एक दौर था कि कांग्रेस पार्टी और देरी से फैसले लेने को करीब-करीब पर्यायवाची माना जाता था. नब्बे के दशक में तो यहां तक कहा जाता था कि किसी पद के चार दावेदार हों तो आलाकमान तब तक फैसला नहीं लेगा, जब तक चार में से तीन खुद ही रेस से ना हट जाएं. पीवी नरसिम्हाराव हों या सीताराम केसरी, अहमद पटेल का दौर हो या सोनिया गांधी बड़े फैसले को महीनों तक ठंडे बस्ते में डालना या कमेटियों के भरोसे छोड़ देना ही पुरानी कांग्रेस की पहचान थी.
'रुको और देखो' की नीति छोड़' ऑन द स्पॉट' फैसले लेने लगी है कांग्रेस? जानिए ‘अंदर की कहानी’
Congress Political Strategy: तमिलनाडु से लेकर कर्नाटक तक, कांग्रेस ने जिस तेजी से बड़े राजनीतिक फैसले लिए हैं, उसने सबको चौंका दिया है. जानिए पार्टी के इस बदले हुए डिसीजन मेकिंग कल्चर की पूरी इनसाइड स्टोरी.


यहां तक की मल्लिकार्जुन खरगे के आने से भी हालात कुछ बहुत ज्यादा नहीं बदले. ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर हिमंता बिस्वा सरमा तक, न जाने कितने दिग्गज नेता सिर्फ इसलिए पार्टी छोड़ गए क्योंकि दिल्ली दरबार के पास उनकी बात सुनने और फैसला लेने का वक्त नहीं था. लेकिन 2026 में कांग्रेस रंग-ढंग बदले-बदले नजर आ रहे हैं. सुस्ती गायब और फैसले गजब की फुर्ती के साथ लिए जा रहे हैं.
पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें आईं, उन्हें देखते हुए ये साफ है कि कांग्रेस के अंदर फैसले लेने की प्रक्रिया अब पूरी तरह बदल चुकी है. अब वहां हफ्तों तक चलने वाली मैराथन मीटिंग नहीं होतीं, बल्कि बड़े से बड़ा फैसला भी ऑन द स्पॉट ले लिया जाता है. राजनीतिक विश्लेषक संजीव कौशिक भी इस बात से सहमति जताते हैं. लल्लनटॉप से बात करते हुए उन्होंने कहा कि,
चाहे तमिलनाडु में डीएमके जैसी पुरानी सहयोगी पार्टी को झटका देकर विजय की टीवीके का हाथ थामना हो, या फिर कर्नाटक में सिर्फ एक दिन की मीटिंग बुलाकर सिद्दारमैया जैसे कद्दावर नेता की जगह डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप देना हो. कांग्रेस अब 'रुको और देखो' की नीति छोड़कर 'अभी नहीं तो कभी नहीं' के मोड में आ चुकी है.
पार्टी के भीतर आया ये बदलाव महज कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदलने या फिर नए गठबंधन बनाने तक ही सीमित नहीं है. यह कांग्रेस की उस नई सोच का हिस्सा है, जिसके तहत वो आने वाले विधानसभा चुनावों और देश की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहती है.
आखिर क्या है कांग्रेस का यह नया डिसीजन मेकिंग मॉडल? इन फैसलों के पीछे आखिर किसका दिमाग चल रहा है. और सबसे बड़ा सवाल कि क्या फैसलों की यह ताबड़तोड़ रफ्तार उत्तर भारत के उन राज्यों में भी दिखेगी, जहां कांग्रेस का सीधा मुकाबला बीजेपी से है?
तमिलनाडु से कर्नाटक तक, इन तीन फैसलों ने सबको चौंकाया
कांग्रेस की बदली हुई रफ्तार तीन फैसलों से साफ नजर आती है. सबसे पहला और बड़ा उलटफेर देखने को मिला तमिलनाडु में देखने को मिला. कई सालों से कांग्रेस वहां द्रमुक यानी डीएमके की जूनियर पार्टनर के तौर पर राजनीति कर रही थी. गठबंधन में सीटें कम मिलती थीं, लेकिन पार्टी चुपचाप मान लेती थी.
मगर इस बार कांग्रेस आलाकमान ने अपनी इस छवि को तोड़ दिया. अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम यानी टीवीके के उभार को देखते हुए कांग्रेस ने डीएमके को दोटूक सुनाया और टीवीके के साथ नया समीकरण बनाने में देर नहीं लगाई. ये फैसला साफ दिखाता है कि कांग्रेस अब बैसाखी के सहारे चलने के बजाय अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना चाहती है.
दूसरा चौंकाने वाला फैसला केरल से आया. केरल में कांग्रेस के भीतर सालों से केसी वेणुगोपाल और वीडी सतीशन के बीच अंदरूनी खींचतान चल रही थी. अमूमन ऐसी स्थिति में हाईकमान किसी सीनियर नेता को आगे करके मामला शांत कराता था. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. पार्टी ने केसी वेणुगोपाल जैसे कद्दावर चेहरे के बजाय जमीन पर पकड़ रखने वाले वीडी सतीशन पर भरोसा जताया और उन्हें राज्य की कमान सौंपते हुए मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना दिया.
तीसरा और सबसे आक्रामक फैसला कर्नाटक में देखने को मिला. कर्नाटक में सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार के बीच का विवाद किसी से छिपा नहीं था. पुरानी वाली कांग्रेस होती तो इस मामले को महीनों खींचती, दोनों गुटों को दिल्ली बुलाकर बातचीत की जाती. लेकिन इस बार कांग्रेस ने सिर्फ एक दिन की हाईप्रोफाइल मीटिंग बुलाई. सिद्दारमैया को स्थिति समझाई गई और बिना किसी ड्रामे के डीके शिवकुमार को सत्ता की चाबी सौंप दी गई. यह फैसला इतनी तेजी से हुआ कि विरोधियों को रणनीति बनाने का मौका तक नहीं मिला.
हिमंता और ज्योतिरादित्य से हाईकमान ने क्या सीखा?
कांग्रेस के इस बदले हुए तेवर के पीछे वो कड़वी यादें हैं, जिन्होंने पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया है. 2015 में असम के कद्दावर नेता हिमंता बिस्वा सरमा दिल्ली में राहुल गांधी से मिलने आए थे. कहा जाता है कि उस वक्त उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया. नतीजा यह हुआ कि हिमंता ने बीजेपी का दामन थाम लिया. आज वो पूरे नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी के सबसे बड़े संकटमोचक बन चुके हैं.
ऐसा ही कुछ साल 2020 में मध्य प्रदेश में हुआ, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराजगी को समय पर दूर नहीं किया गया और कांग्रेस के हाथ से बनी बनाई सरकार निकल गई. मध्य प्रदेश कांग्रेस पर करीब नजर रखने वाले सीनियर जर्नलिस्ट अश्विनी कुमार कहते हैं,
2014 से 2024 के बीच कांग्रेस के लगभग 35 फीसदी बड़े नेता सिर्फ इसलिए पार्टी छोड़कर चले गए क्योंकि उनकी समस्याओं पर दिल्ली दरबार समय पर फैसला नहीं ले पाया. शायद इसी वजह से राहुल और खरगे की जोड़ी को अपनी स्ट्रैटेजी में बदलाव लाने के लिए मजबूर होना पड़ा.
खरगे और राहुल का नया पावर ग्रिड
कांग्रेस के इस नए डिसीजन मेकिंग कल्चर के पीछे दो स्तंभ हैं. एक तरफ मल्लिकार्जुन खरगे का सांगठनिक अनुभव है. वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी की नई और बेबाक सोच है. खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद से राज्यों के प्रभारियों की जवाबदेही तय कर दी गई है. पहले राज्यों के नेता सीधे 10 जनपथ के चक्कर काटते थे. मगर अब उन्हें पहले राज्य के प्रभारी और फिर कांग्रेस अध्यक्ष के सामने अपनी बात रखनी होती है.
इस नए मॉडल में फैसलों की प्रक्रिया को तीन चरणों में बांट दिया गया है,
- सबसे पहले राज्यों से आने वाली रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया जाता है.
- इसके बाद पार्टी कार्यकर्ता ग्राउंड जीरो पर जाकर लोगों का मूड भांपते हैं.
- आखिर में खरगे और राहुल गांधी की कोर टीम तय करती है कि फैसले से पार्टी को लंबे समय में फायदा होगा या नुकसान.
इस नई व्यवस्था के आने के बाद परफॉर्म करने वाले नेताओं को तवज्जो मिलने लगी है.
उत्तर भारत में क्या होगा?
साउथ में अपनी इस नई रणनीति का सफल प्रयोग करने के बाद अब कांग्रेस का अगला टारगेट उत्तर भारत के राज्य हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला बीजेपी से है. इन राज्यों में भी लंबे समय से गुटबाजी पार्टी का सिरदर्द रही है. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट का विवाद हो या मध्य प्रदेश में नए चेहरों को आगे बढ़ाने की चुनौती, कांग्रेस इन मुद्दों पर क्या रुख अपनाती है, ये देखना दिलचस्प होगा.
आने वाले दिनों में उत्तर भारत के सांगठनिक ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. पार्टी के सूत्रों का कहना है कि उत्तर भारत के लिए भी एक 'वन-डे डिसीजन फॉर्मूला' तैयार किया गया है. इसके तहत चुनावी राज्यों में टिकटों का बंटवारा चुनाव से 6 महीने पहले ही कर दिया जाएगा, ताकि उम्मीदवारों को प्रचार का पूरा मौका मिले.
कयास लगाया जा रहा है कि खराब प्रदर्शन वाले प्रदेश अध्यक्षों हटाने में आलाकमान किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं दिखाने वाला.
नई सोच का नफा-नुकसान
राजनीति में हर बड़े फैसले के दो पहलू होते हैं. कांग्रेस की इस नई और ताबड़तोड़ अप्रोच के भी अपने नफा-नुकसान हैं, जिनका असर आने वाले समय में देश की राजनीति पर पड़ना तय है.
अब जरा एक नजर कांग्रेस की इस ताबड़तोड़ फैसला लेने की नीति के लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म फायदे-नुकसान पर भी डाल लेते हैं.
Note: AI की मदद से तैयार ग्राफिक
कांग्रेस का नया अवतार परमानेंट या सिर्फ एक फेज?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस का यह नया रूप स्थायी है या यह सिर्फ चुनावी सीजन का एक तात्कालिक फेज है. राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह बदलाव कांग्रेस की मजबूरी भी है और जरूरत भी. आज के दौर की राजनीति बहुत तेज हो चुकी है. सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों के इस दौर में आप फैसलों को लटका कर नहीं रख सकते.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस को 2029 की लड़ाई के लिए खुद को तैयार करना है, तो उसे अपनी इस डिसीजन मेकिंग स्पीड को बनाए रखना होगा.
वीडियो: तमिल नाडु में विजय की TVK से कांग्रेस का गठबंधन, भड़की DMK



















