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61 साल का साधु भिक्षा लेने आया, मां को पता चला 46 साल पहले छोड़कर गया बेटा था

परिवार को पहले तो उम्मीद थी कि एक दिन बुद्धि बल्लभ लौटेंगे, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी वापसी की उम्मीद भी कम होती गई. अब इतने दशकों बाद वही बेटा साधु के वेश में अचानक गांव लौटा. ये खबर सुनकर परिवार समेत वहां मौजूद सभी लोग भावुक हो गए.

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सांकेतिक फोटो- Adobe stock

नंदी देवी के लिए ये रोज की तरह ही एक दिन था. तभी उनके दरवाजे पर एक साधु आया. 61 साल के इस बूढ़े, लंबी दाढ़ी वाले साधु ने भिक्षा मांगी. परिवार ने भिक्षा दे दी. लेकिन, कहानी में असली ट्विस्ट तब आया, जब उन्हें पता चला कि जिस साधु को उन्होंने भिक्षा दी है, वो कोई और नहीं बल्कि नंदी देवी का अपना बेटा है.

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ये मामला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ का है. 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक, पिथौरागढ़ के बेरीनाग के पास स्थित दौलीगाड़ गांव में रहनेवाली नंदी देवी का बेटा बुद्धि बल्लभ 46 साल पहले घर छोड़कर चला गया था. परिवार ने उसे ढूंढने की काफी कोशिश की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला. 

परिवार को पहले तो उम्मीद थी कि एक दिन बुद्धि बल्लभ लौटेंगे, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी वापसी की उम्मीद भी कम होती गई. अब इतने दशकों बाद वही बेटा साधु के वेश में अचानक गांव लौटा. ये खबर सुनकर परिवार समेत वहां मौजूद सभी लोग भावुक हो गए.

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15 साल की उम्र में छोड़ा था घर

रिपोर्ट के मुताबिक, बुद्धि बल्लभ उपाध्याय 15 साल की उम्र में घर छोड़कर चले गए थे. इसके बाद परिवार ने कई सालों तक उनकी तलाश की. लेकिन उनकी कोई खोज-खबर नहीं मिली. 4 जून को वो एक बार फिर बुद्धि बल्लभ अपने गांव पहुंचे. लेकिन घर लौटने नहीं. मां से भिक्षा लेने. गांव के कई लोगों ने उन्हें बचपन में देखा था, लेकिन 46 साल बाद उन्हें पहचान पाना आसान नहीं था. उन्होंने परिवार को बताया कि अब लोग उन्हें 'बुद्धनाथ' नाम से जानते हैं. वो अब सनातन धर्म की 'नाथ परंपरा' का पालन करते हैं. उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर साधु का मार्ग चुना और पिछले कई दशकों से इसी जीवनशैली का पालन कर रहे हैं.

एक बूढ़ी मां के लिए अपने लापता बेटे को इतने साल बाद देखना बहुत भावुक था. परिवार के लिए भी इस पर यकीन कर पाना मुश्किल था. लेकिन, जीवन असीम संभावनाओं से भरा होता है, इस कहानी को भी इस कथन का एक उदाहरण माना जा सकता है. 

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