फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही इंडियन एयरफोर्स (Indian Air Force) को जल्द ही 114 रफाल (Dassault Rafale) विमान मिल सकते हैं. मार्च 2026 के अंत में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों (Emmanuel Macron India Visit) की भारत यात्रा प्रस्तावित है. इस यात्रा से पहले डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) से इस खरीद को मंजूरी मिल सकती है. DAC, रक्षा मंत्रालय में तीनों सेनाओं, आर्मी, नेवी, एयरफोर्स और इंडियन कोस्ट गार्ड के लिए नई नीतियों और रक्षा खरीद पर फैसला लेने वाली सर्वोच्च संस्था है. DAC के क्लियर किए बिना कोई भी रक्षा खरीद नहीं होती. इस काउंसिल की अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं.
जेट्स की कमी से जूझ रही इंडियन एयरफोर्स, जल्द खरीद सकती है 114 रफाल, इस डील में क्या नया है?
Indian Air Force मात्र 29 Squadrons के साथ ऑपरेट कर रही है. भारत के साइज और सीमाओं को देखते हुए 42 स्क्वाड्रन स्वीकृत हैं. ऐसे में इंडियन एयरफोर्स के लिए इन Rafale Fighter Jets की डील काफी मायने रखती है.
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इस समय इंडियन एयरफोर्स मात्र 29 स्क्वाड्रंस के साथ ऑपरेट कर रही है. एक स्क्वाड्रन में 18-20 विमान होते हैं. भारत के साइज और सीमाओं को देखते हुए 42 स्क्वाड्रन स्वीकृत हैं, लेकिन फिलहाल स्थिति इससे बहुत उलट है. और भारत के पड़ोसी पाकिस्तान-चीन की आदत को देखते हुए ये और भी जरूरी है कि भारत की एयरफोर्स के पास विमानों की कमी न हो. ऐसे में इंडियन एयरफोर्स के लिए इन 114 रफाल विमानों की डील काफी मायने रखती है. क्योंकि भारत का स्वदेशी विमान LCA तेजस उस रफ्तार से डिलीवर नहीं हो पा रहा है, जिसकी जरूरत है. AMCA के आने में कम से कम 7-9 साल लग सकते हैं. इसलिए फ्रांस से रफाल की डील एयरफोर्स के लिए बेहद अहम हो जाती है. अगर यह डील मंजूर हो जाती है, तो यह भारत की सबसे बड़ी फाइटर एयरक्राफ्ट डील में से एक होगी. इसकी अनुमानित कीमत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये हो सकती है.

इंडिया टुडे के सूत्रों ने बताया कि प्रस्तावित प्लान में 114 राफेल जेट खरीदने की बात है, जिसमें से 18 विमान फ्लाई-अवे यानी तैयार कंडीशन में खरीदे जाएंगे. जबकि बाकी विमान भारत में बनाए जाएंगे. सूत्रों के मुताबिक उम्मीद है कि लगभग 80 प्रतिशत विमान देश में ही बनाए जाएंगे, और मेक इन इंडिया के तहत विमानों में 60 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट होगा. प्रस्तावित कॉन्फिगरेशन के तहत 88 विमान सिंगल-सीट और 26 विमान ट्विन-सीट यानी डबल सीट वेरिएंट वाले होंगे. ट्विन-सीट विमानों का इस्तेमाल अधिकतर ट्रेनिंग में किया जाता है. उम्मीद है कि डसॉल्ट एविएशन विमानों को भारत में बनाने और असेंबली के लिए भारतीय प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों के साथ डील कर सकता है.
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पहले से ही सर्विस में मौजूद इस विमान ने अपने उन्नत सेंसर और लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता से अपनी काबिलियत साबित की है. इस विमान में मीटियॉर बियॉन्ड-विजुअल-रेंज मिसाइल और SCALP क्रूज मिसाइल जैसे हथियार लगते हैं जो ऑपरेशन सिंदूर भारत की हवाई क्षमता के लिए काफी कारगर साबित हुए थे.
सोर्स कोड की समस्यारफाल खरीद के साथ जो एक सवाल उठ रहा है, वो है सोर्स कोड. लेकिन ये होता क्या है? नाम से तो लगता है कि ये कोई कोड होगा जिससे विमान चलता है. लेकिन ये एक ऐसा कोड है जिसे विमान का दिमाग कहा जाता है. जब भारत ने फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन से रफाल खरीदा, तब दसॉ ने भारत को सोर्स कोड नहीं दिया था. इस वजह से भारत रफाल में अपने मनचाहे हथियार नहीं लगा सका. आज भी भारत को अगर रफाल में अपनी जरूरत के अनुसार कोई बदलाव करना होता है तो इसके लिए उसकी निर्भरता फ्रांस पर है.
आधुनिक फाइटर जेट्स में सोर्स कोड सिर्फ प्रोग्रामिंग नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा है. एक तरह से यह विमान का दिमाग है. सोर्स कोड ये तय करता है कि जेट कैसे उड़ता है और युद्ध में कैसे ढलता है. सबसे जरूरी बात कि विमान में किसी भी तरह का बदलाव बिना सोर्स कोड के नहीं हो सकता. ऐसे में भारत को रफाल के साथ उसमें लगने वाले हथियार भी फ्रांस से लेने पड़ सकते हैं.
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