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'देवता नाराज, अगर तुम्हारा बना खाया', 4 महीने से आंगनबाड़ी में कोई बच्चे नहीं भेजता, क्योंकि कुक दलित है

शर्मिष्ठा सेठी अपने समुदाय में ग्रेजुएशन की डिग्री पाने वाली पहली लड़की हैं. लेकिन अब वो पूरे गांव के बहिष्कार का सामना कर रही हैं, क्योंकि उन्होंने जिस नौकरी को चुनने का ‘साहस’ किया, वह है स्थानीय आंगनवाड़ी केंद्र में कुक की नौकरी. और शर्मिष्ठा दलित समुदाय से आती हैं.

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दलित महिला कुक की नियुक्ति पर ग्रामीणों ने बच्चों के आंगनवाड़ी केंद्र जाने पर लगाई रोक. (फोटो: ANI)

होना तो यह चाहिए था कि हम शर्मिष्ठा सेठी की उपलब्धियों का जश्न मनाते. अपने समुदाय में ग्रेजुएशन की डिग्री पाने वाली वो पहली छात्रा हैं और अपने गांव में सरकारी नौकरी पाने वाली कुछ गिनी-चुनी लड़कियों में से एक. लेकिन ‘जातीय गौरव’ का दंभ ही ऐसा है कि नज़रें जाति से ऊपर उठकर कुछ देख ही नहीं पातीं. पिछले चार महीनों से शर्मिष्ठा सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रही हैं, क्योंकि उन्होंने जिस नौकरी को चुनने का ‘साहस’ किया, वह है स्थानीय आंगनवाड़ी केंद्र में कुक की नौकरी. और शर्मिष्ठा दलित समुदाय से आती हैं.

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इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े आनंद मोहन जे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूरा मामला ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के नौगांव का है. यहां के एक आंगनबाड़ी केंद्र पर 21 साल की शर्मिष्ठा सेठी को कुक के तौर पर नियुक्त किया गया था. शर्मिष्ठा दलित समुदाय से आती हैं. इसी वजह से ग्रामीणों ने उनकी नियुक्ति का विरोध शुरू कर दिया. आरोप है कि उन्होंने अपने बच्चों के आंगनबाड़ी में जाने तक से रोक लगा दी. 

शनिवार, 14 फरवरी को जिला प्रशासन के अधिकारियों और राज्य महिला आयोग की एक सदस्य ने नौगांव का दौरा किया और ग्रामीणों से वादा लिया कि सोमवार से अपने बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र भेजेंगे. हालांकि, इससे पहले भी अधिकारियों ने इस बहिष्कार को खत्म करने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

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शर्मिष्ठा आंखों में आंसू लिए याद करती है कि कैसे ऊंची जाति के 50-60 ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया था, जिस दिन अधिकारी गांव में उनकी नौकरी का कन्फर्मेशन लेटर चिपकाने आए थे. शर्मिष्ठा कहती हैं,

यह नवंबर के दूसरे हफ्ते की बात है. गांव वालों ने मुझे और मेरे पिता को बुलाया और मुझसे पूछा कि मैंने नौकरी के लिए आवेदन क्यों किया, जबकि मैं अनुसूचित जाति समुदाय से हूं. उन्होंने कहा कि अगर उनके बच्चे मेरे हाथ का बना खाना खाएंगे तो उन्हें देवताओं के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा. मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, यहां तक ​​कि उनके सामने रो भी पड़ी, लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी.

20 नवंबर को जब उन्होंने आधिकारिक तौर पर कुक के रूप में काम शुरू किया था, तब से आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों की मौजूदगी लगभग जीरो हो गई. यहां तक ​​कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों के माता-पिता और स्तनपान कराने वाली माताएं, जो केंद्र से राशन घर ले जाने की हकदार हैं, उन्होंने भी आना बंद कर दिया.

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शर्मिष्ठा हर दिन आंगनवाड़ी जाती हैं. उन्हें उम्मीद है कि नियम से काम करने पर एक रोज़ गांव वाले मान जाएंगे. सुबह 7 बजे, वे साइकिल से स्कूल पहुंचती हैं. वहां ज़मीन साफ करती हैं, बच्चों के लिए चटाई बिछाती हैं और इंतज़ार करती हैं. शर्मिष्ठा कहती हैं,

मैंने कहा कि अगर मेरे हाथ का खाना नहीं चाहिए, तो कम से कम राशन घर ले जाएं. लेकिन उन्होंने यह भी मना कर दिया. मुझे अपने लिए नहीं, अपने परिवार के लिए ज़्यादा दुख है. हम अपने ही गांव में अजनबी बन गए हैं. मेरे माता-पिता और 86 साल की दादी बहुत मानसिक तकलीफ़ में हैं.

विडंबना यह है कि इस आंगनवाड़ी नौकरी के लिए गांव से शर्मिष्ठा अकेली लड़की थीं, जिन्होंने आवेदन किया था. इस नौकरी में 5,000 रुपये महीना सैलरी है और 12वीं पास होना ज़रूरी है. शर्मिष्ठा पूरी तरह योग्य हैं. वे इस पैसे से परिवार की मदद करना चाहती हैं और आगे चलकर टीचर बनना चाहती हैं. शर्मिष्ठा के पिता चैतन्य एक एकड़ से भी कम ज़मीन पर खेती करते हैं और दूसरों के खेतों में मजदूरी भी करते हैं. शर्मिष्ठा की मां मिनाती कहती हैं,

मेरी बेटी पढ़ी-लिखी है. जब उसे योग्यता से नौकरी मिली है, तो उसके साथ भेदभाव क्यों?

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नौगांव में जाति का बंटवारा साफ दिखता है. गांव में घुसते ही सात दलित परिवारों के घर हैं. थोड़ी दूरी पर करीब 90 ऊंची जाति के परिवार रहते हैं. गांव के कुलमणि राउत कहते हैं,

गांव वालों ने तय किया है कि बच्चे आंगनवाड़ी नहीं जाएंगे. हम बच्चों को भेजना चाहते हैं, लेकिन लोग कहते हैं कि वे शर्मिष्ठा के हाथ का खाना नहीं खाएंगे.

केंद्रपाड़ा के सब-कलेक्टर अरुण कुमार नायक ने बताया कि भरोसा बनाने के लिए अधिकारी खुद शर्मिष्ठा के बनाए खाने को खाएंगे. अगर बहिष्कार नहीं रुका, तो कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी. 

लेकिन शर्मिष्ठा ज़्यादा उम्मीद नहीं रखतीं. पहले भी चेतावनी दी गई थी कि बहिष्कार जारी रहा तो सरकारी सुविधाएं बंद हो सकती हैं, फिर भी कुछ नहीं बदला. अब कुछ दलित नेता और स्थानीय नेता भी शर्मिष्ठा के समर्थन में आ रहे हैं. फिर भी शर्मिष्ठा कहती हैं, “हम इस मामले को अदालत तक नहीं ले जाएंगे. आखिर यह हमारे गांव का मामला है.”

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