दिल्ली में किराए का कमरा, पीजी या हॉस्टल ढूंढते समय आमतौर पर हम किराया, मेट्रो से दूरी, कमरे का आकार, बिजली-पानी और वाई-फाई देखते हैं. लेकिन 6 सितंबर को सत्य निकेतन में पांच मंजिला छात्र आवास की इमारत ढहने और 7 लोगों की मौत के बाद एक सवाल सबसे ऊपर आ गया है. जिस इमारत में हम रहने जा रहे हैं, वो सच में सुरक्षित है या सिर्फ बाहर से ठीक दिखाई दे रही है?
दिल्ली की पुरानी इमारतें कितनी सुरक्षित? किराए पर कमरा लेने से पहले ये 10 चीजें जरूर चेक करें
Satya Niketan building collapse: सत्य निकेतन में पीजी की इमारत गिरने और 7 लोगों की मौत के बाद दिल्ली में पुरानी और भीड़भाड़ वाली इमारतों की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं. कमरा या पीजी किराए पर लेने से पहले स्ट्रक्चर में दरार, गैर कानूनी निर्माण, लोड-बेयरिंग दीवार, बेसमेंट, सीढ़ी, फायर सेफ्टी, बिजली और जरूरी दस्तावेजों की जांच कैसे करें?

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका (PIL) में प्राइवेट पीजी और हॉस्टल के सुरक्षा ऑडिट की मांग की गई है. याचिका में इस बात की भी जांच की मांग हुई है कि कहीं इमारत में किए गए संरचनात्मक बदलावों ने उसकी मजबूती को प्रभावित तो नहीं किया.
इसलिए अगली बार कमरा देखने जाएं तो सिर्फ कमरे की खिड़की और अलमारी मत देखिए. करीब 5 मिनट में इन 10 चीजों पर नजर डालिए.
1. सबसे पहले इमारत की उम्र पूछिए
पुरानी इमारत अपने आप में असुरक्षित नहीं होती. असली सवाल है कि उसका रखरखाव कैसा हुआ है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव किए गए हैं. दिल्ली के भवन नियमों में संरचनात्मक सुरक्षा के लिए प्रावधान मौजूद हैं और डीडीए के मुताबिक यूनिफाइड बिल्डिंग बायलॉज 2016 में भी संरचनात्मक सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा और भवन सेवाओं से जुड़े प्रावधान शामिल हैं.
इसलिए मकान मालिक से पूछिए कि इमारत कब बनी थी, उसका स्वीकृत नक्शा क्या है और हाल के वर्षों में कोई बड़ा निर्माण या बदलाव हुआ है या नहीं.
2. नई मंजिल या कमरे जोड़ने की कहानी समझिए
कई बार पुरानी इमारत को बाद में बदलकर ज्यादा लोगों के रहने लायक बना दिया जाता है. डीडीए के नियमों के मुताबिक अतिरिक्त मंजिल, कमरे, बालकनी को बंद करके कमरा बनाना या बेसमेंट में नया इस्तेमाल शुरू करना ऐसे बदलाव हैं जिनकी वैधता जांचना जरूरी है.
सत्य निकेतन मामले में भी इमारत में हुए निर्माण और बदलाव जांच के केंद्र में हैं. इसलिए सिर्फ ये देखकर भरोसा मत कीजिए कि ऊपर चार-पांच मंजिल बनी हुई हैं. सवाल ये है कि क्या वो निर्माण स्वीकृत था.
3. दीवार में बड़ी दरार दिखे तो उसे सजावट मत समझिए
हर दरार खतरनाक नहीं होती. पेंट या प्लास्टर में आई महीन दरार और बीम, कॉलम या भार उठाने वाली दीवार में दिखाई देने वाली बड़ी, लगातार बढ़ती दरार एक जैसी चीज नहीं हैं.
अगर कॉलम या बीम में गहरी दरार, कंक्रीट टूटना, लोहे की सरिया दिखाई देना, दीवार का झुकना या फर्श का असामान्य रूप से धंसना दिखे तो कमरे में शिफ्ट होने से पहले विशेषज्ञ की राय लेना ज्यादा समझदारी है.
4. लोड-बेयरिंग दीवार से छेड़छाड़ तो नहीं हुई?
इमारत की हर दीवार सिर्फ कमरे बांटने के लिए नहीं होती. कुछ संरचनात्मक हिस्से इमारत का भार संभालते हैं. ऐसे हिस्सों को बिना विशेषज्ञ की सलाह के हटाना या उनमें बड़े बदलाव करना जोखिम पैदा कर सकता है.
इसलिए मकान मालिक अगर कहे कि "यहां पहले दीवार थी, अब कमरा बड़ा करने के लिए तोड़ दी", तो इसे सामान्य इंटीरियर बदलाव समझकर नजरअंदाज न करें.
5. बेसमेंट को खास तौर पर देखिए
बेसमेंट में पानी जमा होना, लगातार सीलन, नई खुदाई, भारी निर्माण सामग्री या बिना योजना के बदलाव दिखाई दें तो सवाल पूछिए.
सत्य निकेतन हादसे की शुरुआती जांच में बेसमेंट में पानी जमा होने और निर्माण कार्य को संभावित कारकों के तौर पर देखा गया है. अंतिम कारण अभी जांच का विषय है, इसलिए किसी एक वजह को हादसे का निश्चित कारण मानना जल्दबाजी होगी.

6. सीढ़ी आपकी असली इमरजेंसी एग्जिट है
कमरे में जाने से पहले सीढ़ियां जरूर देखिए. क्या रास्ता खुला है? क्या वहां सामान, बाइक, जूते या कबाड़ रखा है? क्या सीढ़ी इतनी संकरी है कि आपात स्थिति में लोग आसानी से निकल सकें?
दिल्ली फायर सर्विस साफ कहती है कि आग लगने की स्थिति में निकासी के रास्ते और सीढ़ियां बाधारहित होनी चाहिए. फायर सर्विस ये भी सलाह देती है कि आग लगने पर लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
7. फायर सेफ्टी सिर्फ दीवार पर लगा बोर्ड नहीं है
पीजी या हॉस्टल में फायर अलार्म, अग्निशमन उपकरण और सुरक्षित निकासी व्यवस्था की स्थिति देखिए. सिर्फ एक्सटिंग्विशर लगा होना पर्याप्त नहीं है. वो इस्तेमाल करने लायक है या नहीं, ये भी मायने रखता है.
दिल्ली फायर सर्विस के मुताबिक फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट की शर्तों में निकासी के रास्तों को खुला रखना और अग्निशमन उपकरणों को काम करने की स्थिति में रखना शामिल है. साथ ही, स्वीकृत भवन में बाद में किए गए निर्माण या बदलावों की जानकारी भी महत्वपूर्ण है.
8. कमरे में कितने लोग रहते हैं, ये भी पूछिए
पीजी में एक कमरे में कितने लोगों को रखा जाता है? क्या मकान का वास्तविक इस्तेमाल स्वीकृत उपयोग के अनुरूप है? क्या एक सामान्य घर को बहुत ज्यादा लोगों के रहने की जगह में बदल दिया गया है?
जितने ज्यादा लोग एक सीमित जगह में होंगे, उतनी ही ज्यादा जरूरत होगी कि बिजली, गैस, सीढ़ी, निकासी और आग से बचाव की व्यवस्था सही हो.
9. बिजली के तार और गैस व्यवस्था को नजरअंदाज न करें
खुले तार, टूटे स्विच, एक ही सॉकेट में कई भारी उपकरण, अस्थायी वायरिंग या रसोई में खराब गैस व्यवस्था दिखे तो सावधान हो जाइए.
दिल्ली फायर सर्विस भी आवासीय इलाकों में विद्युत उपकरणों और वायरिंग के साथ छेड़छाड़ से बचने तथा एक सॉकेट में एक ही विद्युत उपकरण इस्तेमाल करने की सलाह देती है.
10. मकान मालिक से सिर्फ किराया नहीं, दस्तावेज भी पूछिए
सबसे जरूरी सवाल यही है. क्या इमारत का स्वीकृत नक्शा है? क्या जरूरत के हिसाब से फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र मौजूद है? क्या हाल में कोई बड़ा निर्माण हुआ है? क्या किसी हिस्से को लेकर नगर निकाय ने नोटिस दिया है?
अगर मकान मालिक इन सवालों पर नाराज हो जाए और कहे कि "आपको कमरे से मतलब रखिए, बिल्डिंग से नहीं", तो इसे लाल झंडा मानिए.
किरायेदार आखिर कर क्या सकता है?
किरायेदार के पास हर इमारत की संरचनात्मक मजबूती जांचने की तकनीकी क्षमता नहीं होती. लेकिन शुरुआती खतरे पहचानना उसके हाथ में जरूर है. दिल्ली से सटे नोएडा अथॉरिटी से हाल ही में रिटायर हुए एक अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर लल्लनटॉप को बताया,
कानूनन एक्शन लेना नामुमकिन तो नहीं मगर बेहद मुश्किल जरूर है. ऐसे में किराए पर घर लेते समय खुद सावधान रहना जरूरी है. बड़ी दरार, झुका हुआ हिस्सा, असामान्य कंपन, पानी से लगातार खराब होती संरचना (सीलन वगैरह), अवैध निर्माण का शक या बंद इमरजेंसी रास्ता दिखे तो सिर्फ सस्ता किराया देखकर कमरा बुक न करें.
जरूरत हो तो योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर से निरीक्षण करवाना सबसे सुरक्षित विकल्प है. हालांकि इसके लिए मकान मालिक को मनाना उतना ही मुश्किल है, जितना 11 मुल्कों की पुलिस के लिए डॉन को पकड़ना. दिल्ली के आधिकारिक दस्तावेजों में भी पुराने और जोखिम वाले भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा जांच और जरूरत पड़ने पर मजबूती बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया गया है.
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आखिर में सबसे जरूरी बात
किराए का कमरा लेते समय हम अक्सर पूछते हैं, "कितना किराया है?" और "मेट्रो कितनी दूर है?" अब तीसरा सवाल भी उतना ही जरूरी होना चाहिए, "इमारत कितनी सुरक्षित है?"
सत्य निकेतन का हादसा सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है. ये याद दिलाता है कि पुरानी इमारत, ज्यादा आबादी, अनधिकृत निर्माण, खराब रखरखाव और कमजोर फायर सेफ्टी जैसी चीजें अलग-अलग दिख सकती हैं, लेकिन खतरा पैदा होने पर एक साथ बड़ी समस्या बन सकती हैं.
कमरा पसंद आने में 10 मिनट लगते हैं. बिल्डिंग की सुरक्षा देखने में भी करीब उतना ही समय लग सकता है. फर्क सिर्फ इतना है कि कमरे का रंग पसंद न आए तो बदला जा सकता है, लेकिन असुरक्षित इमारत का जोखिम हमेशा आसानी से नहीं बदला जा सकता.
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