‘लोग अच्छे और बुरे दोनों तरह के पुराने इतिहास को याद रखते हैं. 1950 के दशक से रूस और सोवियत संघ ने कई मौकों पर भारत का साथ दिया, जबकि उस समय दुनिया के कई देश पाकिस्तान के समर्थन में थे.’ ये कहना है भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर का. ये स्टेटमेंट उन्होंने देश की राजधानी दिल्ली में म्युनिक लीडर्स मीटिंग के दौरान कहा. म्यूनिक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और देशों के बीच डिप्लोमैटिक बातचीत के लिए इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है. इसकी सालाना कॉन्फ्रेंस जर्मनी के म्यूनिक में होती है. 4-5 अक्टूबर को दिल्ली में इसके लीडर्स की मीटिंग चल रही है. इस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिका-यूरोप चीन के साथ और भी कई इंटरनेशनल मुद्दों पर एस जयशंकर ने अपनी बात रखी.
दुनिया पर अमेरिका की 'दादागिरी' के दिन गए, एस जयशंकर ने समझा दिया कैसे?
अमेरिका की बदलती भूमिका, चीन की बढ़ती ताकत और US-China rivalry पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया के बदलते समीकरण समझाए.

क्या कहा उन्होंने, एक-एक करके समझते हैं.
अमेरिका के रवैये पर क्या बोले जयशंकर?जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया में सबसे बड़ा बदलाव अमेरिका के बदले हुए रवैये का है. उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका ने अपनी विदेश नीति और दुनिया के साथ अपने रिश्तों में बड़ा बदलाव किया है. उन्होंने इसे radical repositioning यानी बहुत बड़ा बदलाव कहा. अपने संबोधन में उन्होंने एक सेंटेंस कहा कि ‘America has deliberately become a lonelier power.’ यानी ‘अमेरिका अब पहले की तरह हर मामले में दुनिया के साथ मिलकर चलने के बजाय अपने हितों और अपनी प्राथमिकताओं को ज्यादा अहमियत दे रहा है.’ जयशंकर के मुताबिक ये बदलाव अमेरिका ने जानबूझकर अपनी पसंद से किया है.
जयशंकर ने इस दौरान चीन पर भी बात की. उन्होंने कहा कि दुनिया में दूसरा बड़ा बदलाव चीन के बढ़ते प्रभाव का है. उन्होंने बताया कि चीन दुनिया की करीब एक-तिहाई मैन्युफैक्चरिंग करता है. इसलिए चीन की आर्थिक ताकत बहुत बढ़ गई है. जयशंकर के मुताबिक, चीन की आर्थिक ताकत अब उसके राजनीतिक प्रभाव में भी बदल रही है.
इसके अलावा उन्होंने चीन और अमेरिका के बीच चल रहे तनावों की भी चर्चा की. उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच बहुत तेज मुकाबला चल रहा है. ये मुकाबला सिर्फ दो देशों के बीच नहीं है, बल्कि इसका असर बाकी दुनिया पर भी पड़ रहा है. आज हर देश अपनी ताकत का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है. आगे उन्होंने ‘weaponisation of leverage’ फ्रेज का ज़िक्र किया. आसान भाषा में समझें तो जिस देश के पास पैसा, टेक्नोलॉजी, बाजार जैसे रिसोर्सेज हैं, वो जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है. अमेरिका और चीन आजकल इसी तरह एक-दूसरे पर दबाव बना रहे हैं.
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इस एड्रेस में जयशंकर ने एक और अहम बात कही कि अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला जरूर है, लेकिन दुनिया के देश एक-दूसरे पर निर्भर भी हैं. मसलन, एक देश को दूसरे देश से सामान चाहिए. किसी को टेक्नोलॉजी चाहिए. किसी को बाजार चाहिए और किसी को कच्चा माल. इसलिए एक तरफ देशों के बीच मुकाबला बढ़ रहा है, लेकिन दूसरी तरफ वे एक-दूसरे से पूरी तरह अलग भी नहीं हो सकते. इस पूरे प्रोसेस को उन्होंने “complexity of interdependence” कहा.
जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि दुनिया की पुरानी व्यवस्था बदल रही है. अब ऐसा नहीं है कि सिर्फ अमेरिका या कुछ बड़ी ताकतें ही दुनिया की दिशा तय करेंगी. मिडिल ईस्ट और उभरते देश भी अपने हितों के हिसाब से अलग-अलग देशों के साथ रिश्ते बना रहे हैं. वो सहूलियत के हिसाब से अपने लिए रास्ता तय कर रहे हैं.
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