The Lallantop

5 मौतें, 40 आरोपी, 11 साल चली सुनवाई में सब बरी हो गए, डांगावास हत्याकांड की पूरी कहानी

2015 में राजस्थान के डांगावास में जमीन विवाद को लेकर हुई हिंसा में कई लोगों की मौत हुई थी, जिसके करीब 11 साल बाद अदालत ने 40 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.

Advertisement
post-main-image
डांगावास हत्याकांड के 40 आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया. (फोटो- India Today)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • डांगावास गांव में 14 मई 2015 को जमीन विवाद के चलते हुई हिंसा में तीन लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए, जिसमें दलित मेघवाल परिवार पर हमला किया गया था।
  • यह विवाद 1961 में जमीन के दस्तावेजी अधिकार और कब्जे को लेकर जाट और मेघवाल परिवार के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद था, जिसने तनाव को जन्म दिया।
  • करीब 11 साल की कानूनी जांच के बाद 5 अगस्त 2026 को अदालत ने सभी 40 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया, जिसे पीड़ित परिवार ने चुनौती देने की बात कही है।

तारीख 14 मई 2015. राजस्थान के नागौर जिले का डांगावास गांव. सुबह के करीब साढ़े 10 बजे थे. दलित मेघवाल परिवार को खबर मिली कि उनकी विवादित जमीन को लेकर गांव में एक बार फिर पंचायत बुलाई गई है. लोग इकट्ठा हो रहे हैं. उम्मीद जगी कि शायद आज उनकी जमीन का मसला हल हो. परिवार के कुछ लोग रिश्तेदारों के साथ निकले. मगर तब तक भीड़ जुट चुकी थी. सामने करीब 350-400 लोगों की भीड़ थी. भीड़ में कई लोगों के हाथों में लाठियां, लोहे के सरिए, पाइप और धारदार हथियार थे. मेघवाल परिवार के लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उन पर हमला शुरू हो गया.

Advertisement

उन्हें चारों तरफ से घेर लिया गया था. रास्ता ऐसा बंद था कि भागने की कोई गुंजाइश नहीं. उन्हें बुरी तरह पीटा गया. हाथ-पैर तोड़ दिए गए. जातिसूचक गालियां दी गईं. महिलाओं को भी बख्शा नहीं गया. उनको भी इतना पीटा गया कि उनका शरीर पूरा नीला पड़ गया. कुछ ही देर में एक परिवार के सामने उसके अपने लोग दम तोड़ने लगे.

इस बर्बर हिंसा में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई. कई लोग बुरी तरह घायल हुए. एक घायल ने अस्पताल में दम तोड़ दिया. इसके बाद दो और लोगों की मौत की बात सामने आई.

Advertisement

ये तमाम बातें अगस्त 2015 में इस मामले से जुड़ी CBI की शुरुआती चार्जशीट में आरोपों की शक्ल में दर्ज हैं. ये घटना जब सामने आई तो पूरे देश में गुस्सा था. सोशल एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी अपनी किताब डांगावास दलित संहार में इस घटना को याद करते हुए लिखते हैं कि डांगावास की ये बर्बरता उन्हें पाषाण युग की याद दिलाती है.

'दलितों पर सबसे बड़ा हमला'

दलितों पर ये उस वक्त का सबसे बड़ा हमला माना गया. उस वक्त राजस्थान में भाजपा की सरकार थी, वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री थी. मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन राजस्थान सरकार ने इसकी जांच CBI को सौंप दी. जांच चली. आरोपी बनाए गए. केस अदालत तक पहुंचा. पीड़ित परिवारों को उम्मीद थी कि जांच होगी. दोषी सामने आएंगे और उन्हें इंसाफ मिलेगा. पीड़ित परिवार ने इंतजार किया. एक लंबा इंतजार और अब करीब 11 साल बाद 5 अगस्त 2026 को अदालत का फैसला आया. अदालत ने मामले में आरोपी बनाए गए 40 लोगों को दोषमुक्त कर दिया और उनकी रिहाई का आदेश दिया. 

पीड़ित परिवार इस न्याय से हैरान है. वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि जिन लोगों को आरोपी बनाया गया था, उन्होंने सालों जेल में बिताए, जबकि उनके खिलाफ अपराध साबित हुआ भी नहीं था. इतना बड़ा हमला, इतनी हत्याएं, फिर हर आरोपी रिहा कैसे हो गए? ये पूरी कहानी क्या है, जांच में क्या सामने आया था, अदालत का फैसला क्या है और अब आगे क्या. सब बताएंगे इस रिपोर्ट में.

Advertisement
क्या है कहानी?

ये पूरी कहानी 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन के एक टुकड़े से शुरू होती है. चार्जशीट के मुताबिक, राजस्थान सरकार ने 16 जून 1961 को ये जमीन बस्ताराम पुत्र दोलाराम को दी थी. बाद में 3 सितंबर 1999 को जमीन रतनाराम के नाम दर्ज हुई, जिसे दस्तावेजों में बस्ताराम का दत्तक पुत्र यानी अडॉप्टेड चाइल्ड बताया गया. विवाद यहीं से शुरू होता है. चार्जशीट के मुताबिक, 1964 में बस्ताराम ने ये जमीन 1500 रुपये में चिमनाराम जाट के पास गिरवी रखी थी. बस्ताराम ने बाद में जमीन वापस लेने की कोशिश की, लेकिन चिमनाराम ने कब्जा नहीं छोड़ा. चिमनाराम की मौत के बाद उनके बेटों कानाराम और ओमाराम का जमीन पर कब्जा हो गया.

मेघवाल परिवार का आरोप था कि उन्होंने कई बार जमीन खाली करने को कहा, लेकिन जाट परिवार ने कब्जा नहीं छोड़ा. दूसरी तरफ जाट पक्ष का दावा था कि बस्ताराम कर्ज नहीं चुका पाए थे और उन्होंने जमीन बेच दी थी. रतनाराम ने जमीन का कब्जा वापस लेने के लिए वहां झोपड़ी और एक कच्चा कमरा बनाया और परिवार के साथ रहने लगे. इसके बाद तनाव और बढ़ गया.

दलित पक्ष के मुताबिक, 20 अप्रैल 2015 को चिमनाराम जाट के बेटे जेसीबी लेकर खेत में पहुंचे और वहां पेड़ उखाड़ने और तालाब बनाने की कोशिश की. रतनाराम ने इसका विरोध किया और पुलिस-प्रशासन से शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई. अगले दिन एक दलित महिला के साथ दुष्कर्म की कोशिश और मारपीट का आरोप लगा. इसके बाद 11 मई को गांव में पंचायत हुई. दलित परिवार को सात दिन के अंदर जमीन खाली करने की धमकी दी गई. इसके सिर्फ तीन दिन बाद 14 मई 2015 को डांगावास में हिंसा हुई. इस हिंसा में कई लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए.

उस घटना में किसी तरह अपनी जान बचाने वाले खेमा राम बताते हैं, 

हम सब अपने घर में बैठे थे. अचानक वो लोग आए और हम पर हमला शुरू कर दिया.

अब आते हैं 2026 के फैसले पर.

करीब 11 साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद 5 अगस्त 2026 को अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाया. इस केस में कुल 40 लोगों को आरोपी बनाया गया था. अभियोजन की तरफ से 41 गवाह पेश किए गए. मेडिकल रिपोर्ट, एक्स-रे, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट और दूसरे दस्तावेज भी अदालत के सामने रखे गए. इसके बावजूद अदालत ने सभी 40 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया.

फैसले को आसान भाषा में समझें तो अदालत ने ये नहीं कहा कि हिंसा हुई ही नहीं थी. अदालत ने गवाहों के बयानों को अलग-अलग देखा. कुछ गवाहों को अदालत ने घटना और अपनी चोटों के बारे में विश्वसनीय भी माना. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये था कि 40 आरोपियों में से किस व्यक्ति ने कौन सा अपराध किया, क्या इसे पर्याप्त कानूनी सबूतों से साबित किया जा सकता है?
अदालत को लगा कि अभियोजन पक्ष इस बात का जवाब नहीं दे पाया.

अब आप पूछेंगे कि उन हथियारों का क्या, जिनके बारे में हमने आपको शुरुआत में बताया. जांच के दौरान कुछ आरोपियों से लाठियां और डांगड़ियां बरामद किए जाने की बात भी रिकॉर्ड में थी. लेकिन इन बरामदगियों को अदालत में साबित करने में भी जांच पक्ष को मुश्किल हुई. इनसे जुड़े जरूरी जांच अधिकारी पूनाराम डूडी की मुकदमे के दौरान गवाही होने से पहले ही मौत हो गई थी.

हिंसा में अपने भाई गणेश, पिता पांचाराम, चाचा रतनाराम और परिवार के कई लोगों को खोने वाले 37 साल के गोविंद राम कहते हैं कि उनके परिवार और दूसरे लोगों ने पुलिस को कई बार बयान दिए. अगर इतने लोगों ने बयान दिए और इतने साल तक केस चला, तो आखिर हुआ क्या? वो कहते हैं कि परिवार कोर्ट के फैसले का सम्मान करता है, लेकिन फैसले से संतुष्ट नहीं है. उनका सवाल है कि अगर सभी आरोपी बरी हो गए, तो फिर उनके परिवार के लोगों के साथ जो हुआ, उसकी जिम्मेदारी किसकी है?

कोर्ट के इस आदेश पर सोशल एक्टिविस्ट भंवर मेघवंशी कहते हैं कि ये फैसला बेहद निराशाजनक है. वो कहते हैं, 

इस देश में दलितों को इंसाफ दिलाना बेहद मुश्किल है. पहले तो FIR ही दर्ज नहीं होती. वो दर्ज हो तो उस पर कार्रवाई नहीं होती. ये एक ऐसा मामला था जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया. हर जगह इसे लेकर प्रदर्शन हुए. उसमें भी इंसाफ नहीं मिला, तमाम लोगों को बरी कर दिया गया. पीड़ित परिवार निराश है.

दूसरी तरफ, 40 आरोपियों की तरफ से पैरवी करने वाले वकील महिपाल चौधरी कुछ और ही कहानी सुनाते हैं. उनका कहना है कि इसे दो समुदायों के बीच हुई हिंसा कहना सही नहीं है. उनके मुताबिक, विवाद असल में दो परिवारों के बीच था.

वो इस आरोप से भी इनकार करते हैं कि पीड़ितों को ट्रैक्टर से कुचला गया था. उनका तर्क है कि अगर किसी व्यक्ति को ट्रैक्टर से कुचला जाता, तो उसकी हड्डियां टूटने के बजाय शरीर कुचल जाता. चौधरी का दावा है कि मेघवाल पक्ष के लोग एक कच्चे कमरे पर चढ़ गए थे और कमरे के गिरने से उन्हें चोटें आईं. उनका यह भी आरोप है कि मामले में ऐसे लोगों को आरोपी बनाया गया जो घटना के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे और कुछ आरोपियों को कई साल जेल में बिताने पड़े. उनका सवाल है कि अगर किसी व्यक्ति ने अपराध नहीं किया और फिर भी उसे चार से नौ साल जेल में रहना पड़ा, तो उसके वो साल कौन लौटाएगा?

एक और कहानी

इस पूरे मामले में एक और कहानी भी सामने आती है. इसमें एक एक जाट की भी हत्या हुई. इसके मुताबिक, रामपाल गोस्वामी और रामदेव खड़ाव को पंचायत में मेघवाल परिवार से बातचीत के लिए भेजा गया था. आरोप लगाया गया कि वहां दलित पक्ष की ओर से गोली चलाई गई, जिसमें रामपाल की मौत हो गई और रामदेव घायल हुए. इस मामले में गोविंद और दूसरे आरोपियों को बाद में अदालत ने बरी कर दिया था.

ये भी पढ़ेंः MP-राजस्थान में सरपंचों ने कई बच्चों को गुजरात में बेचा, भीख में भी कमीशन खा गए

फैसले पर सियासत

बहरहाल अब फैसले के बाद राजस्थान की राजनीति में भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं सामने आईं. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जांच और अभियोजन में गंभीर कमियों की बात कही है. कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने भी 11 अगस्त को मामले पर प्रतिक्रिया दी. आजतक से जुड़े केशा राम की रिपोर्ट के मुताबिक़ इसी दिन विधानसभा में विपक्ष के नेता टीका राम जूली भी पीड़ित परिवारों से मिलने डांगावास पहुंचे.

मेड़ता सिटी विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और यहां बीजेपी के लक्ष्मण राम विधायक हैं. उनका कहना है कि पूरे फैसले को देखने के बाद ही जांच में हुई कमियों की तस्वीर साफ होगी. अगर पीड़ित परिवार फैसले से संतुष्ट नहीं है तो उनके पास आगे अदालत जाने का रास्ता खुला है. जरूरत पड़ने पर वह इस मामले को मुख्यमंत्री के सामने भी उठाएंगे.

यानी 11 साल बाद अदालत का फैसला आ चुका है, लेकिन डांगावास के पीड़ित परिवारों के सवाल अभी खत्म नहीं हुए हैं. परिवार इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहा है. मगर सवाल है की क्या वहां इन्साफ मिलेगा? अगली अदालत इस मामले को किस नजर से देखेगी?

वीडियो: पुल से 11 महीने की बच्ची को फेंकने वाले के साथ क्या हुआ?

Advertisement