तिहाड़ जेल की चारदीवारी से शुरू हुआ एक नेटवर्क, आज टोरंटो की सड़कों पर खून बहा रहा है. दाऊद इब्राहिम ने नब्बे के दशक में मुंबई से बैठकर दुबई तक अपना जो साम्राज्य फैलाया था, उसे 'डी-कंपनी' कहा गया. आज 35 साल बाद 2026 में भारत के सामने एक नया और उससे भी ज्यादा खतरनाक चैलेंज खड़ा है - 'बिश्नोई सिंडिकेट'. ये भारत का पहला ऐसा 'मल्टीनेशनल सिंडिकेट' बन चुका है, जिसका लीडर जेल में है, लेकिन उसके शूटर और हैंडलर सात समंदर पार बैठकर एक कॉर्पोरेट कंपनी की तरह वारदातों को अंजाम दे रहे हैं.
लॉरेंस बिश्नोई बना नया दाऊद? तिहाड़ से टोरंटो तक महा-एक्शन के बाद क्या सुधरेंगे भारत-कनाडा रिश्ते?
Bishnoi Gang Global Crackdown: लॉरेंस बिश्नोई गैंग के ग्लोबल नेटवर्क पर अब तक का सबसे बड़ा इंटरनेशनल क्रैकडाउन हुआ है. अमेरिकी FBI और कनाडाई पुलिस ने इस गैंग के 24 गुर्गों को गिरफ्तार किया है. आखिर साबरमती जेल बंद इस डॉन के रिमोट कॉर्पोरेट मॉडल ने कैसे दाऊद इब्राहिम की 'डी कंपनी' को भी पीछे छोड़ दिया?


अब इस सिंडिकेट पर एक बहुत बड़ा ग्लोबल क्रैकडाउन हुआ है. भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के इनपुट्स पर विदेशी एजेंसियों (जिसमें अमेरिकी FBI और कनाडाई पुलिस शामिल हैं) ने मिलकर एक बड़ा एक्शन लिया है. विदेश में बैठकर हत्याओं की साजिश रचने और उगाही करने के आरोप में बिश्नोई गैंग के 24 गुर्गों को दबोचा गया है.
लॉरेंस बिश्नोई का ये नेटवर्क आखिर काम कैसे करता है? क्या इस साझा ऑपरेशन से भारत और कनाडा के कड़वे रिश्तों में जमी बर्फ पिघलेगी? आखिर ये खेला क्या है, अगले कुछ मिनटों में इसी गुणा-भाग को समझने की कोशिश करते हैं.
डी-कंपनी बनाम बिश्नोई सिंडिकेट: बदल गया है अंडरवर्ल्ड का मॉडल
अंडरवर्ल्ड का तरीका अब पूरी तरह बदल चुका है. दाऊद इब्राहिम का मॉडल 'फिजिकल प्रेजेंस' और एक सेंट्रलाइज्ड कमांड पर चलता था. यानी भाई दुबई या कराची में बैठता था, वहां से फोन पर हुक्म आता था, और मुंबई में उसके शूटर काम करते थे. पैसे का लेन-देन कैश या ट्रेडिशनल हवाला नेटवर्क से होता था.
लेकिन लॉरेंस बिश्नोई का मॉडल 'इंटरनेट-आधारित रिमोट मॉडल' है. सीनियर क्राइम जर्नलिस्ट नेहा खान कहती हैं कि बिश्नोई का मॉड्यूल पूरी तरह से डीसेंट्रलाइज्ड (विकेंद्रीकृत) है. लल्लनटॉप से बात करते हुए नेहा बताती हैं,
लॉरेंस खुद भारत की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक साबरमती जेल में बंद है, लेकिन उसका नेटवर्क डार्क वेब, सिग्नल ऐप और थ्रीमा (Threema) जैसे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर चल रहा है.
शुरुआत से ही देखें तो इस गैंग का कोई एक तय ठिकाना नहीं रहा है. गोल्डी बराड़ कनाडा या अमेरिका में होता था, तो रोहित गोदारा किसी और देश में, और अनमोल बिश्नोई कहीं और से कमान संभाल रहा होता था.
गैंग का कॉर्पोरेट स्टाइल स्ट्रक्चर: दिलचस्प बात ये है कि बिश्नोई गैंग किसी टेक स्टार्टअप की तरह काम करता है. मुंबई में लंबे समय तक काम कर चुके और अब कनाडा के ब्रैम्पटन में बस चुके पत्रकार विकास श्रीवास्तव ने ‘बिश्नोई सिंडिकेट’ पर बहुत काम किया है. लल्लनटॉप से फोन पर बात करते हुए विकास बताते हैं.
‘बिश्नोई गैंग’ में अलग-अलग 'डिपार्टमेंट्स' हैं. एक टीम का काम सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए नए लड़कों को भर्ती करना है. जबकि दूसरी टीम का काम लॉजिस्टिक्स (हथियार और ठिकाने) संभालना है, तीसरी टीम टारगेट तय करती है, और चौथी टीम काम को अंजाम देेने वाले शूटर्स की होती है.
विकास बताते हैं कि एक्जिक्यूशन करने वाले शूटर को आखिरी वक्त तक ये नहीं पता होता कि वो किसके इशारे पर और किस पर गोली चलाने जा रहे हैं.

द अनटोल्ड रूट मैप: पंजाब के खेतों से कनाडा के गैंगवॉर तक
इस सिंडिकेट का रिक्रूटमेंट मॉडल बेहद शातिर है. ये किसी सीधे-साधे लड़के को अपराधी बनाने का एक सोची-समझी साजिश है.
सोशल मीडिया और ग्लैमर: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के गांवों के युवाओं को इंस्टाग्राम रील्स, हथियारों के प्रदर्शन और 'गैंगस्टर कल्ट' के जरिए आकर्षित किया जाता है. उन्हें एक फर्जी 'रॉबिनहुड' वाली इमेज दिखाई जाती है.
लोकल टास्क: शुरुआत में इन लड़कों को छोटे-मोटे काम दिए जाते हैं, जैसे किसी के घर पर सिर्फ डराने के लिए हवाई फायरिंग करना या रेकी करना. इसके बदले उन्हें मोटी रकम और सुरक्षा का वादा मिलता है.
द एस्केप रूट (फर्जी पासपोर्ट): जैसे ही लड़का पुलिस की नजर में आता है, गैंग के बड़े हैंडलर्स एक्टिव हो जाते हैं. उनका फर्जी नाम से पासपोर्ट बनवाया जाता है. इसके बाद उन्हें पुर्तगाल, अज़रबैजान, तुर्की या साइप्रस जैसे देशों में भेज दिया जाता है.
द फाइनल डेस्टिनेशन: इन देशों से 'डोंकी रूट' (अवैध रास्ता) या स्टूडेंट वीजा के जुगाड़ के जरिए उन्हें कनाडा या अमेरिका पहुंचा दिया जाता है. वहां पहुंचते ही वो सीधे गोल्डी बराड़ या रोहित गोदारा के स्लीपर सेल का हिस्सा बन जाते हैं.
भारत-कनाडा डिप्लोमेसी: क्या अब पिघलेगी कूटनीतिक बर्फ?
पिछले कुछ समय से भारत और कनाडा के रिश्ते बेहद निचले स्तर पर पहुंच गए थे. कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर कनाडाई धरती पर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के आरोप लगाए थे, जिसे भारत ने पूरी तरह खारिज कर दिया था. भारत का हमेशा से ये स्टैंड रहा है कि कनाडा अपनी जमीन पर पनप रहे 'खालिस्तानी और गैंगस्टर' गठजोड़ पर एक्शन नहीं ले रहा है.
लेकिन अब, बिश्नोई गैंग के 24 गुर्गों की इस ग्लोबल गिरफ्तारी ने सीन बदल दिया है. ये एक्शन दिखाता है कि पर्दे के पीछे 'फाइव-आइज' (Five Eyes - अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का खुफिया गठबंधन) देश अब भारत द्वारा दिए गए सबूतों और दावों को गंभीरता से ले रहे हैं.
जब कनाडाई पुलिस और अमेरिकी FBI ने भारतीय खुफिया इनपुट्स के आधार पर अपने यहां छापेमारी की, तो ये साफ हो गया कि ये गैंग सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि उनके अपने देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा सिरदर्द बन चुका है. ये क्रैकडाउन भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक बातचीत का रास्ता फिर से खोल सकता है, क्योंकि दोनों देशों को अब समझ आ गया है कि इस सांझे दुश्मन से अकेले नहीं लड़ा जा सकता.
सोशल मीडिया और यूथ ब्रेनवाश: रील से रीयल क्राइम तक
इस पूरे सिंडिकेट का सबसे खतरनाक और भारत के पॉइंट ऑफ व्यू से चिंताजनक पहलू है इसका युवाओं पर असर. आज का डिजिटल दौर इस गैंग के लिए सबसे बड़ा वरदान साबित हुआ है. यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर ऐसे सैकड़ों अकाउंट्स हैं जो इन गैंगस्टर्स के नाम पर फैन पेज चलाते हैं. वहां हथियारों के साथ पंजाबी गानों को मिक्स करके ऐसी रील्स बनाई जाती हैं, जो कम उम्र के बच्चों के दिमाग पर सीधा असर डालती हैं.
युवाओं को लगता है कि ये एक शॉर्टकट है- पैसा, नाम और पावर कमाने का. लेकिन हकीकत ये है कि इस दलदल में उतरने वाले 90 फीसदी लड़कों का अंजाम या तो पुलिस एनकाउंटर होता है या फिर विरोधी गैंग की गोली. टोरंटो और वैंकूवर में हो रहे हालिया गैंगवॉर इस बात का सबूत हैं कि विदेशी धरती पर भी ये लड़के सिर्फ मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं.
इस ग्लोबल क्रैकडाउन ने बिश्नोई गैंग की रीढ़ की हड्डी पर चोट तो की है, लेकिन जब तक इंटरनेट पर फैले इस डिजिटल नेटवर्क और युवाओं के इस ब्रेनवाश को नहीं रोका जाता, तब तक इस 'मल्टीनेशनल सिंडिकेट' को पूरी तरह खत्म करना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा.
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