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मानसून का रुलाना शुरू, इस साल 35% कम बारिश, अभी मुंबई तक भी नहीं पहुंचा

मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े कहते हैं कि इस साल सिर्फ उत्तर-पश्चिम भारत ही ऐसा इलाका है, जहां साल के इस समय के हिसाब से सामान्य से 5% ज्यादा बारिश हुई है. बाकी सभी इलाकों में इस साल बारिश की कमी है. आगे क्या होने वाला है?

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साल 2026 में भारत के मानसून में 35 प्रतिशत कमी देखने को मिल सकती है (PHOTO-The Lallantop)

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  • 2026 में मानसून सामान्य तारीख से एक सप्ताह बाद भी मुंबई और कोंकण तक पहुंचने में असमर्थ है, जिसके कारण पूरे भारत में मानसून की बारिश में करीब 35 प्रतिशत की कमी देखी जा रही है।
  • मौसम विभाग के अनुसार सुपर एल-नीनो की स्थिति मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान में वृद्धि के कारण इस साल मॉनसून कमजोर पड़ रहा है, जिससे बारिश सामान्य से कम हो रही है।
  • मानसून में देरी और कमी के कारण कृषि और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है, जिससे भविष्य में मौसम विभाग के अनुमान और मॉनसून की गतिविधि के आधार पर तैयारी जरूरी हो जाएगी।

भारत में मानसून आम तौर पर लगभग 10 जून तक मुंबई और कोंकण के इलाकों तक पहुंच जाता है. लेकिन इस साल यानी 2026 में नॉर्मल तारीख से एक हफ्ते अधिक बीत चुके हैं. फिर भी मानसून की स्थिति ये है कि वो अभी मुंबई और कोंकण तक भी नहीं पहुंच पाया है. अब मानसून के बादल और आगे यानी उत्तर भारत की ओर तभी आएंगे, जब वो महाराष्ट्र तक पहुंचें. लेकिन इस साल जो स्थिति है, उसे देखकर कहा जा रहा है कि इस साल मानसून में 35 प्रतिशत तक की कमी आई है.

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मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े कहते हैं कि इस साल सिर्फ उत्तर-पश्चिम भारत ही ऐसा इलाका है जहां साल के इस समय के हिसाब से सामान्य से 5% ज्यादा बारिश हुई है. बाकी सभी इलाकों में इस साल बारिश की कमी है. इनमें पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर भारत (43%), मध्य भारत (63%) और दक्षिण भारत के इलाके शामिल हैं.

सुपर ‘एल-नीनो’ वाला साल

ये कोई यूनिक घटना नहीं है कि मानसून के शुरुआती महीने (जून) में बारिश की कमी हुई हो. लेकिन इस साल मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह 'सुपर अल नीनो' वाला साल हो सकता है. इसलिए इस साल बारिश की कमी और भी अहम हो जाती है. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक जून 2015 में सबसे अधिक अल नीनो का असर देखा गया था. तब बारिश सामान्य से 14% ज्यादा हुई थी. इसके अलावा कैलेंडर पर और पीछे जाएं तो जून 2002 और जून 2004, दोनों ही साल सूखे की मार के साथ खत्म हुए थे. 

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लेकिन इन सालों में भी जून में बारिश सामान्य के करीब रही. 2002 में सामान्य से लगभग 2% और 2004 में 1% ज्यादा ही बारिश हुई. इन दोनों सालों में बारिश की कमी जुलाई और उसके बाद ही देखी गई. लेकिन साल 2026 काफी असामान्य रहा है. ये साल 2009 और 2014 की यादें ताजा करता है. साल 2009 में सामान्य से 47% कम बारिश हुई, जबकि 2014 में सामान्य से 44% कम बारिश हुई. इन दोनों सालों को देखें तो इनमें जून महीने में बारिश में उतनी ही भारी कमी थी, जितनी इस साल देखी गई है. हाल के सालों की बात करें तो 2023 सबसे हालिया अल नीनो वाला साल था. 2023 में जून में बारिश सामान्य से लगभग 8% कम रही.

गर्म हो रहा समंदर

मौसम का ये सारा खेल प्रकृति के एक इफेक्ट की देन है. इसे कहते हैं अल नीनो. अल नीनो का मतलब है मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का समय-समय पर गर्म होना. और इससे भारत का मॉनसून कमजोर पड़ सकता है. ये इफेक्ट बसंत के मौसम में शुरू होती है. लेकिन इसका असर बाद के समय में दिखाई देता है. IMD सेंटर, चेन्नई चीफ फोरकास्टर डी.एस. पाई द हिंदू से कहते हैं कि जून में होने वाली बारिश और मॉनसून के आने की रफ्तार मुख्य रूप से स्थानीय और रीजनल यानी उस क्षेत्र के कारणों पर निर्भर है.

डॉ. पाई ने कहते हैं कि मॉनसून की सुस्ती, मॉनसून और मिड-लैटिट्यूड वाले मौसम सिस्टम के बीच चल रही खींचतान को भी दिखाती है. मिड-लैटिट्यूड, ट्रॉपिक्स और ध्रुवों के बीच का इलाका है, जहां पूरब दिशा की ओर बहने वाली पछुआ हवाओं का असर बना रहता है. वेस्टर्न डिस्टर्बेंस, यानी भूमध्य सागर और पश्चिम एशिया से बारिश लाने वाले तूफान इसी हवा के बहाव के साथ आते हैं. ये आमतौर पर सर्दियों में उत्तर-पश्चिम भारत को प्रभावित करते हैं.

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