह बदली कि राहुल गांधी के रास्ते से सारी बाधाएं खुद ब खुद दूर हट गई. वरिष्ठ पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ कहते हैं,
राजनीतिक मजबूरी हो या फिर सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों का दबाव या फिर पार्टियों की अंदरूनी कलह… वजह चाहे जो भी रही हो, मगर सच तो ये है कि राहुल का विरोध करने वाले क्षेत्रीय दलों के सूरमा, अपने-अपने सूबों तक ही सिमटते चले गए.
गिरिजेश के ऐसा बोलने के पीछे वजह भी है. इंडिया गठबंधन के ‘को-फाउंडर’ और जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार तो पाला बदलकर अलग ही राह पकड़ चुके हैं. जबकि जिन ममता बनर्जी को इंडिया ब्लॉक के नेता के तौरपर प्रोजेक्ट करने की कोशिश हो रही थी. वो पश्चिम बंगाल चुनाव हारने और अपनी पार्टी के टूट के बाद अपना और टीएमसी का अस्तित्व बचाने की लड़ाई में ही उलझीं हुई हैं.
रही बात आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और शिवसेना (UTB) के उद्धव ठाकरे की तो वो दोनों भी अपनी-अपनी घरेलू राजनीतिक लड़ाईयों में बुरी तरह उलझे हुए हैं. बाकी बचे शरद पवार और लालू प्रसाद यादव तो उनकी उम्र और सेहत अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भाग-दौड़ की इजाजत नहीं देती.
इन सबका नतीजा ये हुआ कि इंडिया ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी के लिए मैदान पूरी तरह खाली हो गया. आज की तारीख में राहुल गांधी इकलौते ऐसे विपक्षी नेता बचे हैं, जो सीधे मोदी सरकार की आंखों में आंखें डालकर खुलकर सामना कर रहे हैं.
राहुल बिना किसी झिझक के अपनी मनमर्जी के मुद्दे उठा रहे हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं और सरकार को बैकफुट पर लाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं.
रामचंद्र गुहा की वो टिप्पणी और आज का सच
राहुल गांधी के इस बदलते सियासी ग्राफ को समझने के लिए इतिहासकार रामचंद्र गुहा के बयानों को याद करना जरूरी है. एक दौर था जब गुहा समेत कई बुद्धिजीवी राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर बड़े सवाल उठाते थे. उन्हें 'पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन' तक कहा जाता था. गुहा ने कभी टिप्पणी की थी कि
भारत को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है, लेकिन राहुल शायद वो चेहरा नहीं बन पा रहे.
मगर आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. राहुल गांधी की लगातार मेहनत, भारत जोड़ो यात्राओं और संसद के भीतर उनके आक्रामक तेवरों ने उन आलोचकों के मुंह भी बंद कर दिए हैं. तमाम राजनीतिक विश्लेषक ये मानने को मजबूर हैं कि राहुल अब पहले वाले नेता नहीं रहे. उनमें एक परिपक्वता आई है और येी वजह है कि आज की इंडिया ब्लॉक की बैठक में बाकी सारे दलों के नेता उनके पीछे खड़े दिखाई दे रहे हैं.
8 जून की दिल्ली बैठक से एक बात तो साफ है कि राहुल गांधी ने कम से कम इंडिया ब्लॉक के अंदर की सियासी जंग में तो फतेह हासिल कर ही ली है. बैठक की मिनट ऑफ मीटिंग पर नजर डाले तो पता चलता है कि अब 'इंडिया' ब्लॉक में राहुल के कद को चुनौती देने वाला कोई दूसरा सूरमा नहीं बचा.
संकेत साफ है कि अबकी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार का सामना करते हुए राहुल को अपना घर संभालने की चिंता नहीं होगी. दूसरे शब्दों में कहें तो संसद को अगले सत्र में राहुल जब राशन-पानी लेकर सरकार पर चढ़ाई कर रहे होंगे तो बीजेपी भी जान रही होगी कि उसका सामना विपक्ष ने निर्विवाद नेता से हैं.
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