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PM-KISAN की किस्त तो आ गई, लेकिन ई-केवाईसी के चक्कर में लाखों किसानों का पैसा कहां अटका है?

PM-KISAN: पीएम-किसान सम्मान निधि की नई किस्त तो जारी हो गई. मगर लाखों किसानों का पैसा अटक गया. ये सब कुछ हुआ है कृषि मंत्रालय की नई गाइडलाइन के बाद, जिसके मुताबिक बिना E-KYC, लैंड वेरिफिकेशन और आधार डीबीटी लिंकिंग के खाते में पैसा नहीं आएगा. जानिए घर बैठे मोबाइल से 2 मिनट में ई-केवाईसी पूरा करने का सबसे आसान तरीका ताकि बुआई के इस सीजन में आपका पैसा न फंसे.

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बिना ई-केवाईसी नहीं आएगा पीएम-किसान का पैसा (फोटो- पीटीआई)

उत्तर भारत में इस समय सूरज ऐसा पगलाया है कि पूछिए मत. सीधे खोपड़ी पर तेजाब उड़ेल रहा है. जून का पहला हफ्ता आ चुका है. देश का किसान अपनी खरीफ फसलों की बुआई के लिए खेतों में पसीना बहा रहा है. इस समय किसान को बीज और खाद के लिए सबसे ज्यादा पैसे की दरकार होती है. सरकार ने किसान सम्मान निधि की किस्त जारी करने का ऐलान तो कर दिया. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.

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गजब है भाई! सोचिए, सरकार की तरफ से बेनेफिशियरी लिस्ट और पेंडिंग स्टेटस को लेकर एकदम नई गाइडलाइन जारी कर दी गई है. कागजों में तो पैसा ट्रांसफर हो रहा है. लेकिन हकीकत ये है कि देश के लाखों किसानों के खातों में इस बार कुछ नहीं आया है. बोले तो उन्हें फूटी कौड़ी तक नहीं मिली. पात्रता की सभी नियम और शर्तें पूरी करनेे के बाद भी लाखों अन्नदाता इस समय सरकारी सिस्टम के अजीबोगरीब लूपहोल में फंसकर रह गए हैं.

अब सवाल उठता है, आखिर ऐसा क्या पेंच फंस गया है कि हकदार होने के बाद भी किसानों का पैसा बीच में ही अटक गया है? सरकार ने इस बार नियमों को इतना सख्त क्यों कर दिया है? अच्छे-खासे चालू खाते अचानक से ब्लॉक लिस्ट में क्यों चले गए हैं? आज के इस एक्सप्लेनर में हम इस पूरे मामले का एक-एक पुर्जा अलग करके समझाएंगे. आखिर गलती कहां हो रही है और कैसे आप मोबाइल से घर बैठे सिर्फ 2 मिनट में इस आफत से छुटकारा पा सकते हैं. आइए, इसका पूरा कच्चा चिट्ठा खोलते हैं.

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तीन सरकारी चक्रव्यूहों में फंसा है किसानों का पैसा

हम तो कह रहे हैं कि इस बार सरकार ने नियमों की ऐसी तिकड़ी बनाई है कि आम किसान का सिर चकरा गया है. अगर आपके खाते में भी इस बार पैसा नहीं टपका है, तो मानकर चलिए कि आपका मामला इन्हीं तीन वजहों में से किसी एक जगह पर अटका पड़ा है.

पहला चक्रव्यूह है ई-केवाईसी का न होना: सरकार ने साफ कह दिया है कि जब तक आपकी पहचान का डिजिटल वेरिफिकेशन नहीं होगा, तब तक पैसा रिलीज नहीं किया जाएगा. लाखों किसान ऐसे हैं जिन्होंने फॉर्म तो भर दिया था. लेकिन उनका बायोमेट्रिक या ओटीपी वाला वेरिफिकेशन अधूरा रह गया.

दूसरा बड़ा पेंच है लैंड वेरिफिकेशन यानी जमीन का सत्यापन: सरकार अब पटवारियों और रेवेन्यू रिकॉर्ड के जरिए ये चेक करवा रही है कि जिस जमीन के नाम पर पैसा लिया जा रहा है, वो असल में उस किसान के नाम पर दर्ज है भी या नहीं. इस कागजी वेरिफिकेशन की सुस्त रफ्तार के कारण लाखों लोगों का स्टेटस पेंडिंग में चला गया है.

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तीसरा और आखिरी पेंच है बैंक खाते का आधार से लिंक न होना और डीबीटी इनेबल न होना: कई बार किसानों का आधार तो लिंक होता है. लेकिन बैंक के नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के सर्वर पर वो एक्टिव नहीं होता. नतीजा ये होता है कि सरकार वहां से बटन दबाती है. लेकिन पैसा आपके खाते का रास्ता भूल जाता है.

मोबाइल से घर बैठे 2 मिनट में ई-केवाईसी करने का एकदम सीधा तरीका

अक्सर लोग इस छोटे से काम के लिए सीएससी (CAC) सेंटरों के चक्कर काटते हैं और पैसे बर्बाद करते हैं. हम तो कह रहे हैं कि अगर आपका मोबाइल नंबर आपके आधार से जुड़ा है, तो आप खुद अपने स्मार्टफोन से ये काम चुटकियों में कर सकते हैं. इसका पूरा तरीका एकदम आसान शब्दों में समझ लीजिए.

सबसे पहले अपने मोबाइल के ब्राउज़र में पीएम-किसान की आधिकारिक वेबसाइट खोलिए. वहां होमपेज पर ही आपको फार्मर्स कॉर्नर का एक बड़ा सा बॉक्स दिखाई देगा. इस कॉर्नर में सबसे ऊपर ई-केवाईसी का ऑप्शन चमक रहा होगा, बस उसी पर सीधे क्लिक कर दीजिए.

E KYC
E KYC के लिए होम पेज (फोटो- पीएम किसान वेबसाइट)

अब जो नया पेज खुलेगा, वहां आपसे आपका आधार नंबर मांगा जाएगा. अपना नंबर डालिए और सर्च के बटन पर क्लिक कर दीजिए. इसके बाद आपके आधार से जो मोबाइल नंबर लिंक है, उस पर एक वन-टाइम पासवर्ड यानी ओटीपी आएगा. उस ओटीपी को बॉक्स में भरिए और सबमिट कर दीजिए.

E KYC
E KYC की प्रक्रिया

जैसे ही आप सबमिट करेंगे, स्क्रीन पर ई-केवाईसी सक्सेसफुली सबमिटेड लिखा हुआ आ जाएगा. बस समझिए कि आपका काम हो गया और सिस्टम से आपका ब्लॉक हटा दिया गया. अगर वहां सक्सेसफुली की जगह कुछ और लिखा आता है, तो समझ लीजिए कि आपको नजदीकी ग्राहक सेवा केंद्र पर जाना पड़ेगा. वहां अंगूठा लगाकर बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन कराना ही एकमात्र रास्ता है.

तकनीकी भूल या सरकारी सिस्टम की बेरुखी

अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे तीखे और नीतिगत एंगल पर. जब जून के इस महीने में किसान को पैसे की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब सरकार ने अचानक नियमों का डंडा चला दिया है. कृषि मंत्रालय के हालिया अपडेट को देखें तो पता चलता है कि देश में एक बहुत बड़ी आबादी सिर्फ इसलिए परेशान है क्योंकि सरकारी पोर्टल का सर्वर ऐन वक्त पर बैठ जाता है.

ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की रफ्तार वैसे ही निल बटा सन्नाटा रहती है. ऐसे में गरीब और बुजुर्ग किसानों से ये उम्मीद करना कि वो हर बार इंटरनेट कैफे के चक्कर काटेंगे, प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है. कई जगहों पर तो पटवारियों की लापरवाही की वजह से लैंड वेरिफिकेशन का डेटा महीनों तक पोर्टल पर अपलोड ही नहीं होता. किसान अपने घर से सही है. लेकिन सरकारी फाइलों की सुस्ती की सजा उसे अपनी जेब से भुगतनी पड़ रही है.

ये हमारी व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है. एक तरफ हम डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीटते हैं, और दूसरी तरफ उसी डिजिटल सिस्टम के छोटे-छोटे लूपहोल्स की वजह से असली हकदार परेशान घूमता है. सरकार को चाहिए कि ऐसी सख्त गाइडलाइन जारी करने से पहले गांवों में विशेष कैंप लगाए जाएं. बुआई के इस जरूरी समय में किसी भी किसान का पैसा तकनीकी दिक्कतों के कारण नहीं अटकना चाहिए. वक्त आ गया है कि इस पूरी व्यवस्था को किसान-फ्रेंडली बनाया जाए, न कि उसे सिर्फ कागजी नियमों के मकड़जाल में उलझाकर छोड़ दिया जाए.

वीडियो: पीएम किसान सम्मान निधि में करोड़ों का घोटाला कैसे हो गया?

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