NCERT की 8वीं क्लास की नई किताब आई है. न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार का जिक्र के साथ. जिसके चलते हो रहा है विवाद. सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं. यानी एक बार फिर से कार्यपालिका और न्यायिक हलकों के बीच टकराव की स्थिति बनती दिख रही है.
NCERT की किताब में 'जजों के भ्रष्टाचार' के बारे में पढ़ाएगी मोदी सरकार, सिब्बल ने उल्टा सवाल पूछ लिया!
Corruption In Judiciary: NCERT की क्लास 8 की किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' के सेक्शन में बताया गया है कि जज 'कोड ऑफ कंडक्ट' से बंधे हैं, जो ना केवल कोर्ट बल्कि उसके बाहर भी उनके आचरण को तय करता है.


NCERT की जिस किताब पर विवाद हो रहा है, वो 23 फरवरी को रिलीज हुई. ये 8वीं क्लास की सोशल साइंस की नई किताब है. इसी में 'करप्शन इन दी ज्यूडिशियरी' यानी 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' का चैप्टर जोड़ा गया है. सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने इसे लेकर सरकार पर तंज कसा. लिखा-
"NCERT की क्लास 8 की किताब. इसमें एक सेक्शन है: ज्यूडिशियरी में करप्शन! मंत्री, लोक सेवक (सरकारी अधिकारी), इन्वेस्टिगेशन एजेंसी समेत नेताओं के बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के मामलों का क्या! सरकारें उन्हें क्यों दबा देती हैं!"

इसी किताब में एक और चैप्टर है. 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' के नाम से. लिखा गया है कि अदालतों में ढेर सारे मामले पेंडिंग रहते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे कई वजह भी बताई गई हैं. मसलन- जजों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रिया और खराब इन्फ्रास्ट्रक्चर. किताब में दावा किया गया कि इन वजहों से देश की न्यायिक प्रक्रिया चुनौतियां का सामना कर रही है.
'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' के सेक्शन में बताया गया है कि जज 'कोड ऑफ कंडक्ट' से बंधे हैं, जो ना केवल कोर्ट बल्कि उसके बाहर भी उनके आचरण को तय करता है. इसमें न्यायपालिका के अंदरूनी तरीकों के बारे में भी बताया गया कि न्यायपालिका 'सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवेंस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम' (CPGRAMS) के जरिए शिकायतों को प्राप्त करती है. 2021 से 2017 के बीच 1,600 से ज्यादा शिकायतें मिली थीं.

NCERT की पुरानी किताब में केवल न्यायपालिका के रोल के बारे में बताया गया था. इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कोर्ट का स्ट्रक्चर, लोगों की उन तक पहुंच आदि के बारे में बताया गया था. इसमें भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं था. हालांकि, उसमें एक पैराग्राफ जरूर था, जो कोर्ट में सालों तक सुनवाई की वजह से आम आदमी की न्याय तक पहुंच को प्रभावित करने पर बात करता था.
उसमें लिखा था, "कोर्ट को लगने वाले इस लंबे समय को बताने के लिए अक्सर 'जस्टिस डिले इज जस्टिस डिनाइड' कहावत का इस्तेमाल किया जाता है." माने, 'देर से मिला न्याय, न्याय से वंचित होना है.'
नई किताब में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या भी बताई गई है. इसके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में करीब 81000, हाई कोर्ट में करीब 62,40,000 और डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट में लगभग 4,70,00,000 केस पेंडिंग हैं.
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