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गलवान के बाद चीन ने किया था न्यूक्लियर टेस्ट, ऐसी तकनीक अपनाई कि दुनिया को खबर न लगी

अमेरिका ने इस बात का अब खुलासा किया है. उसके मुताबिक गलवान संघर्ष के कुछ दिन बाद ही चीन ने न्यूक्लियर टेस्ट किया था. उसने एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया था, जिससे इस टेस्ट को दुनिया से छिपाया जा सके.

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चीन के पास 600 न्यूक्लियर हथियार हैं (PHOTO-Getty)

भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (General MM Narvane Book) की किताब को लेकर भारत में सियासी बवाल मचा हुआ है. गलवान घाटी (Galwan Clash) में हुए भारत-चीन संघर्ष को लेकर उन्होंने अपनी किताब में जो लिखा है, उसे लेकर अलग-अलग व्याख्याएं हो रही हैं. इस बीच अमेरिका से एक रिपोर्ट आई है जो और भी हैरान करने वाली है. इस रिपोर्ट के मुताबिक गलवान घाटी में हुई झड़प के कुछ दिनों बाद ही चीन ने न्यूक्लियर टेस्ट (China Nuclear test) किया था.

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अमेरिकी रिपोर्ट में क्या है?

अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थॉमस जी डिनैनो के मुताबिक गलवान संघर्ष के कुछ दिन बाद ही चीन ने न्यूक्लियर टेस्ट किया था. इस टेस्ट का किसी को पता न चले, इसलिए चीन ने सिस्मिक मॉनिटरिंग से बचने के लिए डी-कपलिंग नाम के एक प्रोसेस का इस्तेमाल किया था. सिस्मिक शब्द को ऐसे समझिए कि भूकंप की स्थिति में धरती से जैसी तरंगें उठती हैं, कुछ वैसी ही तरंगें न्यूक्लियर टेस्ट के दौरान भी उठती हैं. एनडीटीवी ने अंडर सेक्रेटरी के हवाले से रिपोर्ट किया है कि यह टेस्ट गलवान झड़प के ठीक एक हफ्ते बाद हुआ होगा, जब देश की रक्षा करते हुए 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे. वहीं 30 से अधिक चीनी सैनिक भी मारे गए थे.

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अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थॉमस जी डिनैनो ने इस बारे में पोस्ट करते हुए एक्स पर लिखा,

चीन ने न्यूक्लियर धमाकों के टेस्ट किए हैं, जिसमें सैकड़ों टन की क्षमता वाले टेस्ट की तैयारी भी शामिल है. चीन ने अपनी गतिविधियों को दुनिया से छिपाने के लिए डी-कपलिंग का इस्तेमाल किया है. यह भूकंप की निगरानी की क्षमता को कम करने का एक असरदार तरीका है. चीन ने 22 जून, 2020 को भी ऐसी ही क्षमता वाला एक न्यूक्लियर टेस्ट किया था.

अंडर सेक्रेटरी डिनैनो कहते हैं कि दुनिया को एक नए आर्किटेक्चर की जरूरत है जो आज के खतरों से निपटे, न कि बीते हुए जमाने के खतरों से. डिनैनो ने अपनी एक्स पोस्ट में चीन द्वारा किए गए न्यूक्लियर टेस्ट की तैयारी के बारे में बताया. वो यह भी समझाते हैं कि चीन का यह टेस्ट दुनिया के लिए कितना खतरनाक है. वो कहते हैं कि न्यू START पर 2010 में साइन किया और 2026 में वॉरहेड्स और लॉन्चर पर इसकी सीमाएं अब काम की नहीं रहेंगी. माने 2010 में जो मसौदा तैयार किया गया था, उसमें हथियार के लॉन्चर पर वॉरहेड की सीमा तय थी, लेकिन 2026 में इसका कोई मतलब नहीं है. क्योंकि चीन अपने हथियारों के जखीरे को ऐसे पैमाने और रफ्तार से बढ़ा रहा है जो आधी सदी से ज्यादा समय में कहीं नहीं देखा गया. वो कहते हैं,

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अमेरिका की लगभग सभी तैनात न्यूक्लियर ताकतें न्यू START के दायरे में थीं, जबकि रूस के बहुत बड़े जखीरे का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही इसके दायरे में था. चीन के हथियार तो बिल्कुल भी न्यू START के दायरे में नहीं थे.

न्यू START अमेरिका और रूस के बीच एक न्यूक्लियर हथियारों में कमी लाने के लिए की गई एक संधि थी. इसका मकसद हमले में इस्तेमाल होने वाले हथियारों में और कमी और लिमिटेशन के लिए प्रावधान लाना था. इसे 2011 से लागू किया गया था.

डिनैनो की ये टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब न्यू START की अवधि खत्म हो गई है. इसके बाद परमाणु हथियारों पर नई सीमाएं तय करने के लिए रूस और चीन के साथ बातचीत प्रस्तावित है. हालांकि चीन ने इस बातचीत में शामिल होने से पहले ही इनकार कर दिया है.

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