लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में अलीगंज अग्निकांड के मृतकों के गमगीन परिवार मौजूद हैं. हर आंख नम है, तो कोई अपने बच्चों के साथ आखिरी बातचीत याद कर फफक रहे हैं. वो बेबसी, जिसकी वजह से उन्हें दुनिया का सबसे भारी बोझ उठाना पड़ रहा है. अपनी जवान औलाद का शव उठाना. बच्चे अपने मां-बाप और रिश्तेदारों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन आखिर में उन्हें मौत मिली. 22 जून को लखनऊ में 15 मौतों की कहानी कुछ ऐसी ही थी.
'पापा, मुझे बचा लो...' लखनऊ अग्निकांड में फंसे युवाओं के आखिरी शब्द ने सबको रुलाया
Lucknow Fire Incident: लखनऊ अग्निकांड में जान गंवाने वाले नौजवानों की परिवार से आखिरी बातचीत अब सबको रुला रही है. पीड़ितों ने अपनों से मार्मिक गुहार लगाते हुए बचाने की अपील की थी. पीड़ित परिवारों का आरोप है कि फायर ब्रिगेड देर से पहुंची.


मृतकों में बाराबंकी के दो युवक भी शामिल है. फतेहपुर के शाहजान और गदिया निवासी मोहम्मद अम्मार का नाम मृतकों की लिस्ट में है. इंडिया टुडे से जुड़े रेहान मुस्तफा की रिपोर्ट के मुताबिक, आग लगने पर शाहजान ने अपने पिता मोहम्मद इमरान को आखिरी फोन किया था,
"पापा मुझे बचा लो..."
बेटे की आवाज सुनकर पिता महज दस मिनट में कोचिंग सेंटर पहुंच गए, लेकिन तब तक आग विकराल रूप ले चुकी थी. उन्होंने अंदर जाने की कोशिश की, लोगों से मदद मांगी, मिन्नतें कीं, लेकिन आग की लपटों के सामने बेबस हो गए.
पिता का आरोप- देर से पहुंची फायर ब्रिगेडइमरान का आरोप है कि लोग मोबाइल से वीडियो बनाते रहे और फायर ब्रिगेड भी देर से पहुंची. बाराबंकी के रहने वाले शाहजान और अम्मार के परिवारों में मातम पसरा है. इकलौते बेटे शाहजान को खोने के बाद मां सदमे में है और पिता का रो-रोकर बुरा हाल है.
शाहजान के पिता मोहम्मद इमरान ने बताया,
"हमारे बेटे ने फोन किया. हम भागकर पहुंचे. बहुत कोशिश की अंदर जाने की, लेकिन आग की लपटें इतनी भयानक थीं कि हम अंदर नहीं जा पाए. बेटा चिल्लाता रहा- पापा बचा लो. हम बेबस बने रहे. लोग मोबाइल से वीडियो बना रहे थे. हमने उनसे भी मिन्नतें कीं. फायर ब्रिगेड बाद में आई. तब तक आग बहुत भड़क चुकी थी."
उन्होंने आगे कहा कि बिल्डिंग में आग से बचने का कोई इंतजाम नहीं था. जिस कमरे में मेरा बेटा था, उसका दरवाजा ऑटोमैटिक लॉक हो गया था. धुआं भरने से उसकी मौत हो गई. वह हमारा इकलौता बेटा था.
अम्मार के परिवार में मातमबाराबंकी के गदिया निवासी 24 वर्षीय मोहम्मद अम्मार लखनऊ में उसी इमारत में ग्राफिक्स डिजाइनर के रूप में काम करते थे. आग लगने के समय वह बिल्डिंग में थे. गंभीर रूप से झुलसने से उनकी मौत हो गई. अम्मार अपने परिवार में सबसे बड़े थे. उनके पिता मंसूर आलम वेल्डिंग का काम करते हैं. बेटे की मौत के बाद परिवार में मातम पसरा हुआ है.
सुखमनी की पिता से आखिरी बातइंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 साल के गेम डिजाइनर सुखमनी सिंह ने अपने पिता प्रभजोत सिंह को फोन किया था. शाहजान की तरह 22 जून को करीब 2 बजे सुखमनी ने अपने पिता से रोते हुए कहा,
जॉयनील ने चाची से मदद मांगी"पापा मुझे बचा लो..."
प्रभजोत सिंह ने कहा कि सुखमनी ने बताया था कि वहां बाहर निकलने के लिए कोई जगह नहीं थी. 27 साल के जॉयनील चक्रवर्ती भी यहीं काम करते थे. उनके एक रिश्तेदार ने बताया कि जॉयनील ने आखिरी बार अपनी चाची को फोन किया था. जॉयनील ने कहा था,
"चाची, हम फंस गए हैं. किसी तरह बचाओ"
रिश्तेदारों ने बताया कि वे दोपहर करीब 3 बजे मौके पर पहुंच गए थे. उनका मानना है कि अगर बगल की छत से जलती हुई इमारत की दीवार तोड़ने का फैसला पहले लिया गया होता, तो कई जानें बचाई जा सकती थीं. विश्वनाथ ने कहा कि उन्होंने हमारे सामने ही दीवार तोड़ी. उस समय हम जॉयनील से फोन पर बात कर रहे थे.
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25 साल के अदित्य श्रीवास्तव की मां कल्पना श्रीवास्तव ने बताया कि लोग एक पाइप के जरिए बिल्डिंग से नीचे उतर रहे थे. उन्होंने आगे कहा कि उनके बेटे के दोस्त कूद गए थे, लेकिन आदित्य बाहर नहीं निकल पाया.
पीड़ित मां के सरकार से सवालकल्पना श्रीवास्तव ने सवाल किया कि बिना कानूनी परमिशन ऐसी जगह को चलाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है. उन्होंने पूछा कि बिना उचित वेंटिलेशन और एग्जिट के ऐसी जगह को लाइसेंस कैसे दिया जा सकता है. कल्पना ने बताया कि उनके बेटे आदित्य ने करीब डेढ़ महीने पहले ही 9000 रुपये की सैलरी पर एनिमेशन सेंटर में काम करना शुरू किया था.
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