खेती की तस्वीर दिमाग में आते ही अक्सर एक ही छवि उभरती है, पगड़ी बांधे, लाठी थामे, हल चलाता हुआ किसान. लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे कहीं आगे और कहीं ज्यादा बड़ी है. असल कहानी उन हाथों की है जो बिना थके खेतों में पसीना बहाते हैं, बीज बोते हैं, फसल काटते हैं, पशुओं की देखभाल करते हैं और घर-खेत दोनों को संभालते हैं. और ये हाथ ज्यादातर महिलाओं के हैं.
महाराष्ट्र में महिला किसानों की नई पहचान, अब खेतों की 'मजदूर' नहीं, सीधे 'मालिक' कहलाएंगी
Maharashtra Women Farmers: महाराष्ट्र सरकार का नया कानून महिला किसानों को आधिकारिक किसान का दर्जा और जमीन पर मालिकाना हक देने की दिशा में बड़ा कदम है. इससे लाखों ग्रामीण महिलाओं को सरकारी योजनाओं, KCC और सब्सिडी का सीधा लाभ मिलेगा.


भारत के गांवों में खेती सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि एक पूरी जिंदगी है, जिसे महिलाएं सुबह से रात तक जीती हैं. लेकिन कागज़ों में उनकी पहचान अक्सर सिर्फ ‘मजदूर’ तक सीमित रह जाती है. यही वो खामोश असमानता है जिसे अब बदलने की कोशिश शुरू हुई है.
महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने खेती की परिभाषा ही बदल दी है. अब सिर्फ जमीन का मालिक होना ही किसान होने की शर्त नहीं रहेगा. खेतों में काम करने वाली हर महिला को औपचारिक रूप से ‘किसान’ का दर्जा मिलेगा और उसे इसके लिए सरकारी पहचान भी दी जाएगी. यानी जो अब तक सिर्फ काम करती थीं, अब वही पहचान और हक दोनों की मालिक बनेंगी.
इसी बदलाव की पूरी जानकारी इंडिया टुडे की इस रिपोर्ट से हासिल की जा सकती है.
पसीना बहाने वाली हाथ, पर हक क्यों नहीं?
खेती में महिलाओं की भागीदारी को आजकल एक नाम से जाना जाता है, ‘फेमिनाइजेशन ऑफ एग्रीकल्चर’. सुनने में यह सिर्फ एक टर्म लगता है, लेकिन इसके पीछे जो सच्चाई है, वो पूरे ग्रामीण भारत की तस्वीर बयान कर देती है. देश के करीब 70 से 80 प्रतिशत महिला श्रमिक किसी न किसी रूप में सीधे खेती-किसानी से जुड़ी हुई हैं. चाहे बात बुआई की हो, निराई-गुड़ाई की या फिर फसल कटाई और पशुपालन की, गांवों की असली रीढ़ महिलाएं ही हैं.
नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) और पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के आंकड़े भी इसी हकीकत की तरफ इशारा करते हैं कि ग्रामीण भारत में खेती का बड़ा बोझ महिलाओं के कंधों पर टिका हुआ है. लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास साफ दिखता है. जो महिलाएं खेत में दिन-रात मेहनत करती हैं, उनके नाम पर जमीन का मालिकाना हक बहुत ही कम देखने को मिलता है.
यही वजह है कि असल मेहनत करने के बावजूद उन्हें ‘किसान’ की पहचान नहीं मिल पाती और वे अक्सर सिर्फ ‘खेतिहर मजदूर’ के दायरे में ही सिमटकर रह जाती हैं. अब महाराष्ट्र सरकार का यह नया फैसला इस पुरानी खाई को भरने की कोशिश माना जा रहा है, जिसके तहत उन लाखों महिलाओं को कानूनी तौर पर किसान की पहचान मिल सकेगी, जो अब तक खेती की असली ताकत होने के बावजूद पहचान से वंचित थीं.
अब बदलेगी तस्वीर: लोन से सब्सिडी तक सब आसान
अब तक की हकीकत यही रही है कि किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) से लेकर खेती से जुड़ी ज्यादातर सरकारी सब्सिडी और योजनाओं का फायदा उन्हीं लोगों तक पहुंचता था जिनके नाम पर जमीन दर्ज होती थी. समस्या भी यहीं से शुरू होती है, क्योंकि गांवों में अधिकतर जमीन के कागज़ पुरुषों के नाम पर ही होते हैं. नतीजा ये हुआ कि खेत में सबसे ज्यादा मेहनत करने वाली महिलाएं कई सरकारी योजनाओं से खुद-ब-खुद बाहर रह जाती थीं.
अब तस्वीर बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के मुताबिक जब महिलाओं को औपचारिक रूप से ‘किसान’ का दर्जा मिलेगा, तो उनके लिए बैंक से लोन लेना, किसान क्रेडिट कार्ड बनवाना, बीज-खाद पर सब्सिडी पाना और बाकी कृषि योजनाओं का फायदा उठाना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा.
असल में ये सिर्फ कागज़ी बदलाव नहीं है, बल्कि सीधा आर्थिक सशक्तिकरण है. जब सरकारी मदद सीधे उनके बैंक खाते तक पहुंचेगी, तो सिर्फ खेती में ही नहीं बल्कि घर के फैसलों में भी उनकी आवाज और मजबूत होगी. आत्मनिर्भरता का असर धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदलता है, और यही इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है.

अब फैसले की मेज पर होगी महिला
ये मामला सिर्फ जमीन के कागज़ बदलने तक सीमित नहीं है, बात उससे कहीं आगे की है. असल में ये उस बड़े सामाजिक बदलाव की शुरुआत मानी जा रही है, जो धीरे-धीरे पूरे ग्रामीण भारत की सोच और ढांचे को हिला सकता है. जब किसी महिला के नाम पर सिर्फ खेत नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार दोनों जुड़ते हैं, तो घर के अंदर उसकी भूमिका भी अपने आप बदलने लगती है.
नीति आयोग की जेंडर और कृषि रिपोर्ट 2023 के मुताबिक अब तक अक्सर ऐसा देखा गया है कि खेती से जुड़े बड़े फैसले, जैसे क्या बोना है, कब बेचना है, कितना निवेश करना है, इनमें महिलाओं की राय को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती थी. लेकिन जब वही महिला सरकारी रिकॉर्ड में ‘किसान’ के तौर पर दर्ज होगी, तो उसे इन फैसलों से अलग रखना आसान नहीं रहेगा.
मुंबई के सीनियर जर्नलिस्ट जयप्रकाश सिंह इसे बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत मानते हैं. ‘द लल्लनटॉप’ से फोन पर बात करते हुए जयप्रकाश कहत हैं,
ये बदलाव कहीं न कहीं पुराने सामाजिक ढांचे को चुनौती देता है, जहां फैसलों की कमान ज्यादातर पुरुषों के हाथ में रहती थी. अब महिलाओं की भागीदारी सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि धीरे-धीरे वे खेती के तकनीकी पहलुओं, बाजार की समझ और कृषि से जुड़े व्यापारिक फैसलों में भी ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाती नजर आएंगी.
कानून बना है, पर अमल बाकी है
कानून बन जाना इस कहानी का सिर्फ पहला पड़ाव है, असली इम्तिहान तो अब जमीन पर शुरू होगा. सबसे बड़ी चुनौती वही पुराना कागजी सिस्टम है, खासकर जमीन के रिकॉर्ड यानी 7/12 उतारा में महिलाओं का नाम दर्ज करवाना. सवाल भी वहीं खड़े हैं, क्या परिवार के पुरुष सदस्य अपनी जमीन का हिस्सा महिला के नाम करने को तैयार होंगे, या फिर मामला वहीं अटका रह जाएगा.
गांवों में ये पूरी प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं है. महाराष्ट्र राजस्व विभाग की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक कहीं कागजों की भागदौड़, कहीं पटवारी दफ्तर के चक्कर, तो कहीं पुश्तैनी जमीन को लेकर पुराने विवाद, ये सब मिलकर रास्ता और मुश्किल बना देते हैं. लेकिन इसके बावजूद इस फैसले को एक मजबूत शुरुआत की तरह देखा जा रहा है.
अगर प्रशासन ने इसे जमीन पर सही तरीके से लागू करा दिया, तो आने वाले कुछ सालों में महाराष्ट्र की खेती और गांवों की सामाजिक तस्वीर दोनों बदलती नजर आ सकती हैं. क्योंकि ये सिर्फ एक कानून नहीं है, बल्कि उन करोड़ों महिलाओं के लिए नई शुरुआत है, जो सालों से मिट्टी में मेहनत करके उसे सच में सोना बनाती आई हैं.
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