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समुद्र में 300 फीट नीचे टूटी ऑक्सीजन सप्लाई, 35 मिनट बाद भी जिंदा बचा रहा गोताखोर, साइंस भी हैरान!

Chris Lemons वो व्यक्ति थे, जिन्होने मौत को मात दी. उनकी कहानी पर हाल ही में एक फ़िल्म आई है. नाम है, Last Breath. कैसे बच गए थे क्रिस लेमन्स?

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नॉर्थ सी के 90 मीटर यानी 295 फ़ीट की गहराई पर ये सब हुआ. (फ़ोटो - X/@ChrisLemonsDive)

तीन गोताखोर समुद्र में 300 फीट नीचे गोता लगाते हैं. लेकिन इनमें से एक गोताखोर (Chris Lemons Story) के ऑक्सीजन का कनेक्शन टूट जाता है. वो बिना किसी कनेक्शन के लगभग 35 मिनट तक ज़िंदा रह जाता है. घटना इतनी दुर्लभ है कि पूरी दुनिया का ध्यान इस पर गया. घटना पर फ़िल्म भी बन गई है. ऐसे में इस बात की भी चर्चा तेज़ है कि क्या सचमुच बिना ऑक्सीजन के पानी के अंदर 30 मिनट तक ज़िंदा रहा जा सकता है? सब बताते हैं बारी-बारी से.

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क्या हुआ था?

18 सितंबर 2012. क्रिस लेमन्स, डंकन ऑलकॉक और डेव युसा. ये तीनों उत्तरी सागर यानी North Sea के अंदर जाते हैं. अपनी डाइविंग-बेल ‘टैक्सी’ के ज़रिए. ये समुद्र के अंदर जाने का वाहन होता है. फिर वो 90 मीटर यानी 295 फ़ीट की गहराई पर पहुंचते हैं. क्योंकि उन्हें अपना काम करना था. 

कौन सा काम? उन्हें एक तेल ‘ऑयल रिग मैनिफोल्ड’ पर पाइप बदलना था. बता दें, नॉर्थ सी में लंबी-लंबी पाइप्स के ज़रिए तेल एक से दूसरी जगह पर पहुंचाया जाता है. फिर तीन में से दो गोताखोर क्रिस लेमन्स और डेव युसा अपने डाइविंग सूट पहनते हैं. वो मैनिफोल्ड पर एक पाइप के पास पहुंचते हैं. इधर दोनों से सीनियर डंकन ऑलकॉक वाहन के पास ही रहते हैं.

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क्रिस और डेव, दोनों डंकन के साथ जुड़े होते हैं. वो एक केबल के ज़रिए वाहन से बंधे होते हैं. इसी केबल के ज़रिए उनसे कम्यूनिकेट किया जा रहा था. उन्हें पावर, रोशनी और ऑक्सीजन-हीलियम का मिश्रण, गर्म रखने के लिए गर्म पानी जैसी चीज़ें भी इसी केबल से सप्लाई की जा रही थीं. इसे ‘डायनेमिक पोजिशनिंग’ कंप्यूटर सिस्टम के ज़रिए मैनेज किया जा रहा था.

संपर्क टूटा

लेकिन इसी बीच एक दुर्घटना हुई. गार्जियन की ख़बर के मुताबिक़, उपकरणों की खराबी के कारण क्रिस लेमन्स केबल से थोड़ा दूर जाने लगे. ऐसे में उन्होंने वापस जहाज की तरफ़ जाने की कोशिश. लेकिन ऐसे में केबल एक धातु की संरचना में फंस गई और टूट गई. इससे क्रिस लेमन्स समुद्र तल पर फंस गए. 

इस दौरान, उनके टैंक में लगभग पांच मिनट तक ऑक्सीजन बची रही. इधर उनके साथी डेव युसा जहाज के साथ दूर चले गए और उसे बचा नहीं पाए. इसके बाद जहाज के कंप्यूटर की खराबी के कारण, सिस्टम को रीसेट करने और क्रू मेंबर्स को लेमन्स का पता लगाने में आधे घंटे से ज़्यादा समय लग गया.

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जब क्रिस लेमन्स बिछड़े लोगों से मिले, तो उनकी आंखें बंद थीं. शरीर शिथिल पड़ा था. जब तक उसे डाइविंग बेल में वापस खींचा गया, तब तक लेमन्स आधे घंटे तक ऑक्सीजन के बिना रह चुके थे. जहाज पर मौजूद सभी लोगों ने मान लिया कि वो क्रिस लेमन्स का शव ही है.

लेकिन डंकन ऑलकॉक ने उम्मीद नहीं हारी. उन्होंने क्रिस लेमन्स का कार्डिओपल्मनरी रेसूसिएशन (CPR) किया. आसान भाषा में कहें, तो उन्हें मुंह के ज़रिए ऑक्सीजन देने की कोशिश की. इसके बाद जो हुआ, सब चौंक गए. क्रिस लेमन्स अचानक से उठ खड़े हुए. कुछ मिनटों के अंदर ही उनके स्वास्थ्य में सुधार हो गया.

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Last Breath

जब ये घटना सामने आई, तो सब चौंक गए. पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हुई. ये चर्चा और तेज़ हुई 2019 में. जब एलेक्स पार्किंसन ने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई. उन्होंने रिचर्ड दा कोस्टा के साथ ये डॉक्यूमेंटरी डायरेक्ट की. और अब इसी मुद्दे पर एक फ़िल्म आई है. नाम है, लास्ट ब्रीद. हिंदी में कहें, तो ‘आख़िरी सांस.’ एलेक्स पार्किंसन ने ही इसे डायरेक्ट किया है.

इसमें क्रिस लेमन्स का किरदार निभाया है फिन कोल ने. वुडी हैरेलसन ने क्रिस लेमन्स के गुरु और साथी डंकन ऑलकॉक का किरदार निभाया है. वहीं, सिमू लियू उनके सहयोगी डेव युसा के किरदार में नज़र आए हैं. लास्ट ब्रीद के डायरेक्टर ने एलेक्स पार्किंसन ने टाइम मैगजीन को बताया है,

मुझे ऐसी कहानियां बहुत पसंद हैं, जिनमें सच्चाई कल्पना से भी ज़्यादा अजीब होती है. क्योंकि इससे आपको इंसानी दिमाग़ के बारे में अद्भुत जानकारी मिलती है. क्रिस लेमन्स को उस रात मर जाना चाहिए था. लेकिन उनकी कहानी इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे मानवीय साहस किसी भी चीज़ पर जीत हासिल कर सकता है.

30 मिनट तक बिना ऑक्सीजन ज़िंदा कैसे?

क्या आप सचमुच बिना ऑक्सीजन के पानी के अंदर लगभग 30 मिनट तक जीवित रह सकते हैं? इसके बारे में ‘लास्ट ब्रीद’ फ़िल्म के अंत में एक टाइटल कार्ड के बारे में बताया गया है. कार्ड में कहा गया कि रिसर्चर्स के पास इस बात का कोई साइंटिफ़िक एक्सप्लेनेशन नहीं है कि क्रिस लेमन्स इतने लंबे समय तक बिना ऑक्सीजन कैसे ज़िंदा रहे.

वहीं, डायरेक्टर एलेक्स पार्किंसन ने इसे लेकर USA टुडे से बात की है. उन्होंने बताया,

ऑक्सीजन के बिना तीन मिनट में ही दिमाग़ को नुकसान (Brain Damage) पहुंचना शुरू हो जाता है. ये न सिर्फ़ रिमार्केबल है कि वो बिना ऑक्सीजन के इतने समय तक ज़िंदा रहे, बल्कि ये भी कि उनके दिमाग़ को कोई नुकसान नहीं हुआ, ये बिल्कुल आश्चर्यजनक है.

एलेक्स पार्किंसन का कहना है कि इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है. उन्होंने इस विषय पर न्यूरोसर्जन और एनेस्थेटिस्ट से विस्तार से बात की है. उनका मानना ​​है कि फैक्टर्स के सही कॉम्बिनेशन ने लेमन्स के अंगों को स्थिर रखने में मदद की. पार्किंसन कहते हैं,

अगर उन्हें ज़्यादा ऑक्सीजन मिलती, तो वो सांस लेते रहते. उनका शरीर ठंडा हो जाता और हाइपोथर्मिया से उनकी मौत हो जाती. लेकिन अगर उन्हें कम ऑक्सीजन मिलती, तो वो दम घुटने से मर जाते. इसलिए ये सौभाग्य ही है कि इन दोनों पहलुओं के बीच एक कॉम्बिनेशन बैठ गया. मुझे पर्सनली लगता है कि गैस ठीक उसी वक़्त ख़त्म हो गई, जब उनके शरीर का तापमान ‘स्लीप मोड’ में जाने के लिए एकदम उपयुक्त था.

बताते चलें, जब ये घटना हुई, तब क्रिस लेमन्स 32 साल के थे. अब वो 45 साल के हैं और फ़्रांस के दक्षिणी इलाक़े में रहते हैं.

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