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बेटे ने संन्यास लिया तो RBI बॉन्ड्स के लिए कोर्ट पहुंची मां, अदालत ने खारिज कर दी याचिका

Bombay High Court: कोर्ट ने कहा कि खुद को संन्यासी बताने में और असल संन्यास में फर्क है. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जैन धर्म में जब कोई संन्यासी बन जाता है, तो वो अपनी संपत्ति पर से सभी कानूनी अधिकार खो देता है. इसे "सिविल डेथ" के बराबर माना जाता है.

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कोर्ट ने बॉन्ड्स ट्रांसफर करने की याचिका खारिज कर दी है. (सांकेतिक तस्वीर: AI/इंडिया टुडे)

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक जैन व्यक्ति की मां और पत्नी की याचिका खारिज कर दी. उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि व्यक्ति के नाम पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI Bond Transfer Case) के जो बॉन्ड्स हैं, उसे याचिकाकर्ताओं के नाम पर ट्रांसफर कर दिया जाए. ऐसा इसलिए क्योंकि वो व्यक्ति और उसके बच्चे जैन संन्यासी बन गए हैं. तर्क दिया गया कि उन्होंने अपने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया है.

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बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मनोज झवेरचंद डेढिया और उनके बच्चों ने 20 नवंबर, 2022 को संन्यास लिया. इसके बाद मनोज की मां निर्मला डेढिया और उनकी पत्नी छाया मनोज डेढिया कोर्ट पहुंची. उन्होंने तर्क दिया कि उनके परिवार के लोगों का ये आध्यात्मिक त्याग “नागरिक मृत्यु” (सिविल डेथ) के समान है.  

सिविल डेथ किसी व्यक्ति की ऐसी कानूनी स्थिति है जिसमें वो शारीरिक रूप से तो जिंदा हो, लेकिन उसे नागरिक या समाजिक सदस्य के तौर पर मिलने वाले अधिकारों से वंचित किया गया हो.

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मनोज के परिवार ने अदालत से कहा कि जैन धर्म में जब कोई व्यक्ति संन्यासी बन जाता है, तो वो अपनी संपत्ति पर से सभी कानूनी अधिकार खो देता है. इसलिए उन्होंने RBI के बॉन्ड्स के साथ-साथ मनोज की बाकी की संपत्तियों को भी ट्रांसफर करने की मांग रखी.

"संन्यासी बताने में और असल संन्यास में फर्क है"

जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस नीला गोकले की बेंच ने इस याचिका को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि इस मामले में कानूनी और तथ्यात्मक पहलू दोनों शामिल हैं. यानी कि इसमें कानून से जुड़े मुद्दे भी हैं और असली घटनाओं से जुड़े सवाल भी हैं. ऐसे मामलों को सुलझाने के लिए गहन से जांच और सबूतों की जरूरत होती है, जो रिट याचिका के दायरे में नहीं आता.

कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के संन्यासी बनने के कारण उसके सिविल डेथ की घोषणा करने से पहले, कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है. अदालत ने एक पुराने मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के एक ऑब्जर्वेशन का हवाला देते हुए कहा,

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कोई व्यक्ति खुद को संन्यासी बताता है या संन्यासियों के जैसे कपड़े पहनता है. इस आधार पर उसे संन्यासी नहीं माना जाएगा. उसे सांसारिक हितों का त्याग करना होगा और दुनिया के लिए मृत होना पड़ेगा. इतना ही नहीं उसे जरूरी अनुष्ठान भी करने चाहिए. इन सबके बिना संन्यास पूरा नहीं होगा.

बेंच ने इस बात पर सवाल उठाया कि मनोज और उनके बच्चों ने सच में संन्यास लिया है या नहीं. हाईकोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले को सुलझाने के लिए याचिकाकर्ताओं के पास उचित नागरिक मंच हैं. उन्हीं मंचों के माध्यम से इसका उपाय ढूंढना चाहिए.

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बैंक ने कार्रवाई से इनकार किया था

मनोज डेढिया के नाम पर जारी बॉन्ड्स सितंबर 2026 में मैच्योर होने वाले हैं. मतलब कि बॉन्ड्स के बदले पैसे मिलने वाले हैं. मनोज की मां और पत्नी ने कोर्ट जाने से पहले HDFC बैंक से संपर्क किया था. लेकिन बैंक ने भी बॉन्ड्स ट्रांसफर करने से इनकार कर दिया. बैंक ने कहा कि RBI के गाइडलाइंस के मुताबिक, ऐसा तब तक नहीं किया जा सकता जब तक बॉन्डधारक की मृत्यु नहीं हो जाती.

उन्होंने मनोज के संन्यास को साबित करने के लिए बैंक को कुछ तस्वीरें दिखाईं. इनमें मनोज और उनके बच्चे संन्यास ले रहे थे. परिवार ने मनोज की ओर से जारी एक एफिडेविट भी पेश किया. इसमें लिखा था कि मनोज को बॉन्ड्स या संपत्ति के ट्रांसफर से कोई दिक्कत नहीं है. कई दूसरे दस्तावेज भी पेश किए गए. पहले बैंक ने और फिर अब कोर्ट ने इन सभी दस्तावेजों को खारिज कर दिया. 

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